प्रकृति कर्म सदा करती.

अगला मुद्दा विश्वयुद्ध का , पानी ही है हो सकता ।

ये बातें व्यक्त किया जिसने,कथन सत्य उसका लगता।।

बनकर वाष्प मही से जल , जब आसमान में जाता।

बादल बनकर आसमान में ,सघन रूप से छा जाता ।।

फिर पानी ककी बूँदें बनकर , धरती पर गिर जाता ।

यही क्रिया पानी गिरने का ,बारिश है कहलाता ।।

प्रकृति का यह काम मही पर ,निरंतर ही चलता रहता ।

सारी ऋतुएं भी अपने ढंग से ,आता और चला जाता ।।

यह चक्र सदा चलता रहता , प्रकृति ने इसे बना रखी ।

बडे़ ढंग से नियमित अपने ,कर्मों को करती रहती ।।

बहुत ध्यान दे कर प्रकृति ने ,यह संसार बनाई है ।

शुद्ध हवा औ शुद्ध जलों का , उद्गम वही बनाई है ।।

मानव नामक जीव धरा पर ,बुद्धि ज्यादा दे रच डाला ।

सारे जीवो से अधिक बहुत , ज्ञानी इसे बना डाला ।।

प्रकृति के हर कामों में , लगा ब्यवधान यही करनें ।

अपूर्ण ज्ञान ही पाया था , पर लगा उधम वही करनें।।

प्रकृति का दोहन करनें में ,किया न तनिक रहम हमनें।

फैलाया प्रदूषण जमकर, अरि सा ब्यवहार किया हमनें।।

करनी जो हमनें कर डाली , परिणाम भुगतना ही होगा।

‘गलत काम का गलत नतीजा, हमें झेलना ही होगा।।

बहुत बिगाड़ा ,मत और बिगाड़ो ,आगे जरा सम्हल जा।

गलत करना भी आगे छोड़ो ,बिगड़ों को राह बता जा ।।

उपयोग करो पानी का हरदम, अमृत इसे समझ कर।

नहीं ब्यर्थ में इसे बहाना , या प्रदूषित ही कर कर ।।

कवि-दिल.

