बिना रात चंदा कैसा?

जब लोग बहुत ऊॅचे हो जाते, नीचे वाले छोटे दिखते।

जरा आसमानमें जाकर देखें,सबके सब बौना दिखते।

हो जो जैसा दिखता वैसा,वही नजर अच्छी होती।

जो हो जैसा पर दिखे न वैसा, दृष्टिदोष यही होती।।

आज जमाना ऐसा है, नजरें धोखा खा ही जाती ।

जोकुछ रहता ,नजर कुछआता,अक्सर भुलयहीं होती।

किसके अन्दर क्याहै बैठा,नजर कहाॅ किसी को आता।

बाहर से जो जैसा दिखता, कहाॅ वही भीतर होता ??

अंदर बाहर एक जिसे हो,लोग बहुत कम वैसा होता।

बाहर से तो अच्छे दिखते,भरा अन्दरपर कचरा होता।।

लोग बहुत कम ऐसा होते,जोदेख नजर से भाप सके।

किसके अन्दर क्या राजछिपा,देख नजरसे जान सके।।

छोटा कौन ,बड़ा कौन है,वक्त दशा का होता फर्क ।

कितने बड़े-बडों को उसने,कर डाला है बेड़ागर्क ।।

सबकी अलग नजरिया होती,सोंचसबोंका अपना होता

महत्व सबोंका अलग अलग,वक्त सबोंको देता रहता।।

जहां पर लोग बड़े होते,महत्व न छोटों का होता।

लघु अगर होता ही नहीं, कोई बड़ा कौन कैसे होता??

तुलना ही बड़ा बनाता है,तुलना ही छोटा कर देता ।

तुलना नहीं हुए होते,तो कौन बड़ा या छोटा होता??

एक दूजे का पूरक दोनों, एक नहीं तो दूजा कैसा?

अहमियत बराबर दोनों का,बिना रात को चंदा कैसा??

जो डूबता,पार वही होता.

जाने कौन कहाॅ से आकर, दिल में किया प्रवेश मेरा।

वातायन तो बंद पड़े थे, दरवाजे भी बंद पडा ।।

नहीं किसीने आते देखा , देखा कोई नहीं जाते।

उनकी इच्छा ,जब जी चाहें, रहते सदा ही आते जाते।।

जाने कैसे कौन चला, आता है बन्द दरवाजों से।

दिलमें घुंस जाता चुपके,कुछ कहता मंद आवाजों से।

मेरा मन भोला बेचारा, छल कपटों से दूर सदा ।

अति निर्मल ,कोमल अतिशय,रहते इनसे दूर सदा।।

इस पक्षी का नीड़ यही, बसेरा इसी महल में ।

जो खूब लगाते गोते इसमें, रहते मस्त मगन में।।

प्रेम की दरिया में जो डूबा , पार वही हो पाता ।

जो तैर निकल जाता दरिये से, डूब वही है जाता।।

यह नेह की दरिया सब में रहता, हर मानव के मनमे।

जो खूब लगाते गोते इसमें,रहते मस्त मगन में ।।

इस दरिया में सब कुछ रहता ,जो ढ़ूंढ़ो मिल जाता।

जिसको चाहो उसे पुकारो, दौड़ वही चल जाता ।।

कड़ियाॅ उसकी मजबूत बड़ी, कोई तोड़े टूट न पाता।

चाहे जितना जोड़ लगा दे,भंग नहीं कर पाता ।।

बंधन इसका मजबूत बहुत,लम्बाभी बहुत अधिक होता।

अगर बांधने वाला चाहे,ब्रह्माण्ड बाॅध यह सकता ।।

धन्य बनाया है जिससे ,नमन उन्हें मैं करता ।

उनके पावन चरणों पर , मस्तक नत मैं करता ।।

दुनियाॅ बनाने वाले.

