कभी मुॅह खोलता नहीं.

जिसने बनाई दुनियाॅ ,कभी कुछ बोलता नहीं ।

छिपा सब भेद को रखता ,कभी मुख खोलता नहीं।।

जगत में चीज जितनी है , सभी उनके नजर में है।

कौन क्या कर रहा कहां, छिपा उनसे कहाॅ कुछ है??

नज़रों से कभी ओझल , नहीं कुछ भी हुआ करता।

कहां कुछ कर रहा कोई, खबर उनको रहा करता।।

मर्जी के बिना उनकी, खड़क पाता नहीं पत्ता ।

उनकी बिना ईच्छा , कहीं पर कुछ नहीं होता।।

कुछ भी कहीं होता , सब कुछ वही करता ।

कहते वह नहीं करता,तो कुछ भी नहीं होता।।

सारे जीव-जंतु को , वही भोजन कराता है।

कितना चाहिए उसको,वही सब कुछ पठाता है।।

आहार किसका क्या , वही निश्चित किया करता।

अनुरुप ही उस जीव क़ो, सबकुछ मिला करता ।।

जिसे जैसा बनाया है, वैसा सब उसे मिलता ।

जो घास खाता है , उसे तो घास ही मिलता ।।

खाती चींटियां मीठा , उसे मीठा मिला करता।

जो माॅस भक्षी हो , उसे तो माॅस ही मिलता ।।

बनाई जो भी हो दुनियाॅ , क्या खूब बनाई है।

जरूरत की सभी चीजें, वाखूब बनाई है ।।

कैसे जी लेते हैं.

(गजल)

पीने का कुछ न कुछ तो,बहाना बना देते हैं।

उठा के जाम सभी , जहर का, पी लेते हैं।।

पता सभी को है, ये चीज है बहुत ही बुरी ।

फिर भी उस जाम को, होंठों से लगा लेते हैं।।

ज़िन्दगी छोड़कर ,जाना तो है, निश्चित ही कभी ।

कुछ लहमों को , खुद यूं ही ,लुटा देते हैं ।।

बनाने वाले ,बनाया तो , यूं ही सब को ।

पर वे अपनों को , गैरों सा बना देते हैं ।।

खुद ही पीते हैं मगर, देते नहीं, तोहमत खुद क़ो।

इल्जाम कुछ ढ़ूंढ़ कर, औरों पे लगा देते हैं ।।

खुद ही बेहोश रहते , न होता होश उन्हें ।

इल्जामे बेहोशी का , पीने का लगा देते हैं।।

जो पीना नहीं जाना.

तुझे मैं भूलना चाहा , मेरा दिल भूल न पाया।

तेरी याद की तोहफा , दिल से जा नहीं पाया।।

कर के देख ली कोशिश ,अथक प्रयास कर डाला ।

कहाॅ मैं भूल पाया कुछ, उल्टे बढ़ा कुछ डाला ।।

भटकता देखकर मुझको, शरण दी प्यारी मधुशाला।

भुलाने केलिये गम को , थाम ली , मय का मैं प्याला।।

सुबह जब आंख खुल जाती ,थामता हाथ में प्याला ।

निरंतर यह चला करता ,खुला जब तक हो मधुशाला।।

यही हमको सुलाती है,यही हमको जगा देती ।

यही एक है सखा सच्ची,सदा जो काम है देती।।

असर जब तक रहा करता, सारा गम भुला रहता।

असर कमता मधु का जब , गम भी पलट आता ।।

खुदा भेजा है दुनियाॅ में, शायद गम भुलाने को।

साकी साथ दे रखा, मय सब को पिलाने को ।।

हलक से जब उतरती है, गमों को दूर कर देती।

सबकुछ भूल जाने को, उसे मजबूर कर देती।।

कहाॅ गिर जाये वह पी कर ,रहता गम कहाॅ उसको।

कुत्ते शू करे मुॅह पर , पड़ता फर्क क्या उसको ।।

गमों से दूर रखती है ,उसे आनै नहीं देती ।

गम चाहे वो जैसा हो, खटकने पास न देती ।।

यह बरदान है भेजा , खुदा ने मय औ मयखाना ।

भला वह मर्म क्या जाने , जो पीना ही नहीं जाना।।

बहुत कम लोग खुशियां बांटते.

