देख यही कलियुग का खेल

बाबूजी द्वारा रचित आज की वस्तुस्थिति का चित्रण करती एक खूबसूरत रचना पुनः पेश कर रहा हूँ। आशा है, आप सब पाठकों को पसंद आये।

सच्चिदानन्द सिन्हा

देख ज़माना बदल गया,

हैं बदल गए अब सारे खेल,  देख यही कलियुग का खेल I

पुत्र पिता पर धोंस जमाए,

सुने न तो फटकार लगाए,

डपटे, झपटे, मुर्ख बताए,

चलता उल्टा खेल, देख यही कलियुग का खेल I

पुत्र पिता का पेंशन लाए,

जहाँ -तहाँ दस्तखत कराए,

सारा माल हड़प कर जाए,

हर दम चलता रहता  खेल, देख यही कलियुग का खेल I

बापू यदि विरोध जताए,

दस्तखत को धता बताए,

अपना गर अधिकार जमाए,

देता बेटा घर में ‘सेल’, देख यही कलियुग का खेल I

बुड्ढ़ा, जीवन में किया ही क्या,

खाया-पिया और ऐश किया,

केवल पेंशन ही है लाता,

प्रोग्राम, कराता है हर फेल, देख यही कलियुग का खेल I

बुड्ढ़ा नौकरी में मर जाता,

उसका क्या काम बिगड़ जाता,

मुझे तो नौकरी मिल ही जाती,

जिया, बिगाड़ा खेल, देख यही कलियुग का खेल.

पाठशाला सरकार बनाई,

उसमे कैसा नियम लगाई,

शिक्षक का है एक न चलता,

नहीं कर सकता किसी को…

View original post 144 और  शब्द

रात नहीं, तो चंदा कैसा

‘रात नहीं, तो चंदा कैसा’ मेरे पिता जी के द्वारा लिखी श्रेष्ठ रचनाओं में से एक है। उन्हीं के आशीर्वाद से मैं इस भावपूर्ण रचना को reblog कर रहा हूँ। आशा है, आपको पसंद आये।

सच्चिदानन्द सिन्हा

जब लोग बहुत ऊॅचे हो जाते, नीचे वाले छोटे दिखते।

जरा आसमान में जाकर देखें, सबके सब बौने दिखते।।

हो जो जैसा, दिखता वैसा,वही नजर अच्छी होती।

हो जैसा पर दिखे न वैसा, दृष्टिदोष यही होती।।

आज जमाना ऐसा है, नजरें धोखा खा ही जातीं ।

होता कुछ, है नजर कुछ आता,अक्सर भूल यही होती।।

किसके अन्दर क्या है बैठा,नजर कहाॅ किसी को आता।

बाहर से है जैसा दिखता, कहाॅ वही भीतर होता।।

अंदर-बाहर एक हों, ऐसे लोग बहुत कम होते।

अंतर्मन में कचरा भर, बाहर से अच्छे दिखते।।

लोग बहुत ही विरले होते, देख नजर जो भाप सकें।

अन्दर है क्या राज छिपा, देख नजर से जान सकें।।

छोटा कौन ,बड़ा कौन है, वक्त-दशा का होता फर्क ।

कितने बड़े-बडों का इसने, कर डाला है बेड़ा गर्क ।।

सब का अलग नजरिया होता, सोच सबों का अपना होता।

महत्व सबों का अलग-अलग, वक्त सबों को देता रहता।।

जहां पर…

View original post 57 और  शब्द

गौतम बुद्ध

2015 के पन्नों से पिताजी की एक और रचना पुनः प्रस्तुत है। भगवान गौतम बुद्ध के जीवन-दर्शन की झलक दिखाती ये रचना आशा है, आप सब को पसंद आये।