दुनियाॅ बनाने वाले , क्या दुनियाॅ बनाई तूॅने ।

कितने करीने से इसे , जमकर सजाई तुमने।।

कितने गगन को छूते ,पर्वत बनाई तूॅने।

छोटे -बड़े बिटप से , बन को सजाई तूॅने।।

कल -कल ध्वनी है करती , बहती है नदियां तेरी।

ब्याकुल सजन से मिलने , में हो रही क्या देरी ??

कितना बड़ा सा तुमने , बनाया गजब समंदर।

है आगार रत्नो से भरा ,संजोये अपने अन्दर ।।

अनेकानेक जीव-जंतु , तुमने ही तो बनाया।

उस जीव जंतुओं में, मानव जीव भी बनाया ।।

विकसित बना के मस्तिष्क , तुमने बनाया मानव।

मकसद न जाने क्या रख , तुमने रचा था मानव।।

मकसद तुम्हारा जो था , क्या पूर्ण यह किया है?

या तेरे बनाये मकसद , से ही भटक गया है ??

भटका अगर है पथ से, पथ पर उसे चढ़ा दो।

सारे पथिक को अपने , राहों से ही चला दो ।।

पथ पर ही चढ़ गया तो, गण्तब्य तय है मिलना।

कुछ देर भी अगर हो , निश्चित है पर पहुॅचना ।।

गुण तो भरे हैं काफी , अवगुण भी कुछ दिया है।

अवगुण ही हावी होकर ,सद्गगुण को दबा दिया है।।

बस चेतना जगा दें , अवगुण को ही भगा दें ।

निश्चित करेगा पूरा , जो कर्म उसे मिला है ।।

दुनियाॅ और दौलत

पल भर में रंग बदलते हैं, देखो ये दुनिया वाले।

माहिर अपने इस अवगुण में,है सुनलो ऐ दुनियां वाले।

अपनी जबान पर थे रहते,अटल वे किसी जबानें में।

नहीं बात की कीमत थोड़ी,होती नये जमाने में ।।

रहा साध्य मानों जीवन का ,धन- दौलत अर्जन करना।

कूकर्म पडे करना जितना , नहीं तनिक चिन्ता करना।।

जघन्य कर्म करके भी कोई,दौलत आज बनाता है।

चोरी ,घुसखोरी,अनाचार कर,भी धन दौलत लाता है।।

नहीं पूछते लोग कहां से, यह दौलत तुम लाये हो।

कितनी,घुसखोरी ,हत्या कर,यह दौलत तुम पायेहो??

करवाते एहसास न उनको, कर्म तुम्हारा उचित नहीं।

पढेलिखे और समझदार को,देता शोभा तनिक नहीं।।

सौ-सौ चूहे खा बिल्ली सा,क्यों तुम हज पर जाते हो ?

भोले भाले ग्रामीणों को,ठगकर क्यो मूर्ख बनाते हो ??

अपनी दौलत की चकाचौंध, ग्रामीणों को दिखलाते हो।

भोले ग्रामीणों की आंखों पर,दौलत कीधाक जमातेहो।

भोली जनता मति की भोली,बातों में तेरी फॅस जाती ।

नकली रूप तुम्हारी जो है,असली उसे समझ जाते ।।

सभी काम तेरा सबको तो,मूर्ख बना चल जाता है।

भोले भाले लोगों पर तेरा,यह जादू चल जाता है।।

आस्तीन का सांप हो तुम, सबकुछ वैसा ही करते हो।

जो तुम्हें बनाया योग्य आज,खुदही उसको डॅसते हो??

