ज्ञान-दीप.

दीप जल खुद रोशनी दे , दूर कर देता अंधेरा ।

अग्नि कितने रूप धर ,देता सदा सबको सहारा।।

तुम न थे ,थी रात काली, छाया हुआ रहता अंधेरा।

प्रकाश का दर्शन तभी था, जब हुआ होता सबेरा ।।

चुपचाप छिप कहीं बैठने के, कुछ अन्य कर पाते न थे।

मजबूरियों की जिंदगी, जीने को भी मजबूर हम थे ।।

हरतरफ से घात करने , को लगे कुछ जीव रहते ।

मौत सब की जिंदगी को ,घेरे सदा हरओर रहते ।।

जिन्दगी और मौत की , रहती सदा थी जंग तब ।

रक्षक न कोई था किसी का, जिंदगी जीते थे डरकर।।

निर्भीक न कोई जीव था, सारे लगाये घात था ।

इन्तजार मोके का सबों को,खतरा भरा तब रात था।।

सब जीवसे चालाक मानव,अग्निको जब खोज डाला।

दीपभी सीखा जलाना,अधिकार तमपर करही डाला।।

काफी समय उसने लगाया,तब उसे वह खोज पाया।

अंधकार पर थोड़ा विजय,विवेक से उसने बनाया।।

टिमटिमाते दीप को, विकसित सदा करते रहे ।

काली निशा की कालिमा से,हमसब सदा लडते रहे।।

विज्ञान हमको खोजकर, चीज कुछ देता रहा ।

परेशानी मानव जिंदगी की,दूर कुछ करता रहा।।

ज्ञान का जब दीप हरदम,हर जगह जल जायेगा।

संसार के हर जीव को, तब समझ सब पायेगा ।।

चितवन-वाण अति घातक.

घायल मतकर और न दिल को, बढ़ा दर्द जाता है।

दर्द सहन करने की क्षमता , अब कमता जाता है।।

पीड़ा और बढ़ेगी ज्यादा, दिल शायद ही सह पाये।

टीस सहन से ज्यादा हो तो,ऐसा न हो ,टूट जाये ।।

विरह वेदना को सह लेना,होता तो आसान नहीं।

पाषाण-हृदय भी कितना रोता,बतलाना आसान नहीं।।

जुबां हिलाने से भी पहले, ऑंखें अश्रुसे भर जाती ।

नयना ,जिह्वाके कहने से,पहलेही सबकुछ कह जाती।

गम खुशी प्रकट दोनों कर देती,नयनें अपनी भाषा में।

छिपती भी नहीं छिपाये इनसे,न बंधती बंधनपाशा में।।

चितवन-वाण बहुत है घातक,यह अचूक है होता।

गंभीर घाव कितना कर देगा, नहीं कोई कह सकता ।।

बचना भी आसान नहीं, संभव ही नहीं असंभव ।

वख्सा न ऋषि-मुनियों तकको,बचना किया असंभव।।

कितने सूरबीर तो इनसे ,नत-मस्तक हो खड़े रहे।

कृपादृष्टि उनकी पाने को, नजरें अपनी बिछा रहे।।

दिलमें यह उम्मीद लिए,कि नजरें कमी घुमेगी ।

कभी इनायत की नज़रें तो, मेरी ओर फिरेगी ।।

उम्मीद जगाती हिम्मत को, पहल तभी यह करती।

हिम्मत के आगे बड़े बड़ों को,भी झचक जानी पड़ती।।

जिनमें हिम्मत की थाह नहीं हो,सबकुछ उनको संभव।

असंभव तो असकों को होता,समर्थों कोकहाॅं असंभव।

ऐसे हिम्मत वाले कम होते, कभी नगण्य होते हैं ।

उनकी कीर्ति सदा चमकती, लुप्त नहीं होते हैं।।

मन नहीं थकता.