सच्चिदानन्द सिन्हा

कपिलवस्तु के राजघराने

में तूने था जनम लिया I

सिद्धार्थ पड़ा था नाम तुम्हारा

तूने कर्म महान किया II

न ठाठ राजसी था तेरा

केवल थे कर्म महान I

सदा लगा था रहता तेरा

सदाचार पर ध्यान II

जीवन में घटना कुछ ऐसी

देखा और गंभीर हुआ I

ध्यान लगा सोचा जो उनपर

आगे चल वही महान हुआ II

घटना यूँ नहीं अजूबा कोई

सदा घटा करता है I

मानव मरता जब, सजा ज़नाज़ा

मरघट तक जाता है II

नज़र पड़ी सिद्धार्थ की उसपर

बुलाया, पूछा,  ये क्या है I

चार व्यक्ति मिल ले जाते हो

बता, मामला क्या है II

बात बतायी उसने सारी

अच्छे से समझाया I

मानव मरता, है जाना पड़ता

बातें सारी बतलाया II

आगे देखा, एक भिखारिन

दिन-हीन  थी हालत उसकी I

पूछा उसके पास पहुंचकर

जानी सारी  बातें उसकी II

मन में घटनाएँ घर कर गयीं

ढेरों प्रश्न उठे मन में I

जाग उठी…

View original post 262 और  शब्द

जल-संकट सुलझाना होगा

मेरे पिताजी की 2015 में लिखी ये खूबसूरत रचना जल संरक्षण के महत्व को रेखांकित करती है। आशा है , आप सब को पसंद आये!

सच्चिदानन्द सिन्हा

सम्पूर्ण धरा का दो तिहाई है,

जल ही जल,पर

मानवता,फिर क्यों हो निर्जल।

सागर का तो जल है खारा,

कुछ जल,हिमनदों में फंसा बेचारा।

शेष जो जल नदियों में आता,

धरती के जो गर्भ में जाता,

जल वही हमारे काम है आता॥

जल है, तो जीवन है रहता,

नदियां, झरनें और जंगल होता।

शांति, समृद्धि और सुख रहता,

मानव समाज का पोषण होता॥

बिन जल, जीवन शून्य है होता,

बिन जल कोई, कल भी न चलता।

बिन जल, विकास की गाड़ी थमती,

सभ्यता नहीं फिर आगे बढ़ती॥

आज के  इस शहरी युग में, पर

जल का दोहन अंधाधुंध है।

शेष बचे, उपयोगी जल पर भी,

प्रदूषण का छाया गहन धुंध है॥

जल की उपलब्धता सीमित है,

पर जल पर भार असीमित है।

जल को अतः बचाना होगा,

जल के विभिन्न उपयोगों में,

मितव्ययिता अपनाना होगा॥

नदी और तालों के जल को ,

और उपयोगी संचित भूजल को,

कैसे स्वच्छ रखें व निर्मल।

उपाय…

View original post 61 और  शब्द

स्व. सच्चिदानंद सिन्हा जी द्वारा लिखित दो काव्य-संग्रह ” दिल के दर्पण में” एवं ” मधुर यादें जिंदगी की”

मेरे पिताजी स्व. सच्चिदानंद सिन्हा जी द्वारा लिखित दो काव्य-संग्रहों ” दिल के दर्पण में” एवं ” मधुर यादें जिंदगी की” का लोकार्पण दिनांक 6.1.2021 को डॉ अनिल सुलभ, माननीय अध्यक्ष, बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन, पटना के कर-कमलों से सम्पन्न हुआ। डॉ शिववंश पांडेय, माननीय प्रधानमंत्री, बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन एवं अन्य माननीय साहित्यकारों की गरिमामय उपस्थिति में यह कार्यक्रम बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन के कदमकुआं, पटना स्थित सभागार में संपन्न हुआ।

कोरोना महामारी के चलते ही मेरे बाबूजी अपने रहते इन पुस्तकों का लोकार्पण नहीं करवा सके थे, और फिर दुर्भाग्यवश इसी महामारी ने विगत 24 दिसंबर, 2020 को उन्हें हम सब से सदा के लिए अलग कर दिया, छीन लिया।

आप सब का हार्दिक आभार एवं प्रणाम, जो किसी न किसी रूप में मेरे बाबूजी के जीवन से जुड़े थे, और कभी न कभी उनकी खुशी का कारण बने थे!

आपका
राकेश कुमार

प्रकृति भेद नहीं करती.