गिद्धदृष्टि पैनी तेरी , यहीं नहीं रुक जाती है ।

उनके दौलत मिट्टी के मोल , सारी तेरी हो जाती है।।

उनके भोलापन का कैसा ,तुम लाभ उठाये लेते हो।

उनके सारे दौलत अपने ही,नाम स्वय कर लेते हो ।।

नहीं भरोसा के काबिल,अब बच गये दुनिया वाले।

दौलत के चक्कर में फॅसकरअब नाच रहे दुनिया वाले।

का,क्रोध मद ,लोभ ,मोह,मिल ,नचा रहीहै दुनिया को।

नाच रहे दुनियां वाले सब,डुबो रहे इस दुनिया को ।।

जीवन का मकसद ही बन गये, दौलत अधिक बनाना।

कर्म,कूकर्म,अनैतिक,नैतिक,भूलध्र सिर्फ धन लाना।।

सच्चा मित्र अनमोल होता.

किसे बिसारूॅ ,किसे पुकारूॅ , नहीं समझ में आता ।

करूॅ भरोसा किसके ऊपर ,नजर न कोई आता ।।

मौका परस्त सब आज लोगहैं,मौकापर काम नआता।

निकल गया गर मौका उनका,सीधी बात न करता।।

मौका परस्तों की दुनिया है,लगभग ही लोग हैं ऐसे।

इसी बीच में जीने को, मजबूर सभी है वैसे ।।

मतकरो भरोसा अधिक लोगपरसतर्क सदारहना सीखो

अपनी आंखें खोल सदा, सचेत स्वयं रहना सीखो ।।

आसान,नहीं,है बहुतकठिन,भरोसेमंद मिल जाना।

अथाह समंदर से जैसे, रत्नों का खोज लगाना ।।

मित्र अगर सच्चा मिल जाये,सचमुच अनमोल बहुतहै।

पर कहाॅ मित्र मिल पाता बैसा,मिलना बहुतकठिन है।।

वैसे भी अनमोल रत्न, रहते ही कहाॅ अधिक है ?

तारे अनन्त तो रहते नभ में,चंदा कहाॅ अधिक है??

करो भरोसा खुद अपने पर,सत्-पथपर बढ़ते जाओगे।

निश्चितही विजय तुम्हारा होगा,जीतका सेहरा पाओगे।

तुफान कभी आते सागरमें,आगोश में कुछ को ले लेते।

पर उसी बीच छोटी किस्ती भी,सागरमे उतराते रहते।।

कुछ है शक्ति ऐसी प्रकृति में, सबकुछ वही चलाती है।

अदना सी चीजों को भी , डूबने से वही बचाती है ।।

करो भरोसा उस शक्ति की,सबको पार लगाती है।

सिर्फ अकेला वहीहै करती,कोईऔर नजर न आतीहै।।

जन्नत से ऊॅचा ,धरा का नाम होगा.

भला क्या है , बुरा क्या है, सबों को ज्ञान हो जाये।

जन्नत से बहुत ऊॅचा , धरा का नाम हो जाये ।।

धरा ही कर्मस्थल है ,यहीं सब कर्म है होता ।

भला कीजै बुरा कीजै ,जो चाहें सब यहाॅ होता ।।

यहाॅ जो कर्म होते हैं , सबों पर नजर कोई रखता।

अधिक सुकर्म जो करते, उन्हें पुरस्कृत कोई करता।।

गलत जो कर्म करते हैं, गलत संस्कार वे पाते ।

अधम जो लोग होते हैं , वही मन को उन्हे भाते ।।

धरा तो कर्म का स्थल, यही सबकुछ हुआ करता।

यहीं पर लोग जो करते , उचित परिणाम भी मिलता।।

चयन जिनका यहाॅ होता , जन्नत को वही जाता ।

वहाॅ की सारी सुविधाएं, उनको मिला करता ।।

यही से स्वर्ग की सींढ़ी , समझ प्रारम्भ हो जाती ।

चयनित लोग को इस मार्ग से, ही भेज दी जाती।।

स्वर्ग से बहुत ज्यादा ही ,धरा का नाम ऊॅचा है ।

धरा से कर्म अच्छा कर,यहाॅ तक कोई पहुंचा है।।

धरा पर कर्म करने के लिये, आना उन्हें पड़ता ।

किसी का पुत्र बन उनको,रहना यहाॅ पड़ता।।

यहाॅ पर आगमन उनका , अवतार कहलाता।

बचे जो काम रह जाते ,निपटाना उन्हें पड़ता ।।

धरा में और जन्नत में ,यही तो फर्क होता है।

महत्ता एक दोनों का ,अलग कुछ भी न होता है।।

यहाॅ बढ़ती हुई बुराईयों पर, लगाम कस जाये ।

जन्नत से अधिक ऊॅचा , धरा का नाम हो जाये ।।

नहीं किसी ने देखा.

