जुगनू

गाॅवों के परिवेश में, अद्भुत चमक हम देखते हैं।

सन्ध्या समय उन्मुक्त पवन में, तैरते कुछ देखते हैं।।

कौन सा ये जीव प्यारा,जो मन हमारे मोहते हैं?

नाम जुगनू दे इसे हम, प्यार से ही पुकारते हैं ।।

इठला के उड़ता है हवा में, गर्व से कुछ सोंचकर।

चुपचाप उड़ता मौज में ,संध्या प्रहर को हेरकर ।।

लगता है मानों आ गये , तारे उतर कर आसमाॅ से।

उड़गण के बच्चे खेलते,मिलजुल जो बच्चे हैं जमीं से।।

बैठकर कुछ लूट सकते, हैं मजा इस दृश्य का ।

लुत्फ ले सकते सभी, इस टिमटिमाते दृश्य का।।

दिन-रात दोनों का मिलन, सन्ध्या प्रहर है नाम तेरा।

इस गोधुली के वक्त से , क्रीड़ा शुरू होता है तेरा ।।

यह मिलन का वक्त है ,संन्ध्या , दिवस दोनों प्रहरका।

वक्त पावन और उत्तम , मुहूर्त है अच्छा मिलन का ।।

टिमटिमाता जुगनूओं का , दृश्य आकर्षक बड़ा है।

कुमकुम जमीं पर आसमां से, कोई तो बरसा रहा है।।

देखकर तेरा नजारा, लोग पीछे पड़ गये हैं ।

छोटे अनेकों बल्ब ले ,तेरे नकल में लग गए हैं।।

पर चीज असली और नकली ,एक हो सकती नहीं।

नकली सदा नकली रहेगी,असली तो हो सकती नहीं।।

पर तुच्छ जुगनू कीट छोटी , तौलकर तो देखिये ।

गुण कम नहीं उसमें भरा है,औसत लगाकर देखिये।।

यह न करता है क्षति , छोटे बड़े कोई जीव को ।

नृत्य अपना है दिखाता , उड़ चमक हरलोग को।।

जीव तुम छोटे ,बड़े पर खेल दिखलाते सदा ।

तुम टिमकते , टिमटिमा , मन मोहते सब का सदा।।

दूर करता नृत्य तेरा, परेशानियाॅ सब लोग का।

मन भी बहलाते सबों का, मिटता थकन हर लोग का।।

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