कुछ लोग दुनियाॅं में, शायद इसलिए आते ।

भला सबलोग का करते, बदले कुछ नहीं लेते।।

भला करने में लोगों को, उन्हें आनन्द है मिलता।

पड़ती झेलनी परेशानियाॅं , फिर भी मजा मिलता।।

सुकून उनके दिल को, इतना अधिक मिलता।

जिसे परेशानी कहते लोग,पर इनको मजा मिलता।।

जिन्हें कोई काम करने में, सुखद एहसास मिल जाये।

कठिनतम काम भी उनके लिये, आसान हो जाये ।।

थकान उनके पास तो, आही नहीं सकता कभी।

तन जाये थोड़ा थक भले, मन नहीं थकता कभी।।

ऐसे लोग गिनती में कभी, ज्यादा नहीं होते ।

काफी समय के बाद ये , अवतार हैं लेते।।

वैसे भी दुनियाॅं में , अच्छे लोग कम होते ।

आते निर्विकार मन ले,वह विकृत यहां होते।।

यह विकार ही शत्रु प्रबल है, प्रत्येक मानव का।

डुबोये बिन न जल्दी छोड़ता,यह शत्रु है सबका।।

विकार तो कमोवेश सब में, है रहा करता ।

बचकर अछूता रह गया,वह संत कहलाता ।।

जो संतगण होते , नमन के पात्र हैं होते ।

श्रद्धा लोग का इनपर , प्यार सबको ये करते।।

अपना पराया कुछ नहीं,उनको एक सब लगते

प्रकृति की सभी निर्माण है, सबों से प्रेम ये करते।।

बड़े ही धन्य हैं वे जो, बनाई प्यारी सी दुनियाॅं।

विविध चीजों से भरकर वे,सजा दी प्यारी यह दुनियाॅं।।

जो सादी जिंदगी जीते.

जो कोई सादगी से जिंदगी, अपनी वसर करते।

दिखावा में कभी अपना , नहीं विश्वास वे करते।।

न लोभी ,मत्सरी होते , किसी का अहित न करते।

लक्ष्मी,सरस्वती दोनों की, कृपा-पात्र वे रहते ।।

शक्ति की कमी उनको नहीं, पर मद नहीं रखते।

न्याय-प्रियता तो कूटकर, उनमें भरे रहते ।।

सदाही प्यार करते हर किसीको,उचित सम्मान भीदेते।

घृणा का लेश भी उनके, दिल में नहीं रहते ।।

ऐसे लोग दुनियाॅं में , सबों का प्यार भी पाते ।

भरोसा लोग का इनपर , उनको लोगपर होते।।

ऐसे लोग खिलकर ताल से,ऊपर निकल आते।

कमल का फूल सा प्यारा,सबोंंके मनको वे भाते।।

उनको ताल का कीचड़, बिगाड़ा कुछ नहीं करते।

यही कीचड़ उन्हें पावन, राजीव-दल बना देते ।।

सारे लोग दुनियां में ,करने धर्म ही आते ।

कुछ पथ भटक कूकर्म में, खुद को लगा देते।।

कूकर्म मानव जीवको , बदनाम करके छोड़ देते।

सिर्फ खुद को ही नहीं,समेट और कोभी संग लेते।।

प्रभाव भी तो गंदगी का,जल्द पड़ जाते।

अच्छे भलों की बुद्धि उनसे, नष्ट हो जाते।।

महान जितने लोग होते,सादगी-प्रतीक होते।

काम खुद करके दिखाते,ब्यर्थ की डींगें न भरते।।

बातें कभी बाचाल सा ,वे नही करते ।

सबको दिखाते सुपथ,जिसपर स्वयंभी चलते।।

गुलशन.