समझ ओझल सब की नजरों से, कूकर्म लोग करते हैं।

यहां कहां कोई देख रहा, सोंचा सब करते हैं ।।

कुछलोग डूबकर पीतेपानी,समझते नहीं किसीने देखा।

झोंक धूल सबकेआंखो,किया करिश्मा किसने देखा??

दूर-दूर नहीं कोई जो,मेरी करनी देख सके।

लगाई डुबकी पीया पानी, नहीं इसे कोई समझ सके।।

सबके सब गफलत में पड़ गये,खा गये सारे धोखा।

मैंने ऐसा काम दिया कर,पर कहां किसी ने देखा ??

भूल गया कोई नजर गड़ाये,जग की हरकत देख रहा।

कण-कण पर उनकी नजरें,तस्बीरें सारी खींच रहा।।

कौन कहां ,कर रहा कोई कब, उनकी नजरों में सब है।

जो समझ रहा खद को ओझल,उनके मन का भ्रम है।।

प्रकृति तो सबकुछ देखरही,यह सबको बात विदित है।

यह बात पता भी उनको ,होना क्या और घटित है।।

लाख छिपाना चाहे कोई,पर नहीं छिपा पाता है ।

दूर दृष्टि से ओझल कुछ भी, कभी न हो पाता है।।

कर्मों का परिणाम अटल,विज्ञान सत्य कहता है।

सारे क्रिया की प्रतिक्रिया ,होती समान कहता है।।

फिर भी इसे भुला दे मानव,तय प्रतिफल है मिलना।

जितना अपनेको धूर्त समझलें,अटलको नहींहै टलना।

फिर भी वहम न छोड़ा मानव, दुख पाने को तैयार रहे।

सामर्थ्यवान खुदको समझे,चाहे खुदको भगवान कहे।।

होता घमंड है बुरी बला,जो किया बुरा हो जाता है।

निश्चित नाश होनातय उसका,समयन ज्यादा लगता है।

फिर राह बताये कौन ?

लोग सभी भटके भटके है , अपने पथ ही भूल गये हैं।

जब सभी लोग ही भटक गये; फिर राह बताये कौन??

सब बनकर अंधे बैठे हैं , स्पष्ट नहीं उनको दिखते हैं।

सब एक दूसरे से पूछ रहे , स्पष्ट करे फिर कौन ??

बहरे सबही लोग हुए हैं ,सुन कहां किसीको कौनरहे हैं।

जब कोई नहीं सुनने वाला,बिन सुने बताये कौन ??

सरपट भागे जा लोग रहे हैं,भगदर सारे ओर मचे हैं ।

कारण भी नहींहै पता किसीको,तोकिसे बताये कौन??

सबके सबही ब्यस्त बड़ेहैं,समय किसी के पास नहीं है।

पूछ रहे जिस आप किसी से , भला बतावे कौन ??

सिर्फ सुनाना लोग चाहते ,श्रोता बनना नहीं चाहते।

ब्यर्थ सुनाने के चक्कर ,रहते हरदम बेचैन ??

बदल गयी है सारी दुनियाॅ , बचा बदले बिन कौन ?

जो नहीं बदल पाते दुनियाॅ संग,उसे पूछता कौन ??

संग हवा के रुख जो बढ़ते ,उनका चलना आसान।

बिपरीत हवारुख कठिन है चलना,चल पाताही कौन??

जो चलपाते,युग-पुरुष कहाते,कबकिसे बताये कौन??

