गये कहां बीते मेरे दिन.

गये कहां बीते मेरे दिन,क्या लौटकर फिर आओगे ?

बेताब हो मैं ढ़ूढूता ,क्या फिर कभी मिल पाओगे ??

जाओगे तो जाओगे ही ,लौट फिर क्या आओगे ?

विरह की ज्वाला में मुझे, जलाते ही क्या रह जाओगे।

विरह की अग्नि क्या जलाती,जलती धुआं होती नहीं।

तिल तिल धुआंसे मारती ,ऐसी सितम क्या ढाओगे।।

चिन्ता न मरने की मुझे,इससे क्या तूं बच जाओगे।

जो आ गये ,जाना भी तयहै,क्या कोईसदा रह पाओगे।

है ब्यर्थ ऐसा सोंचना ,क्या सोंचकर बच जाओगे?

बचा नहीं कोई आजतक,तुम भी नहीं बच पाओगे।।

आते कभी गम जिंदगी में,तो बच न कोई पाओगे।

झेलना आसां सभी से ,क्या भाग कर बच जाओगे??

है स्मरण मुझको अभीतक,सुलाती थी गाकर लोड़ियां।

नखरे बहुत करते थे, उन्हें सहने की थी कमजोरियां।।

हम मचाते थे उधम, नखरे उठाती मां सदा ।

उलाहना पड़ोसियों का,नित सहन करती सदा।।

अमरूद ,आमों की बगीचा , में लगा फल है कहां?

फेंक पत्थर झाड़ देने, में मजा मिलता जहां ।।

बागों बगीचे सबों का ,हिसाब हमारे पास था ।

किसमें फला है आम मीठा , सबकुछ हमारे पासथा।

मौज मस्ती का वो आलम,ले फिर कभी क्या आओगे?

गये चले पर यह बता दो,लौट फिर कब आओगे ??

जलन चांद को होती होगी.

देख कभी मेरी महबूबा को,जलन चांद को होती होगी।

देख धरा का चांद, चांद को, ईर्ष्या भी होती होगी ।।

दुनिया वाले आसमान का, चांद सभी देखा होगा ।

मेरी महबूबाको देख उसे,यकी न खुदपर होता होगा।।

हैचांद अकेला सबको पता,जब नजरदूसरा आयाहोगा

घूंघट में कैसे छिपा है आकर,समझ नहीं पाया होगा ।।

भ्रम में पड़ा हुआ होगा वह,गजब माजरा लगता होगा।

चांद छिपा है घूंघट में,मन भ्रमित उसे करता होगा ।।

जो देखा,कहना भी मुश्किल,चुप रहना मुश्किल होगा।

सच बोलूंतो बनूं दीवाना,रह मौन दीवाना बनना होगा।।

कौन है सुंदर ज्यादा उनमें,कहना तो मुश्किल होगा।

कमी नहीं दिखती कोईमें,फर्क बताना मुश्किल होगा।।

सुन्दरता का अंत नहीं है,अंत नहीं इसका होगा ।

विधाताकब क्याचीज बनादे,कहना अतिमुश्किल होगा

जिसने भी हो चांद बनाया, उसने ही इसे गढ़ा होगा ।

चाहे जिसको जैसा रच दे,जाने जब जो चाहा होगा।।

पर सत्य यह है इतनी ,जब भी वह इसे बनाया होगा ।

चयन किया होगा सूरतजब,पहले कितना सोंचाहोगा।।

कहते कभी रचयिता रच कुछ,स्वयं चकित होता होगा।

इसे रचा क्या है उसने ही,स्तंभित होता होगा ।।

धन्य रचयिता क्या रचता तूं,किसीको नहीं पता होगा।

क्या मकसद है तेरा इसमें,कोई अन्यनहीं सोंचा होगा।।

नालंदा का खण्डहर.