सूर्यन करता भेद कभी,उनको दिखते सब एक समान।

उनकी नजरों में सभी एक,सबका ही करते कल्याण ।।

देता है प्रकाश सबों को,बिन भेद भाव के एक समान।

बड़े, छोटे हर जीव सभी,उनकी नजरों में एक समान।।

पवन सभी को प्राणवायु दे,जीवन रक्षण है करता ।

दुष्ट और निकृष्टों को भी, नहीं कभी वंचित करता।।

उनकी नजरोंमें भेदनहीं,उनको सब दिखतेएक समान।

दिनरात अहीत जोकरता रहता,उसकभी करतेसम्मान।

नहीं वृक्ष देखा करते, है कौन शत्रु या कौन है मित्र ।

दिन रात काटते जो रहते ,उनका भी ये होते मित्र ।।

दिन रात इसे जो काट रहे, उनको भी छाया,फल देते।

बदले का भाव नहीं मन में, उनका कभी रहा करते ।।

सरिता निर्मल जलदेती सबको,जलक्या जीवन हीदेती।

निकृष्ट प्राणि-मानव उसको भी, प्रदूषित कर ही देती।।

बादल जल बरसाता है,बिन भेद किये जल देता है।

सारे सचर अचर पर अपना,सुधा का रस बरसाता है।।

नहीं भेद करता वह मानव, जो सचमुच मानव होता।

सागर से भी ज्यादा गहरा,उनका मन मस्तिष्क होता।।

परमार्थ सिर्फ मानवकर सकता,कोई नहीं दूसरा प्राणी।

शक्तिनिहित तो ज्यादा कुछमें,पर कहां मनुजसा ज्ञानी।

नहीं भेद करती है प्रकृति, अपने कोई कार्य कलापों में।

जीवन देने से मृत्युतक में,कहाॅं फर्क कोई कामों में ।।

खुराफातजो करता मानव,मानव मस्तिष्ककी देनयही।

प्रदूषित मस्तिष्कको करदेता,करता उल्टा काम यही।।

किसे भेंट करूॅं ?

पारिजात का पुष्प चयन कर, बड़े यतन से ले आया ।

अरमानों से सजा गुलों को, गुलदस्ता तैयार किया।।

किसे करूॅं मैं भेंट प्यार से , इस प्यारे गुलदस्ते को ।

है सर्वश्रेष्ठ हकदार कौन , भेंट करूॅं पहले किनको ।।

आजाद हमें करवा कर गये ,उन सारे पुरोधाओं को ।

जो ताज पहन बैठा दिल्ली में ,उन सारे नेताओं को।।

जो डटे सदा रहते दिन-रात , वर्फीले सरहद के ऊपर ।

हमें चैन की नींद सुलाते , खुद वर्फों में रह रह कर ।।

बिघ्न अनेकों खुद सहकर , हमें मीठी नींद सुलाते हैं।

गोली की बौछारों को , अपने सीने पर सह जाते हैं ।।

या बेठे तख्तपर नेताओं को,जो राज-सुखोको भोगरहे।

या उन गुण्डों बदमाशों को,जो जनताको बरगला रहे।।

या गुलदस्ते को भेंटकरूॅं,उन खोजी वैज्ञानिक को ।

अनवरत लगाता जीवन अपना,उन जैसे वैज्ञानिक को।

ऋषियों,मुनियों कोभेट करूॅं,जीनेंका जोराह दिखाया।

अपना पूरा जीवन जिसने, अध्यात्म में सिर्फ लगाया।।

या भेंट करूॅं कृषकों को,अन्न दिया करता जो सबको।

अपना जीवन तंगी में जीते,परयही पेट भरता सबको।।

इन सबको है देना गुलदस्ता,पर वरिय किसे मैं मानूं?

उलझन में मैं पड़ा हुआ हूॅ, सर्वश्रेष्ठ किसे मैं जानूॅं ??

इस उलझनसे पार करादे,उलझन बहुत जटिल लगता।

कौन रास्ता उत्तम होगा , बतलाते तो अच्छा होता ।।

जुगनूएं.

संध्या प्रहर में जब धरा से , रोशनी जाती ।

चुपचाप न जाने कहाॅं से , रात आ जाती ।।

बच्चे खेलकर थककर , घर को लौटने लगते ।

मानों उतर आसमां से जमीं पर ,तारे चले आते।।

झुरमुट, झाड़ियों की ओट में जा, खेलने लगते।

यही तारे गगन का ।क्या? जिसे जुगनू कहा करते ??