नियत समय पर आयेगे ही, उन्हें रोक पायेगा कौन ??

पथभी मेरा नहीं बताया,चलना तक भी नहीं सिखाया।

अपने विवेक से ढ़ूढ़ो सबकुछ ,बतलायेगा कौन ??

भरी है हर जगह माया.

जीवन के इस खेल में, महज सब झूठ ही होते ।

सच्चे कुछ नहीं होते ,बस एक स्वप्न ही होते ।।

स्वप्न जो देखते हैं लोग, सत्य तो वह नहीं होता।

निद्रा टूटने भर देर है , सब लुप्त हो जाता ।।

माया का बना यह खेल है ,जो दिखता है सभी माया ।

खेल कुछ देर ही चलता , हो जाती लुप्त भी माया ।।

फिरभी लोग पीछे भागते , भगाती खूब यह माया ।

लोग सब स्वयं आ फॅसते , फाॅसती हर तरह माया ।।

यह बाजार माया का ,सभी खरीदार माया का ।

खरीदने बेचने वाले , सारे उपज माया का ।।

डूबे लोग सारे है यहाॅ , बड़े भवजाल में फॅस कर ।

फॅस कर भी बड़े खुश हैं ,ऐसे नासमझ बन कर ।।

चक्कर यह अजूबा है , फॅसकर लोग खुश होते ।

डूब आकण्ठ कीचड़ में , स्वत: ही लिप्त हो जाते ।।

प्रभाव माया का , इन्हें ऐसा बना देता ।

भला क्या है ,बुरा क्या है ,ज्ञान को भूल ही जाता।।

पथ से भटकने का मार्ग , प्रशस्त कर देती ।

सुपथ से वह कुपथ की ओर,लेकर चली जाती।।

निजात पाना भी नहीं ,आसान है उससे ।

किये प्रयास तो कुछ लोग, रहे पर असफल उससे।।

साधा लोग कुछ उसको ,पर कमलोग हैं ऐसे।

अमर वे लोग हैं जग में , अन्यथा हैं कहाॅ वैसे ??

प्रकृति और जीवन.

आसमान में बादल फिरता ,मोर नाचता बन में।

थिरक -थिरक कर मनवां नाचे,भरता यौवन हर जनमें।

ठंढ़ कंपाती है हर जन को ,पवन जुल्म बरपाता है।

फिर भी बादल उमड़-घुमड़,मदमस्ती बनकर छाता है।

पेड़ों पर बैठ गये पक्षी, अपने जोड़े संग खोंतों में ।

चिहुक-चिहुक कर मग्नप्रेम में,खो गये अपनी बातों में।

चातक,मोर ,पपीहा बनमें,फुदक फुदक कुछ बोल रहे।

मानों फिक्र नहीं मौसम का,कर प्रदर्शित उपहास रहे।।

अबलों को खूब सताते सब,सबलों कोनहीं सता पाती।

जो डरते उन्हें डराती दुनियां,निडरों को नहीं डरा पाती।

जो भिड़ने की रखता हिम्मत,निर्भीक बनाजो रहता है।

रहती दुनियां हैं डरी हुई, आघात न उनपर होता है।।

यह नियम पुराना है प्रकृतिका,कोई भला तोड़भी पायेगा।

जो अपनी रक्षा करे नहीं,कर उसे और क्या पायेगा??

परिस्थितियों से संघर्ष करे, क्षमता मानव पायी है।

सोंच समझ कर प्रकृति ने ,यह मानव जीव बनाई है।।

अतः जरूरत नहीं उसे,डरने को क्रूर थपेड़ों से ।

सर्दी-गर्मी की प्रकोपों ,झंझा की क्रूर प्रहारों से ।।

सौरमंडलमें जबतक अपनी,अवनी सूरजमेंचाल रहेगा।

मौसम आयेगा क्रमिक,दिन-रात भी आये जायेगा।।