बहुत कमलोग ऐसे हैं,जो खुशियां बांटते रहते।

गमों को स्वयं पी लेते , जाहिर तक नहीं करते।।

संख्या कम बहुत होती , ऐसे लोग जो हो होते ।

सच्चाई जीवन की , यही कुछ है समझ पाते ।।

महत्व अपनी जिंदगी का , कम बहुत देते ।

समर्पित लोग को अपनी , कर जिंदगी देते।।

पैदा लोग होते यूं , अनेकों रोज दुनिया में।

कितने कम दिखा पाते है कर,आतेजो दुनिया में।।

शकल सूरत से तो सारे ही,लगभग एक ही होते।

थोड़ा सा फर्क बुद्धि में,शकल में फर्क कुछ रहते।।

बुद्धि सब को होती है, दिशा में फर्क होता है ।

जो जिस राहपर चलता , वहीं पर वह पहॅचता है।।

अच्छा बुरा का सोंच तो ,सब में हुआ करता ।

कोई जन्म से ही दुष्टता , लेकर नहीं आता ।।

पर परिवेश का उनपर असर,होता ही होता है।

बहुत अपवाद में होते ,जिनपर कुछ न होता है।।

बहत बिरले ही कुछ होते, विलक्षण जो हुआ करते।

विषम परिस्थितियाॅ उनको ,बिगाड़ा कुछ नहीं करते।।

निपटने को सभी बाधाओं से,उनमें शक्ति निहीत होती।

आती कभी बाधायें , आकर लौट भी जाती ।।

जिनमे हौसला निस्वार्थ हो , परम पावन बड़े होते।

आती कभी बाधायें, नमन कर लौट भी जाते ।।

गंगा तेरी गजब कहानी.

(जिंदगी की पहली कविता , आपकी सेवा में)

किया भगीरथ कठिन तपस्या ,लाया धरती पर तुम्हें उतार।

उद्धार किया अपने पुरखों को,शिव जटा से तुम्हें सम्हार।।

हुई पावन धरती,हुए धन्य जन, लोग तुम्हारे आने से।

जीवन मिला असंख्य लोग को,तेरा अमृतजल पाने से।।

तेरे गुण के गाथाओं का, में तुच्छ प्राणि क्या गाऊंगा?

थोडी सी बातें ही बस,, कुछ तोड़ फोड़ कह पाऊंगा।।

तेरे जलकी महिमा को मैं, जितना सुनता जाता हूॅ।

नयी -नयी कुछ चीजें उसमें,नित्य जानता जाता हूॅ।।

सुनता हूं तेरे नाम मात्र यम, भाग दूर हो जाता है।

श्रद्धा और स्नान ध्यान से ,पीड़ा मन का मिट जाता है।

पर हाय! तुझे मानव माॅ , जिसमें जीवन का संचार किया।

वहखुद अपने हाथों तुझपे,क्या-क्या अत्याचार किया।

तुम थी निर्मलवह मल डाला,की गन्दी तेरी दामन को।

हया शर्म सब भूल चुका,की अपनी मनमानी को ।।

थी पूज्य , नहीं पूजा मानव ,देवस्थल का अपमान किया।

पूजा के बदले मनोरंजनका,कुटिल कार्य संधान किया।

माॅ कुपित हुई थोड़ी मन मन,बस किंचित ध्यान हटाई थी।

आसमान से तब थोड़ा,नव संदेशा आई थी ।।

वत्स तोड़ मत हद को तूं,बस तुझे बुझाये देती हूं।

मत छेड़ प्रकृति को हरदमतूॅ,बस तुझे बतायेदेतीहूॅ।।

वाणों से धारा रोक देवव्रत,माॅ से खेला करते थे।

थोड़ी सी रुक मां स्नेहमयी,निज मार्ग गमन वे करतेथे।

सबकाम प्रकृतिको करनेदे,निज धर्म निभाने दे उनको।

थी पावन बड़ी ,बड़ी निर्मल थी,वैसा ही रहने दे उनको।

लय है सारी चीज़ें तुममें .