जुगनूएं इस धरा पर आ , धरा का लुत्फ ले लेते।

शामिल खेल में होकर,मेरे संग खेलने लगते ।।

कौतुहल बस देख उनको, मुक्त कर देते ।।

बच्चे जुगनूओं को पकड़, उनको कैद कर लेते।

इन जुगनूओं के संग , उनका खेल नित चलता।

आमोद में डूबा वहाॅं का, संसार तब लगता ।।

जुगनूएं कौतुहलबस आसमां में, है उड़ा करता।

न जाने टार्च लेकर क्यों, संध्या को निकल पड़ता ।।

शायद मस्तियों में मस्त हो ,वह घूमता फिरता ।

बच्चों के लिए वह केन्द्र ,आकर्षण का बन जाता।।

पकड़ लेता कभी उसको, कभी वह छोड़ भी देता।

लुका-छिपी का खेल यह तो, नित्य ही चलता ।।

सदा यह मित्र बन हर लोग के, बीच में रहता ।

सबों को प्यार यह करता, सबों से प्यार यह पाता।।

बच्चों का परम यह मित्र, निभाया भी उसे करता।

मिलने आसमाॅं से चल, यहां हर रोज ही आता ।।

जज़्बात.

जज़्बात में बहकर कभी भी , कुछ न कीजिए ।

मीठी लगे काफी जहर , पर हरगिज न पीजिए।।

हर चीज जो मीठी लगे , मिष्ठान नहीं होते ।

कितनी जहर उसमें भरी ,यह जान लीजिए।।

करने या करने के कबल, मंथन उसे मन में करें।

हर ढ़ग से अच्छा लगे , वही सब काम कीजिए।।

लेना अगर हो फैसला ,न जल्दबाजी कीजिए।

हरबर का लिया फैसला पर, भरोशा न कीजिए।।

प्रतिउत्पन्न- मतित्व की जरूरत सबकोही रहनी चाहिए

जरुरत जल्द की होती, वहाॅं मत देर कीजिए ।।

अहम कुछ फैसला करना, जरूरी जल्द भी होता ।

सोंचे बिना गंभीरता से, तो कुछ न कीजिए ।।

जज़्बात में बहना कभी ,होता नहीं अच्छा कभी ।

नहीं लेकर गलत कोई फैसला ,पश्चाताप कीजिए।।

एक भूल ही काफी , सभी सूकर्म धोने के लिए ।

हो स्मरण इस बात की , कभी भूला न कीजिए।।

जज़्बात ने ही ले डुबोया ,हरलोग को हरदम सदा ।

कोशिश कभी बह जाने का , नहीं प्रयास कीजिए।।

नियंत्रण मानव-मन का.

दिलकी बातें कह बतलाना,कठिन बहुत, आसान नहीं।

दुखते रगको झकझोर हिलाना,लेलेगा क्या प्राण नहीं?

पर अक्सर लोग हिला ही देते,उस दुखते से रगको।

लेते हैं आनन्द उसीमें,देकर दर्द अधिक उनको।।

दुखतों को ही और दुखाकर, लेते लोग मजा है ।

इन्हे दुखाये तभी समझते,कितनी कठिन सजा है।।

जो दर्द पराई का समझे,वह दिल का बहुत बड़ा होता।

वह मानव सामान्य नहीं,काफी ऊॅंचे स्तर का होता ।।

काम,क्रोध, मद,लोभ मनुज का,शत्रु बहुत प्रवल होता।

पावन मानव-मन के मगमें,अवरोध बना खड़ा रहता ।।

जो मानव अपने मनको,नियंत्रित कर खुद रखता है ।

उनको सारे अवगुण मिलभी,कुछनहीं बिगाड़ पाता है।

जहां नियंत्रण घट जाता,हावी उसपर सब हो जाता।

उसे नराधम बिना बनाये, चैन नहीं ले पाता ।।

बिना नियंत्रण कुछ भी जगका,शुद्ध नहीं चल सकता।

नियंत्रण तो है परमावश्यक , तभी शुद्ध चल सकता ।।