गुलशन को सजाने में, बहुत का हाथ होता है।

अकेला कुछ नहीं होता, बहुत का साथ ह़ोता है।।

लाकर पेड़ की गाछी , लगाता ,सींचता कोई ।

जमीं अनुकूल करता, कोड़ दे क्यारी बना कोई।।

सहयोग करते सब , तभी गुलशन निखरता है।

दिखा सौंदर्य अपना, लोग को आकृष्ट करता है।।

दिखा कर नूर अपना, प्यार से सबको बुलाता है।

पवन को सुरभी दे अपनी, लोगों को लुभाता है।।

खिचे आते चले सब जीव, कीड़े भी पतंगे भी ।

मधुप आ गुनगुनाते हैं, तितलियों को लुभाते भी।।

चमन में पक्षियों का झुंड आ, अठखेलियां करते।

प्रणय का खेल खुद करते,निषेचन पुष्प का होते।।

प्रकृति की विधा भी , साथमें चलता ही है रहता।

बसंत का उन्माद जो, उनपर चढ़ा रहता ।।

माली तो बदल जाता , नहीं गुलशन बदलता है।

ऋतु-बसंत तो लौटकर , हर वर्ष आता है ।।

प्रकृति चुप नहीं रहती , समय तो रुक नहीं जाता।

अपनी गति से वह निरंतर ,चलता ही सदा जाता ।।

गुलशन पर नशा मधुमास का,जब पूर्ण छा जाता।

मधुप भी कर मधु रसपान,जब मदमस्त हो जाता।।

गम क्या उसे मधुमास, फिर आये न आये ?

उसे तो फिक्र केवल है, जो आया लौंट न जाये।।

यही सब सोंचकर वह, स्वयं को ऐसा डुबो देता।

नहीं स्तित्व तक का ध्यान अपना,सब भुला देता।।

हालात स्वत: बदल जाते.

देखें राजनीति क्या , आजकल गुल खिलाती है ।

सुनकर राज भीतर का ,घुटन महसूस होती है ।।

ये जो प्रतिनिधि होते , जिन्हें जनता चयन करती।

चयन करके न जाने क्यों उसे, सर पर बिठा लेती।।

सिर पर बिठाना ही , उनकी चूक हो जाती ।

उनकी ही बनाई बिल्ली,उन्हींपर म्याऊॅं करदेती।।

भ्रम का भूत लोगों में, घुंसकर घर बना लेता।

उनके दिल दिमाग को , क्षत- विक्षत किये देता ।।

भ्रम के जाल में दोनों, भटकते ही सदा रहते ।

पतन अपना करा लेते ,जनता को भी पिस देते।।

रूह गणतंत्र का क्या है, समझते ही कहां सब हैं।

वर्ष बीते तो सत्तर साल ,पर समझें न अबतक हैं।।

समझें भी भला कैसे , बताया ही कहाॅं कोई क्या?

फुर्सत समझने की उन्हें, मिल पायी भी है क्या ??

उल्टी बात बतला लोग को, मूरख बना देते।

है जनता आज भी भोली,बस मतलब सधा लेते।।

जनता मूर्ख रह जाये, उन्हें है फायदा इसमें।

उल्टी बात समझाना इन्हें, आसान हो जिसमें।।

गरीबी से पनपकर जो ,नेता बन उभर आते ।

गरीबी चीज क्या होती, बस वे ही समझ पाते।।

जिस दिन देश की जनता, बातें सब समझ जाये।

तभी उस देश की हालत तो,स्वतः सुधर जाये ।।

अपना संबिधान.