उठती रहती बातें मन में ,विलीन उसी में हो जाती।

सागर की लहरों ही जैसी ,लय भी उसमें हो जाती ।।

लहरें छोटी तो बड़ी कभी ,पर लौट नहीं जाती ।

मन में जोश उपजता रहता, स्वयं लुप्त होती रहती ।।

जानें तट को क्या कर देगी ,जैसे उन्माद लिये आती।

काफूर स्वयं कहाॅ हो जाती ,यह भी नहीं पता चलती।।

उठना ,गरना ,लय हो जाना,उनकी यही नियति होती।

जाने कब ,युगों-युगों से , क्रिया यही होती रहती।।

हृदय विशाल सागरसे ज्यादा,ब्रह्माण्ड समां भीसकता।

कितनी चीजें लय है उसमें, उसे कौन कह सकता ।।

सारी चीजें लय है इसमें ,जो भी ढ़ूंढ़े मिल सकता ।

कहाॅ पड़ी है चीजें कैसी ,ज्ञान जिसे हो सकता ।।

तेरी प्रकृति बहुत बड़ी , अथाह है तेरी दुनियाॅ।

भरे पड़े न जाने कितनी, कहाॅ कौन सी निधियाॅ।।

सारी चीजें लय है तुममें, ज्ञात उसे करना पड़ता ।

समझ लियाजो इनकी बातें,सबकुछ उन्हें सुलभरहता।

धन्य प्रकृति हो तुम कितनी, धन्य तुम्हारी है रचना।

कितनी चीजें तुम दे रखी,है मुश्किल तुझे समझ पाना।

हो तुम अथाह ,तेरा थाहनहीं,संभव क्या थाह लगाना?

नहीं किसी ने थाहा अबतक,आसां ;असंभव कहदेना।

जो भी हो दुनियाॅ निर्माता, नमन उन्हें मैं करता ।

श्रद्धा का सुमन,चरण पर उनके, मैं अर्पित हूॅ करता।।

कभी कुछ सहना पड़ता है.

जहर का घूॅट भी पी कर, कभी चुप रहना पड़ता है।

देख सच्चाई का दबते गला,मौन हो रहना पड़ता है।।

इस जालिम दुनियाॅ में, बहुत कुछ देखना पड़ता ।

अनिच्छा से किसी का जुर्म ,सहन भीकरना पड़ता है।।

धिक्कारती,जब कभीआत्मा,समझौता करना पडताहै।

बहुत ही मुश्किलें आती , हल तो करना पड़ता है।।

कुछ भी करने के कबल, ख्याल कुछ करना पड़ता है।

समय और परिवेश पर , ध्यान तो देना पड़ता है ।।

बहुत प्रभाव पड़ता है, समय ,परिवेश का सब पर।

समय अनुकूल या प्रतिकूल को,समझना पड़ता है।।

अच्छी बात लोगों के, मन को नहीं भाता कभी।

उस माहौल में चुपचाप तो,रहना ही पड़ता है।।

महत्व मिलता नहीं हो आपकी, बातों को जहाॅ ।

वहाॅ चुपचाप रहना ही ,बेहतर जान पड़ता है ।।

बुराई देखकर भी मौन रहना, अनुचित कही जाती।

असर पड़ता नहीं उस पर ,तो कहना ब्यर्थ होता है ।।

समय अनुकूल होता है, तो सारा काम बन जाता ।

असामयिक कुछ भी करें, बेकार होता है ।।

समझौता परिस्थितियों से,कभी करना ही पर जाता।

अनिच्छाबस कुछ काम मनुज को,करना पड़ता है।।

चुपचाप करना इन्तजार, भी कभी अच्छा ।

हथौड़ा गर्म लोहे परपटक,कामतो करनाही पड़ता है।।

विश्व को भारत दिया.

