फूलों को गले लगायें.

फूलों को गले लगायें ,पर वहां भी सावधानी से।

भरे होते जहां कांटे , ध्यान रखने ही पड़तै हैं।।

आंखें खोल कर रहिये , बिलकुल बंद मत करलें।

भरोसा कीजिए, पर ध्यान तो देने ही पड़ते हैं ।।

भरोसा कीजिए, भरोसेमंद पर, सावधानी बरत कर।

चलेगें बंद कर आंखें , ठोकर खा ही सकते हैं ।।

दिया है देनेवाले ने तुझे, आखिर दो दो आंखें क्यों?

यही कुछ बात को समझें,कारण कुछ हो ही सकते हैं।।

चुभन तो हर जगह होता ,गुलाब कांटे भरे होते ।

सम्हल पर तोड़ने वाले, मजे से तोड़ लेते हैं ।।

कहीं गर चूक हो गई तोड़ने में, गुलाब पौधे से ।

चुभ जायेगें काटे उन्हें भी, कहां बख्सते हैं ??

जो दिखते हर तरह सुंदर, सब की निगाहों से ।

खुनुस उनमें भी हो सकते ,जिसे छिपाये होते हैं ।।

धधकते दिल में हों शोले , चेहरे शांत पर दिखते ।

मन की बात को मन से , न बाहर जानें देते हैं ।।

खतरनाक होते हैं बड़े , कुछ शख्स वैसे जो ।

भीतरघात करने में, बड़े माहिर ये होते हैं ।।

बाहर के दुश्मन से तो कुछ , आसान होता है निपटना।

मश्किल है निपटना जो , आस्तीन का सांप होते हैं ।।

शिक्षा जहां महंगी

शिक्षा हो जहां महंगी ,बता क्या देश का होगा?

शिक्षा सिर्फ अमीरों के लिये,गरीब का हाल क्या होगा?

बंचित हो रहे कितने, मेधा साथ में रख कर ।

विवस हो कर पड़े हैं पस्त , धन की मार खा-खा कर।।

ब्यवस्था ही हमारे देश की , चरमरा सी गयी ।

जनता चोर बनने को , लगभग विवस सी हो गयी।।

मेधा हो गया बेकार , दिया है डाल खुद हथियार।

गरीबी दाब कर उसको , बिलकुल कर दिया लाचार।।

अगर फिर भी न माना हार,करता रह गया ललकार।

शिक्षा पा लिया ऊं चा, भले ही बिक गया परिवार ।।

चयन हमकर जिन्हें भी , देश की चाभी थम्हा डाली।

उन्ही ने लूट मेरे देशकी, तिजोरी कर दिया खाली ।।

नंगा कर दिया हमको, बड़े तरतीब से लूटा ।

बेशर्मी से बनाया मुर्ख , धूर्त से कुछ नहीं छूटा ।।

बिल्ली ही हमारी आज, हमपर म्याऊं करती है।

दही की खा गयी छाली हमारी,हम्हींपर गुड़गुराती है।।

जिसे रक्षक बना भेजा , बन भक्षक वही बैठा ।

लूटा ही न केवल देश को, कर्जा में डुबो बैठा ।।

सुबिधाये जितनी हो सकी, अपनें लिये रखा ।

जनता को झूठी सान्तवना दे,फांस कर रखा ।।

सुरक्षित कर दिया खुद को ,सुरक्षा जेड का पाकर।

जनता का किया शोषण , बड़े ही शान से जमकर ।।

बनाया है तुझे जिसने, उसीपर जुर्म करते हो ।

अरे बेशर्म तो सोंचों जरा , क्या कर्म करते हो ।।

शिक्षा ज्ञान का मंदिर का, भी ब्यवसाय कर डाला ।

देश की आत्मा का तूं , घृणित ब्यापार कर डाला ।।

नयी पीढ़ी जो निकलेगी , बता क्या बात सोंचेगी?

उसे कितना सताया है , नहीं क्या बात सोंचेगी ??

भावना देशभक्ति की , क्या भरने नहीं दोगे?

सोचों देश की क्या दुर्दशा, करके ही छोड़ोगे??

गुलामी से भरा एक रास्ता , है नही यह क्या ?

कदम उस ओर ही बढ़ते, नहीं हम जा रहे हैं क्या??

मानव ,मानव रहा कहां?