बना खंण्डहर अड़ा खड़ा है,नालंदा का पुरां धरोहर।

गर्वसे सीना चौड़ा होता,गौरवकी उनकी बातें सुनकर।।

ज्ञानपुंज का महाधरोहर, रौशन सारा जग इससे था ।

ज्ञान पिपासु विश्व से आते,तृप्त सबोंको यह करता था।

पुरे विश्व का गौरव तबका,आज खंडहर बना पड़ा है।

एकबार नहीं,कईबार दुश्मनों,ने इसका विध्वंस कियाहै

सुनते हैं कई महीनों तक, पावन पुस्तक जलते रहगये।

मानवता का वह प्रवल शत्रु,उसे खाक बनाते रहगये ।।

खुदा दंड देता है गर तो, दंडित उसे किया होगा ।

कमीना बख्तियार खिलजी को,सजाअवश्य दियाहोगा।

अवशेष बचेजो याद दिलाते,उनके कूकर्म कीबातों को।

उस विद्याके पावन मंदिर में,उनकी की आघातों को।।

जहां सम्प्रदाय कीबात नहीं,सबको ज्ञानदिया जाताथा।

हिन्दू,मुस्लिम,देश विदेश का,भेदभावभी तनिकन था

अत्याचारीका कोई धर्म न होता,बस अत्याचार हीआता

जहां देखता मौका जैसा,वैसा ही काम वहां करता ।।

जोसबको ज्ञान दिया करता था,वगैर कोई विभेद किये।

देश विदेश के सभी देशसे,आये आकर ज्ञान लिये ।।

हम आज विदेश में पढ़ने जाते,पहले वहां से आते थे।

जो आज उपाधी देता हमको,उसे कभी उपाधी देतेथे।।

जिसके कण-कणमें,बसा आजभी,तबके गुणकी आभा

ज्ञानवान पैदा होते हैं,ले तीव्र बुद्धि और प्रतिभा ।।

पुनः सम्हल बन जायेगा, पालेगा फिर खोई की्र्ति

हमें दमन कर डाला था, पुनः मिलेगी खोई कीर्ति।।

निर्मल मन ले आये जग में.

दोष तेरे दिल में है प्यारों, दोष भरा दिल तेरा है।

नजरें डालो स्वयं स्वयं पर,चले पता क्या फेरा है।।

निर्मल मन,आता ले जग में,कचरों का नहीं बसेरा है।

निर्मल मन पर सदा गंदगी,डाल रही खुद ड़ेरा है।।

नित्य गंदगी का रज उनको, करती रहती है गंदा ।

निर्मल,कोमल,मन पर अपना,फैलाता है फंदा ।।

लगी विकृति असर डालने, अपने अवगुण का उनपर।

असर गंदगी करने लग गयी,उनके निर्मल मन पर।।

प्रभाव गन्दगी की होती, निर्मल मानव मन गंदा होता।

स्नेह भरा कोमल दिल पर,परत गन्दगी का पर जाता।।

फिर मानव वहीअमानव बनता,साराअवगुण भरजाता

बसरूप बचा मानवका रहता,पशुओंसे बदतर होजाता

ब्यर्थ बिधाता का हो जाता,सब देकर जिसे बनाया।

सब जीवों से अधिक ज्ञान दे,धरा पर जिसे पठाया।।

श्रेष्ठ बना जिसको भेजा था,भटक गया खुद राहोंसे।

जिन राहों से था चलना,भटक गया चौराहों पे ।।

कहां उन्हें जाना था पर,अन्यत्र कहीं वे चले गये।

मकसद क्या था जानें का,मकसद से भी भटक गये।।

दिशाहीन नाविक सागर में, कहीं भटक गर जाये ।

लक्ष्यहीन चलते चलते, सागर सै निकल न पाये ।।

उसे किनारा मिल जायेगा, कठिन बहुत है कहना।

रह भी सकता सदा भटकते, मुश्किल दावे से कहना।।

दोष खोजकर अपने दिल से ,उसे भगा गर सकते।

जो मानवता आये थे लेकर,साथ निर्वहन करते ।।

बताऊं किसी को कैसे?

कसक उठती है रह-रह कर,बताऊं किसी को कैसे?

देती है टीस रह -रह, छिपाऊं किसी से कैसे ??

रहती नहीं स्थिर कहीं , बदलती जगह है पल-पल।

पूछे अगर कोई कहां , बतलाउं जगह मैं कैसे ??

पूछें न बात दिल की , यूं यह बड़ा है इतना ।

समुंदर से ज्यादा गहरा ,नापूं इसे मैं कैसे ??

थाहना है मुश्किल , थाहा कहां किसी ने ?

बौरा भी मैं अनाड़ी , थाहूं उसे मै कैसे ??

दर्द दिल का दिल में ,रखना दबाये मुश्किल।

देती बताये आंखें , छिपती कहां है उनसे ??