ऐ निर्माताओं संविधान के,हमसब आदर करते तुमको।

रचा आपने संविधान, सम्मान सभी करते तुमको ।।

आभारी हमसब तेरा,नमन तुम्हें हमसब करते हैं।

श्रद्धा का सुमन बड़े प्रेम से,अर्पित तुमको करते हैं।।

बड़े लगन और बड़े प्रेमसे, तुमने है निर्माण किया।

वतन के हर तबकों पर, तुमने कितना ध्यान दिया।।

किया ख्याल सारे लोगों का, विकास करेगे सब कैसे।

किसे मदद करनी है ज्यादा, लोग बढ़ेगें सब कैसे ।।

छोटी बड़ी समस्याओं पर, तुमने कितना ध्यान दिया।

चतुराई से उन सब को , कैसे आप निदान किया ।।

भीमराव अम्बेडकर जी,याद सदा आते हैं ।

सभी सदस्यों ,सहयोगी का, धन्यवाद करते हैं।।

अथक परिश्रम आप सबोंने, करके है निर्माण किया।

बहुमूल्य समय अपनादेकर,नियत समयपर पूर्णकिया।

जबतक सूरज चाॅंद रहेगा,भारत में तेरा नाम रहेगा।

संविधान की बात चले तो, निर्माताओं तेरा नाम रहेगा।

गणतंत्र दिवस को राष्ट्र-ध्वज , जैसे ही हम फहराते।

मन-मस्तिष्क में संविधान का,ध्यान स्वयं आ जाते।।

बिना अपना कोई संविधान के,देश नहीं चल सकता है।

मेरुदंड ही नहीं जिसे , क्या खड़ा स्वयं हो सकता है ??

ऐ निर्माता ,ऐ मेरे पूर्वज ,तेरे पथ पर चलता जाऊॅंगा।

कदम नहीं डिग पाये पथसे,कसम आज मैं खाऊॅंगा ।।

जो कुछ कर दिखाते हैं.

दुनियाॅं तो रंग बदलती है,लोगों की बदल जाती नीयत।

साथसमयके सभीबदलते,इन्सांकी बदलजाती फितरत

समय बदलता लोग बदलते,लोगोंका सोच बदलजाते।

जो नहीं बदलते संग युगके,मुख्यधारा से,छुट जाते ।।

बहुत ही कम होते जगमें,जो धाराके बिपरीत लड़े।

जगमें फैली विश्वास-अंध को,जूझ-जूझकर खत्मकरे।।

बहुत कम होते लोग यहाॅं, जो यह सब कर पाते हैं ।

पुरुष नहीं होते केवल, युग पुरुष वही होते हैं ।।

पैदा होता बहुत दिनों पर,कभी -कभी कोई एक।

वैसे तो नित होते पैदा, जग में लोग अनेक ।।

रत्न अनेकों हैं सागर में,पर किसे कहाॅं मिल पाता है।

कभी-कभी बिड़ले लोगों को,हीतो वह मिलजाता है।।

पूर्ण लगन से भिड़े जो होते,कर वे कुछ दिखलाते हैं।

तन-मन-धन सारे कुछ देते,वेही तब कुछ कर पाते हैं।।

पाने से पहले जीवनमें, खोना तो कुछ पड़ता है।

पठन-पाठनकर स्वयंहै तपता,वही कुछतो कर पाताहै।

कहते हैं कुछ लोग यहाॅं,मानव खुद भाग्यविधाता है।

अपने कर्मों को खुद ही कर,अपना भाग्य बनाता है।।

सदा नमन के योग्य वे होते, जो कुछ कर दिखलाते हैं।

आदर और सम्मान जगत के, लोगों से वे पाते हैं।।

माना लोग बहुत हैं थोड़े,जो देकर जग को जाते हैं।

परमार्थ वही हैं कर पाते, लोगों को पथ दिखलाते हैं।।

कृति उनकी सदा चमकती,श्रद्धा का सुमन चढ़ाते हैं।

नमन लोग दिलसे हैं करते,नत-मस्तक हो जाते हैं।।

सोंच, दुनियाॅं का बदला होता.