अब तीब्र तो चलना सीख लिया, द्रुतगति अपनी पकड लिया।

जिन राहों से है हमें गुजरना,ऊबर-खाबर अवरोध भरा।।

है बहुत कठिन चलना इसपर,ले जाये गणतव्य जिधर।

कहीं भटका भी सकता है यह,ले जा सकता जिधर तिधर।।

कोई कहां बताने वाला है, जितना है सब मतवाला है।

पथ पता नहीं उनको खुद ही,पथ कहां येजानेवाला है।।

कुछ पूछो कुछ बतला देगा, उल्टा पुल्टा समझा देगा।

स्वय उसे है ज्ञात नहीं,उन बातों को यहां छिपा लेगा ।।

परिणाम भला फिर क्या होगा,पथभ्रष्ट सभी हो जायेगा।

भटकेलोगो ही भटकों को,सोंचो क्या राह बतायेगा।।

सब केवल चलते जायेगें,गणतब्य पहुंच न पायेंगे।

रहा तो तीब्र गति से चलते ,पर इर्द-गिर्द रह जायेंगे।।

कोई नहीं जाननेवाला है ,जो राह सही बतला सकता।

जिस पथपर चल कर पहुंच गये,उन राहों को दिखला सकता।।

बातें ही लोग बनाते गये , कोई नहीं जो चलकर पहुंच गये।

जो पहुंच गये वह भी शायद, नहीं अगले को बतलाते गये।।

उनकी सब बातें गुप्त रही, कुछ साथ दफन उनके हो गयी।

शनै-शनै सच्ची बातेंं भी ,आडंबर बनकर रह गयी।।

कुछ धूर्त लूटने में लग गये,राहें वे गलत बताते गये ।

भोले-भाले इन्सानों को,सत्-पथ से दूर कराते गये ।।

मानव मानव का शत्रु बना ,मानव मानव को लूट लिया।

काम,क्रोध,मद, लोभ मनुज पर,अपना कब्जा जमा लिया।।

मानव अब मानव रहा कहां,चौपायों से बेहतर रहा कहां?

चौपाया ही इनसे निकल गया ,गरिमा इनकी बची कहां??

फिर भी वे गर्व से फूले है,मद की मस्ती में डूबे हैं।

चौपायो से भी श्रेष्ठ नहीं,मस्ती में अपने फूले है।।

आता समझ में कुछ नहीं

आता समझ में कुछ नहीं,किस किस को मैं छलिया कहूं।

नज़रें घुमाकर देखता क्या, हैं जितने सब को कहूं।।

दिखते सभी हैं एक जैसे, चाहे जिधर नजरें करूं।

बाएं करूं, दाये करूं , ऊपर करूं ,नीचे करूं ।।

जब गहराइयों में देखता, बस एक सा दिखते सभी।

अस्पष्ट जो दिखते थे थोड़े ,स्पष्ट वे दिखते सभी ।।

गहराइयों का हद नहीं, ऊंचाइयों का भी नहीं ।

जहां पहुंचना चाहता जो, पहुंच जाता है वही ।।

छल से भरा है दिल सबों का ,वंचित यहां कोई नहीं।

ज्यादा किसी में ,कम किसी में ,फर्क बस केवल यही।।

जिसमें भरा था छल बड़ी,कहला गये भगवान वे ।

दे नाम छलिया कोई पुकारे,हरगिज बुरा न मानते वे।

पर छल किया उसनेे नहीं,निज सर्वार्थ साधन केलिये।

छल में छिपा परमार्थ था, समाज रक्षण के लिये ।।

तब की जरूरत के लिये,जो काम करना था किये।

सब जुर्म अत्याचार से,किस ढंग से रक्षा किये ।।

समाज जो बिगड़ा पड़ा था,जोड़ा सबों को एक साथ।

टुकड़े बनें बिगड़े पढ़ें थे, सबको मिलाया एक साथ ।।

सुकर्म करनें को कहीं पर, कुछ सख्त होना धर्म है ।

जैसे शल्य-चिकित्सक कोसदा , चाकू चलाना कर्महै ।।

चाकू चला जो जिन्दगी , देते बडा वे महान होते।

चाकू चलाजो जिन्दगी, हरते भी वे क्या महान होते??