दिल का आईना ये मुखड़ा, प्रतिबिंब सारी इनमें।

जो जानते परखना , छिपाऊं मैं उनसे कैसे ??

हिलती जुबां न थोड़ी, चाहे जो दिल भी कहना।

कसक को , नयन की भाषा ,बतलाये भी तो कैसे??

जुबां गर ,चुप भी रह जाती ,बयां कुछ कर नहीं पाती ।

पर यह आईना दिल का, इसे समझाउं मै कैसे ??

हर चीज प्यारी है.

रची जो चीज प्रकृति ने, रची हर चीज प्यारी है।

जना सब कुछ उन्होंने ही,अतः सबकुछ ही न्यारी है।।

रचयिता ने रचा सबकुछ , उन्ही की सारी कृति है।

बुराई गर दिखे उसमें,तो वह अपनी ही विकृति है।।

उनकी रची रचना, सब के सब ही प्यारी है ।

फिर भी न मन भाये ,दोष समझे हमारी है।।

कहां क्या क्या बनाना है , सबकुछ पता उनको ।

जरूरत क्या किसे कितनी , यह भी पता उनको।।

पौधों की अनेकों किस्म ,भरे उनके वनों में है ।

भरे अनमोल गुण उनमें, पता कुछ विद्वजनों में है।।

जो गुण जानते उनके, उन्हें अनमोल लगते हैं ।

नहीं जिनको पता होता , महज जंजाल लगते हैं।।

ध्यान दे गर सोंचिये , उनके किये निर्माण को ।

विचित्रता हर में दिखेगी,केन्द्रित करें गर ध्यान को।।

चक्र कुछ ऐसा बनाया, हर जरूरी चीज का ।

न संतुलन बिगड़े कभी भी, ध्यान दें उस चीज का।।

चक्र जल का ,वायु का ,हर चीज का उसने बनयी।

उस गंभीरता को सोंचिये,क्या-क्या नहीं उसने बनाई।।

विषय बहुत गंभीर है,आसां नही सब जान पाना ।

प्रयास मानव कर रहा ,पर है बहुत अभी दूर जाना।।

जो नित्य आंखों देखती, फिरभी कहां हम समझ पाते।

कैसे बनी ओर क्यो बनीं, इस बात से अनभिज्ञ रहते।।

संसार का कोई आदमी,अबतक इसे समझा कहा है?

जो कुछभी समझा बहुतथोड़ा,अंतको समझा कहांहै?

सितम ढाते वही सहते।

सितम ढाते वही सहते, माहिर वे सभी में है।

कभी सहना सितम पड़ता,तो ढाने में नहीं कमहै।।

सितम ढाकर मजा लेते,सहन कर खुद दुखी होते।

अक्सर लोग दुनिया में, ऐसा निर्दयी होते ।।

सितम ही दुख का कारण है,देना या सहन करना।

जिसे देते दुखी होता ,दुखद होता सहन करना।।

सितमगर ही कभी भाता, सितमगर ही है तड़पाता।

सितमगर कब न जाने क्या ,कैसा गुल खिला देता।।

कहते दर्द मीठा हो, मजा उसका लिया करते ।

बड़े ही प्रेम से उस दर्द को, सीने से लगा रखते।।

मानव है गजब प्राणी , इसे मुश्किल समझ पाना।

जगत के सारे जीवों से ,धूर्त इस जीव को माना।।

कड़वी चीज खा कर भी, मजा इन्सान लेता है।

कड़वी घूंट मदिरा पान कर,आऩन्द लेता है ।।

सहन कर भी कभी पीड़ा, लोग आनन्द है लेते ।

जहर का घूट पी लेते, बन भगवान है जाते ।।

मानव भी गजब का जीव है, जाने क्या किये देता।

समझ से जो पड़े हो चीज,उसे वे कर दिखा देता।।

असम्भव ही लगा करता ,मानव को समझ पाना।

दिल में क्या छिपा रखा, बात को जान है पाना।।

सारे जीव में सबसे अधिक, खतरा यही करता ।

दिल में क्या छिपा रखा,भनक इसका नहीं मिलता।।

कभी तो सोंच में बदलाव भी,आता कभी ऐसा ।

जैसे कल्पना की भी पहुंच ,होता नहीं वैसा ।।