ज्ञान मानव का मानव , बिगाड़ा न होता।

हाल दुनियाॅ का ऐसा , हुआ ही न होता।।

ज्ञानियों में ठगी चल रही ,आज जमकर ।

ठग ही बैठे बने ,ज्ञानी का रूप धर कर ।।

कौन असली यहाॅं ,कौन नकली यहाॅं ।

या सबके ही सब , आज नकली यहाॅं ।।

बहुत ही कठिन आज, है जान पाना ।

कौन असली या नकली , इसे ही बताना।।

आज शिक्षा का मतलब है, दौलत बनाना ।

मिले चाहे जैसे , उसे लूट लाना ।।

शिक्षा कहाॅं आज , मानव बनाता ।

सिर्फ दौलत कमाने का ,साधन बनाता।।

पाठ नैतिकता का , नहीं आज होता ।

चलता फिरता हुआ , एक टकसाल होता।।

देश -हित में नहीं , कुछ किया अब है जाता ।

सिमट भाषणों तक , केवल रह है जाता ।।

आज नेता और जनता , दोनों एक जैसे ।

सुधरेगा भला ये, समां अब ये कैसे ।।

भ्रष्टाचार का , बोलबाला यहाॅं हैं ।

काम इसके बिना यहाॅं ,होता कहाॅं है??

भ्रष्टाचार रग में, घुंसा जा रहा है ।

रोक पाना तो सम्भव,नहीं लग रहा है।।

रोक पायेगा उंनको , मसीहा जो होगा ।

रुप मानव का पर,उससे ऊपर का होगा।।

काश !मानव में मर्ज ये ,हुआ गर न होता।

सोंच दुनियाॅं का , बदला हुआ आज होता।।

मेरे साकी सा कोई और नहीं.

ऑंखों से ही पीते -पिलाते उन्हें,जाम टकराना उनको पड़ता नहीं।

साकी रहती सदा उनकेऑंखो में ही,दूसरी कोई मन को लुभाती नहीं।।

ऑंखों से ही सुरा जिनकी छलकी करे,साकी ऐसी कोई,है ही नहीं।

पूरे जगत में अकेली है वह,दूसरी कोई वैसी बनी ही नहीं।।

भर नजर देखले चाहे कोई इन्हें,जाम पीनेकी,उनको जरूरत नहीं।

मस्ती छा जाती उनकी झलक देखकर,चढ़ती जल्दी पर जल्दी उतरती नहीं।।

मस्ती की मजा उनकी लेते हैं जो, दूसरी अन्य उनको तो भाती नहीं।

सारी ही मस्तियां उनको फीकी लगे,जो मिलती यहाॅ ,मिल पाती नही।।

यूॅ तो मस्ती अनेकों जगत में भरी,पर ऐसी नशा सबमें आती नहीं ।

डूबते जो भी जल्दी निकलते नहीं,नशा दूसरी दिलको भाती नहीं।।

जाम ऑखों में तेरी गयी है भरी, शुक्रिया कोई किया या किया ही नहीं।

मैं करता नमन अपने कर जोड़ कर,करना स्वीकार,इन्कार करना नहीं।।

यूॅ तो पीने-पिलाने में होती ही देरी, है सबको पता कोई अनभिज्ञ नहीं।

शुरूर चढ़ता तो चढ़ता चला जाता है,भान उनको समय का होता ही नहीं।।

पीने वाला कभी’ बस’ तो करता नहीं,कहता कहाॅ ,अब

नहीं ,अब नहीं ‌।

कोई पीनेवाला ,गर कह दे नहीं, समझे असली पियक्कड़ हुआ ही नहीं।।

है भी अगर तो बहुत जूनियर,गिनती के लायक कहें ही नहीं ।

इनको कर दो अलग,पियक्करों की सूची से, शर्त भी तो ये पूरी , करते नहीं।।

सीखने की जरूरत है काफी अभी,अच्छी तरह इसने सीखी नहीं।

प्रवीणता में थोड़ी कसर रह गयी, मधुशाला में प्रवेश काबिल नहीं ।।

लो गंभीरता से इन शर्तो की बातें,लेना कभी उनको हल्का नहीं।

बहकना है बहके पर ज्यादा नहीं,सर तक पहुंचने दो पानी नहीं।।