मुक्तक

(१)

जो आदत लग जाती जिनको, छोडे छूट नहीं पाती।

छोड़े भी चोरी चोर मगर, तुम्बाफेरी तो रह जाती ।।

होती ही आदत बुरी बला , लोग सभी हैं ये कहते।

इसे त्यागना कठिन बहुत है, जल्द नहीं जा पाती।।

(२)

कुकर्म सदा जो हैं करते , डींगें हरदम मारा करते।

पर सुकर्म करने वाले, बातें अधिक नहीं करते ।।

कहते बर्तन जो खाली होते, खनका अधिक वहीं करते।

ज्ञान भरा होता है जिसमें , गंभीर समंदर सा होते ।।

(३)

जो गंभीर समंदर सा होते , कुछ करके वही दिखाते हैं।

जो बातें अधिक नहीं करते , उन्हें राह न कोई पाते हैं।।

आसान समझना उन्हें न होता, जल्दी कोई समझ न पाते हैं।

पर जो दृढ़ , अंचल,अटल होते,जग में नाम कमाते हैं।।

दुख बांटो मत अपना

मत कभी सुनाओ अपनें दुखड़े,मत दुख बांटो अपना ।

दुखड़ा देता न खुशी किसी को,फिर चर्चा क्या करना ।।

शुभचिंतक हो या नहीं ,किसी को सदा ब्यर्थ है कहना।

मन की बातें मन में ही रखते,कहकर भी क्या करना ।।

बांटो खुशियां शुभचिंतक को,खुश होगें वह सुनकर।

उनमें भी कुछ होगें वैसे , दुख होगा जिनको सुनकर।।

दूसरों की खुशियां से दुख पाते, ऐसे लोग न कम हैं।

सहन सुख दूजे का करने का , कितनों में यह दम है।।

मत्सरियों की कमी नहीं , बेहद संख्या उनकी है ।

जिधर देखिए, वहीं दिखेंगे ,उनकी संख्या इतनी है।।

फिर भी दुनियां चलती जाती , सोंच यही क्या कम है।

देखो जगवालों में भी ,उत्साह नहीं करता कम है ।।

बहुत लोग कम होते ऐसे ,जो स्वयं छिपा लैते दुख अपना।

दिल के अन्दर अवसाद भरा हो ,फिर भी बाहर से हंसना।।

नहीं भाव तक दुख का अपने ,चेहरे पर आने देते ।

नहीं शिकन भी वे मुखड़े पर , परिलक्षित होने देते।।

ये कलाकार न होते केवल , कर्मबीर हैं होते ।

प्रविण कला में सिर्फ नहीं , कुशल हर कर्मों में होते।।

कूट-कूट गुण भरा हुआ हो , सम्पूर्ण हृदय में जिनका ।

कितने महान वे होगें ,हृदय में हो दोनों जिनका ।।

दुनियां का इस रंगमंच पर , कुछ कलाकार ऐसे होते ।

जीवन में जिनका कष्ट भरा हो, हंसते और हंसाते रहते।।

जोकर जिनका नाम दिया,जो हंसते और हंसाते रहते ।

दुखी अगर हो जाते भी तो , जाहिर नहीं किया करते ।।

प्रकृति चलती अपने नियमों से।

प्रकृति मानव को भेजी है,धरती पर सब कुछ दे कर।

अति जरूरत की सब चीजें, उनके खातिर निर्मित कर।।

खाने को फल-फूल दिये, विभिन्न पेड़ पौधे दे कर ।

खट्टे मीठे स्वादिष्ठ फलों को , उनमें फलां फुला कर ।।

मीठा जल प्रवाहित करती,सरिता लाती कल कल कर।

झरनें करती नाद बनों में ,झर-झर कर झर कर कर।।

वन्य-प्राणियां आती जाती , अपनी प्रयास बुझा कर ।

निसक प्राणियां लुक-छिप आती ,पर शक्तिवान अकड़कर।।

जंगलराज इसी को कहते ,रहते एक दूजै से डरकर ।

नहीं सुरक्षित कोई रहता , उस जंगल में रहकर ।।

इन्हे मौका ज्यों ही मिल जाते ,लेते दबोच झटक कर ।

प्रवल शत्रु एक दूजे का ये ,एक साथ में रह कर ।।

आदिमानव अलग हुए कुछ , अपना ज्ञान लगा कर ।

लाया परिवर्तन रहन सहन में , अपनी ही बुद्धिबल पर।।

हम धीरे-धीर सभ्य हुए , कुछ अपना ढ़ंग बदल कर ।

कभी कभी कुछ राह बदल तो , बंदिश कहीं लगा कर ।।

बिना नियम कुछ काम न होता ,रहना पड़ता सब को बंधकर।

ब्रह्माण्ड फेल हो जायेगा , अपनें नियमों से हट कर ।।

प्रकृति सदा चला करती है , अपने नियमों में बंध कर।

उनको पालन करना ही पड़ता ,प्रतिक्षण सम्हल सम्हल कर।।

प्रकृति के राहों पर जब कोई ,आता अवरोध बनकर।

परिणाम बुरा कर देती है तब ,उनको तहस नहस कर ।।