प्रेम भरा होता दिल कवि का , घृणा तनिक न होता।

कोमल भाव भरे हैं होते , अतिसय निर्मल होता ।।

कहते समाज का दर्पण होता , प्रतिविम्ब इसी में दिखता।

दर्पण केवल नहीं, भविष्य कैसा होगा वह दिखता।।

दर्पण तो दिखलाता केवल , बाहर से जो दिख पाता ।

अन्दर क्या क्या भरा पड़ा , उनको कहाँ नजर आता।।

शूक्ष्म दृष्टि होती उनकी , अति दूरदृष्टि भी होती ।

सामान्य जनों को नजर न आता,पर उन्हें दिखायी देती।।

पहुँच वहाँ भी हैं जाते , ज हाँ नजरें नहीं पहुँच पाती।

कल्पना दृष्टि से उनको , चीजें सभी झलक जाती ।।

कवि कल्पना की नजरों से ,सबकुछ देख लिया करता।

उन्हे पेड़ की छावों में भी ,नल दमयन्ती दिख जाता ।।

कभी उड़ाने भर लेता है ,सूर्य ,चन्द्र ,ग्रह-उपग्रह का ।

अंतरीक्ष में रहनेवाले , छोटे-बड़े नक्षत्रों का ।।

दिशानिर्देश कराते आये , बडे़-बडे़ क्षत्रप का ।

गंभीर समय में पथ-निर्देशन , किया है बडे़ बड़ों का ।।

काम कवि का सदा रहा है , उत्तम राह दिखाना ।

शक्ति निहित हो जिनमें उनको ,नीतिगत राह बताना ।।

सदा सदा से तब के कवि गण ,अपना धर्म निभाया ।

पड़ी जरूरत तो उन्होंने, अच्छा सा मार्ग दिखाया ।।

धर्म सदा से रखा इसनें , कुछ समाज को देना ।

कभी प्रयास नहीं करता वह,कुछ समाज से लेना।।

हम सफर

मिले गर हमसफर प्यारा , सफर आसान हो जाता ।

गमों की भी मिले दरिया , हँस कर पार हो जता ।।

रहे गर साथ मे हमदम , डगर काँटे भरा भी हो ।

काँटे ही नहीं केवल , पथें काँकड़ भरे भी हों ।।

हमारे कदम ठिठकेगें नहीं , बाधाओं के आगे ।

मुमकिन है कि हमको देख कर , बाधायें खुद भागे ।।

इरादा हो अटल- प्रबल , आनन पर झलक जाता ।

बाधायें देख कर इनको , किनारा स्वयं ले लेता ।।

किनारा ही नहीं केवल , मदद करने चले आते ।

मदद स्वीकार गर कर लें , बड़े ही धन्य हो जाते।।

यही दस्तूर दुनियाँ का , जो काफी पुराना है ।

जो सफल हो जाते , उन्हें सब धन्य माना है ।।

भरा सामर्थ्य हो जिनमें , लोग सब पूजते उनको ।

जो वे कहा करते , लोग सब मानते उसको ।।

असक जो लोग कुछ कहते , कहाँ कब मानते उनको ।

बात गंभीर भी करते , न सुनना चाहते उनको ।।

उनकी बात को आराम से ,प्रलाप कह देते ।

न देते ध्यान ही उसपर , उसे बकवास कह देते।।

चाहे लाख ज्ञानों से भरी हो , बात सब उनकी ।

उन्हें तरजीह क्यों देगें , सुनेंगे ही नहीं उनकी ।।

लेते लाख बाधा झेल , संग गर हमसफर होता।

गमों की भी मिले दरिया ,तो हँस कर पार हो जाता ।।

ऐसे लोग हुआ करते.

बातें अनेक मानव तो मन मैं, सोंचा ही करता है ।

पर पूरा कितना होता ,समय ही बतलाता है ।।

बहुत लोग कम होते जग में , जो कहते पूरा करते ।

संख्या नगन्य उनकी होती ,पर जो होते काफी होते ।।

ऐसे लोग बहुत होते जो , लम्बी डींग भरा करते ।

करनी कुछ करते नहीं , बातें ही सिर्फ किया करते।।

पर बात बहादुर, राय बहादुर ,बहादुर अन्य हुआ करते।

अंग्रेज स्वयं तो चले गये , पर चमचे बहु मिला करते।।

बादल तो बहुत गरजते हैं , वे बरसा नहीं किया करते।

उमड़ा करते जो शाँत भाव से , बारिश वही किया करते।।

करनी जिनकी ओछी होती , ज्यादा शोर वही करते । कथन यह बहुत पुराना है , पर अक्षरशः सच लगते ।।

जिनमें खोट भरा होता, आडम्बर खूब रचा करते ।

अपनी डफली स्वयं बजा कर ,अपना गुणगान किया करते।।

समझने वाले खूब समझते , फिर भी कुछ तो फँस जाते।

बिछाये उनके जालों में, कभी गफललत में रह जाते ।।

गलत जो सदा किये करते , कभी तो खुद भी फँस जाते।

कथन सत्य है ‘काठ की हाँडी ‘ ,नहीं दोबारा फिर चढ़ते ।।

जब घड़ा पाप का भर जाता , समय का मार तभी पड़ता।

किसी रूप में आ कर अपना , पूरा किस्त चुका लेता ।।

तुलसी

जो स्वयं हो प्रकाश-पुँज , उसे दीपक दिखाने मैं चला हूँ।

दुस्साहस नहीं तो और क्या , जो आजमाने मैं चला हूँ ।।

‘सूर ‘ तो सूरज कहाये , तुलसी कहाये चाँद सा ।

अन्य कविगण हैं कहाँ , हो जो सूरज -चाँद सा ।।

भर दिया है रंग कैसा , रामायण को रंग से ।

भूल गये सब बाल्मीकि ,तुझको लगाया अंग से।।

सींचा जिसे था बाल्मीकि , प्रारूप अपने ध्यान से ।

भविष्य -वाणी सत्य निकली , क्या कर दिखाया ज्ञान से।।

रंग तुलसी ने भरा ,अपनी कलम का रंग दे कर।

भब्य-भवन इसने बनाया ,’रामायण’ सा नाम देकर।।

अपने ही मन मंदिर में तुलसी , राम का आयन बनाया।

सपरिवार, श्रद्धा औ जतन से ,,राम को उसमें बिठाया।।

गाथाएं सारी गाई उनकी, दोहे तथा चौपाई में ।

सोरठा व अन्य विधायें , छोड़ा न कुछ भी लिखाई में।।

यह ग्रंथ तेरा , धर्मग्रंथ , बनकर सबों में छा गया ।

जन-जन के मानस में बसा , अमरत्व उसमें आ गया ।।

जब तलक संसार होगा, तुलसी तेरा भी नाम होगा।

प्रेम ,श्रद्धा से सबों में , तेरे लिखे का ज्ञान होगा ।।

ऐ पथिक

ऐ पथिक यह तो बता दे , है तुझे जाना कहाँँ ?