‘बसुधैव कुटुम्बकम ‘भावना , विश्व को भारत दिया।

अब सिमटते सिमटते, कितना न जाने सिमट गया।।

दे ज्ञान हमने विश्व को, हम बने थे विश्व -गुरु ।

लुप्त होते जा रहे अब , अज्ञानता हो गये शुरू।

उदंडता का अंधकार , देश में छाने लगा ।

नई पीढ़ियों पर नशे का, उन्माद भी चढ़ने लगा।।

भौतिकता अब धुंध बनकर, छा रहा संसार में।

सब को ढ़कते जा रहा , यह धुंध ही संसार में।।

बच पायेगा इससे अछूता, लोग कम वैसा रहेगें।

जो भी रहेगें ,नगण्य होगें , प्रताड़ना सब का सहेगे।।

उग्रता हर लोग में ही , नित्य बढ़ती जा रही ।

सहनशीलता हर लोग से , रोज कमती जा रही।।

समय का प्रभाव है या , असर यह आहार का ।

प्रत्यक्ष पर दिखती कमी है, हमलोग में अब प्यार का।।

लोभ लालच का असर ,हर लोग में ही बढ़ गया ।

प्रेम का प्रभाव तो , हरलोग में ही कम गया ।।

अपनेआप में ही सिमटते , जा रहे हर लोग अब ।

समाज का कल्याण को तो , सोंचता कमलोग अब।।

घट रही अब दायरा ही, आदमी का सोंच का ।

यह ईशारा है नहीं क्या , संकीर्णता है सोंच का ।।

रोग फैला जा रहा यह ,गर नहीं रोका गया ।

तो समझ लें आदमी एक, जानवर रह जायेगा।।

ये ऑखें तेरी .

कितनी प्यारी लगती है , ये आॅखें तेरी ।

बस गयी चंचल वे आॅखें ,आॅखों में मेरी ।।

नजर के सामने हरदम, तूॅ रहती है मेरी ।

सिर्फ ऑखो में नहीं , दिल में भी जगह तेरी।।

चाहता भूल जाऊॅ मैं , पर जाती नहीं छबि तेरी।

जगह बना ली है , वहां इतनी गहरी ।।

किया है लाख यतन , मिटाने को यादें तेरी ।

मिटाये मिटती ही कहां ,थक करमैं हिम्मत हारी।।

खुदा की ओर से, मिली ये तोहफा तेरी।

कितनी है आकर्षक,, कितनी ये है प्यारी ।।

भर नजर देख ले जो , आपकी आॅखें प्यारी ।

खो जायेगा होश ,भुल जायेगी दुनियां सारी।।

जिसने भी बनाई होगी , उन आॅखों को तेरी ।

समझ न पाया होगा ,क्या है कमालियत तेरी।।

दुनियाॅ बनाने वाले ही , आॅखें बनाई तेरी ।

आॅखें बिना तो जीवन, मकसद विहीन तेरी।।

आॅखें ही दिखाती सब जो ,प्रकृति बनाई तेरी।

ऑंखेविहीन दुनिया, रहती सदा अंधेरी।।

कल्पना की आंखें भी कम नहीं तुम्हारी।

कहते रवि न जाता, पर है पहुँच तुम्हारी।।

कुछ और वे करते.

जिसने बनाया आदमी , कुछ और कर देते।

एहसान यों काफी किये , थोड़ा और कर देते।।

श्रेष्ठ जीवों में बनाया , कुछ और क्या करते ।

भरे जो लोभ,लालच को ,थोड़ा और कम भरते।।

दिये विकृतियों में ही, भटकता रह गया मानव।

बनाया आप का ही जाल में,उलझा रह गया मानव।।

सुपथ पर ही चलाने का, जब उद्देश्य ही था आपका।

पथ तो बताना भी उसे, कर्तब्य पर था आप का ।।

भवसागर में डालकर क्यों, उसे अकेला छोड़ दिया।

बिना सिखाये तैरना ,फेंक उसे क्यों छोड़ दिया ।।

यूॅ हमें डुबोते उतराते तो, भवसागर को पार कराया।

हमें यहाॅ क्या करना होगा,दिशा निर्देशभी नहीं कराया।

क्या करनाहै जग में जा कर,बात यही तो नहीं बतायी।

समझाया हो तो हो सकता है, बातें हमको समझ न आयी।।

करें कृपा मानव पर इतनी, निर्देश हमें थोड़ा देदें।

गर समझ रहे हो तो मानव को,राह सही बतला दें।।

फिर भी पथपर नहीं चले तो, विवस उसे है कर देना।

गर रोग दूर करना है तो,कड़वा भी घूंट पिला देना ।।

स्वस्थ्य उसे है रखना तो, मीठा कड़वा का मोह नहीं।

चाहे जो करना पड़ जाये, करना कोई क्षोभ नहीं ।।