कोई है तेरा जो पथ निहारे ,दे बता वो है कहाँ ??

दिन रात चलते जा रहे ,अविरल बिना विश्राम के ।

क्या पग तेरे थकते नहीं , जरूरत नहीं विश्राम के ??

शजरों की ठंढी छाँव में , रुकते न पल भर के लिए।

लेते नहीं क्यों झपकियाँ ,.अपनी ही सेहत के लिये ।।

भागते ही जा रहे , लेते नहीं विश्राम क्यों हो ?

हो मुसाफिर तुम कहाँ के , यह भी बताते क्यों नहीं हो??

गये भटक जो पथ कहीँ , पहुंच कहाँ पर जाआगे?

अपनी जरूरत की जगह पर , क्या पहुँच भी पाओगे??

हम सब मुसाफिर पर अजूबा, अनजान पथ पर चल रहे ।

चौरास्ता आता कहीं , भटके तो भटके जा रहे ।।

कोई बताता राह पर , अनभिज्ञ खुद रहता वही ।

अटकलों से सोंच कर खुद , पथ बताते हैं वही ।।

देखा किसी ने है नहीं , बस अटकलों की दोड़ है ।

ढोंगियों की बाढ़ हो गयी , बनता वही शिरमौर है।।

ढोंग रच कर नित नया , फाँँसते है जाल में ।

दिखला उन्हें कुछ सब्जबाग, लेते फँसा ही जाल मे।।

पथ बताता है न कोई ,सब लगे हैं फाँसने में ।

पथ तो पता खचद ही नहीं ,आता मजा है फांसने में।।

चींटियों की पंक्तियों सा , बस चले हम जा रहे ।

अनभिज्ञ राहोंं पर बढे , अनभिज्ञ जगह पर जा रहे।।

संसार के सारे पथिक का , आज ऐसा हाल है ।

गण्तब्य तक मालुम नहीं , क्या नहीं ये कमाल है।।

मानव ही रच कर ढोंग नित , मानवों को ठग रहे ।

चमत्कार का रच ढोंग नव , अपनों को अपने ठग रहे ।।

कृष्ण फिर आना पड़ेगा.

कृष्ण तुम आये न होते , क्या हाल होता लोग का ।

आतंक था सर्वत्र छाया , रहता बना भय कंस का।।

एक नाग काला कालिया भी ,आतंक यमुना का बना।

जो जीव जाता था नदी मेंं ,आहार सब उसका बना ।।

कालिया को नाथ कर , भयमुक्त यमुना को किया।

तरणी तनूजा के तटों पर , बहार नव फिर से किया।।

उठा गोवर्धन को , बचाया डूबते सब लोग को ।

इस्तेमाल छतरी कर दिखाया, नासमझ सा ईन्द्र को।।

द्रौपदी का चीर हरण , था जब सभा में हो रहा ।

बचाई उनकी आवरू , कर महसूस उनके दर्द को।।

गोपियाँ बेचैन सी , रहती इन्हीं की याद मे ।

बेचैन दिल को चैन दे , करते शमन उस दर्द को।।

कृष्ण के ही रंग में , हैं रंगे सब आज तक।

भूलना नहीं चाहते ,उनके दिये गये दर्द को ।।

नाग काला कालिया , बदला है अपनें रूप को ।

रूप को अपना बदल , अपना लिया विद्रूप को ।।

पहचान लेना भी उन्हें, मुश्किल अति अब हो गये।

कब कौन सा वह रुप लेगा, कहना कठिन है बात को ।।

कान्हा तुझे ही स्वयं आ ,समझाना पड़ेगा बात को।

मर्ज अब संगीन हो गये, निपटाना पड़ेगा आप को ।।

जल्द कर ,कर देर मत , मर्ज बढता जा रहा ।

बढ़ गये गर और ज्यादा , मुश्किल बढ़ेगा आप को।।