मुक्तक

१८/११/२०१९

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(क)

तन की शोभा लोग देखते, मन की देख नहीं पाते‌ ।

मन की आंखें खोल देख तो , स्पष्ट दिखाई देते ।।

भला बुरा मन को ही लगता,मस्तिष्क सोंच बताते।

आंख,देख सम्बाद पठाते, बाकी सब कुछ मन करते।।

(ख)

कौन किसे सुन्दर लगता है, किसे असुन्दर लगता।

पसंद अलगहै सबकी अपनी,कब कौन किसे मनभाता

निर्माता तो एक सबों का ,सब को यही बनाता ।

कलाकार तो ठीक बनाता,दर्शक समझ न पाता।।

(ग)

नहीं प्रेम की खेती होती ,न वन में कहीं उपजता ।

नहीं प्रेम में दौलत लगता, मुफ्त सबों को मिलता ।।

फिर भी स्नेह को बांट न पाते,कैसा पत्थर दिल तेरा।

साथ नहीं कुछ भी जाता , यही पड़ा सब रह जाता ।।

घर हो किराये का .

किराये का घर का ,मजा ही कुछ और है।

न रंग पुताई की चिन्ता ,न टूटने का भय है ।।

मस्ती से रहिए , सिर्फ दे कर किराया ।

घर वहीं लीजिए , जो मन को भाया ।।

सारे घरों पर तो , अपना ही राज ।

घर वहीं रखिये , जहां रहता हो काज ।।

अधिक दूर जानें का , रहता न चक्कर ।

कार्यालय पहुंच लें , पैदल ही चल कर ।।

खाना न पड़ता , सवारी का धक्का ।

ले सिर्फ पहुंचने में , पांच मिनट पक्का।।

बचेंगे जो भाड़ा , चुकायें घर का किराया ।

दोनों ही बचेंगे , समय और किराया ।।

किराये का घर में ही , मस्ती से रहिये ।

सारे घर है तुम्हारे , जहां जी चाहे रहिये।।

कभी मत देखिए , कि पडोसी है कैसा ।

मतलब ही क्या है , रहे चाहे जैसा ।।

बढायें न ज्यादा कभी , दोस्ती का हाथ ।

मत सोंचो पडोसी भी , रहता है साथ ।।

सदा के लिये कोई तो , आया नहीं है ?

दुनिया में कुछ भी , स्थाई नहीं है ।।

रजिस्टरी करवा ली , पर सारे हैं ब्यर्थ ।

स्थाई जिसे कहते हो , वह भी तो है ब्यर्थ।।

हम से तो अच्छा ढ़ेरों , होता है परिंदा ।

कभी कोई किसी का न , करता है निंदा ।।

खाता कहां है तो , रहता कहीं है ।

महल या ईमारत की , चिन्ता नहीं है।।

बंध कर कहीं वह तो , रहता नहीं है ।

बृक्ष सारे है उनके , आशियाना यही है।।

आजादी का जीवन तो, जीता यही है।

मुफ्त राशन भी कोटा का ,खाता नहीं है ।।

शिकवा शिकायत ,न करता किसी का ।

दोस्ती दुश्मनी भी न , करता किसी का ।।

दिल का है भोला , सदा मस्त रहता ।

खा-पी मजे से , मस्ती से रहता । ।

फिर भी किसी से , न रहता जलन है ।

मानव की तरह उनमें , रहता न छल है।।

सुकून से भरा उनका , जीवन है होता ।

कभी दुख न कहता , बैठ कर भी न रोता ।।

मस्त खुद में ही रहता ,द्वेष रखता नहीं है ।

जीव तो है ये छोटा , पर रोता नहीं है ।।

मानव से परिंदा , कहीं ज्यादा सुखी है ।

भेद अपना पराया का ,रखता नहीं है ।।

सुख से जीना जो चाहो ,तो किराये का घर लो ।

भूल से भी न सोंचो ,कि अपना ही घर हो ।।

कभी

मुक्तक

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16/11/2019

(१)

सूकर्म कठिन होता करने में ,कूकर्म बहुत आसान।

समय लेता निर्माण बहुत, बिध्वंस बड़ा आसान ।।

पेड़ लगा कर फल पाने में, कितना है ब्यवधान।

बड़े पेड़ को काट गिराना ,पल भर का है काम ।।

(०२)

चमक दौलत की इतनी होती ,देती आंखें चौंधियाये।

नशा बहुत होती है उसमें, मन को मस्त बनाये ।।

मस्ती सदा नचाती मन को ,सुध बुध भीखो जाये।

भले अच्छे इन्सान बुत ,पत्थर का बन जाये ।।

(०३)

प्यार की इतनी कीमत होती ,सारी दौलत सै ज्यादा।

जग की दौलत सब एक तरफ,फिर भी भारी ज्यादा।।

गर प्यार न होता दुनिया न होती,ना होता रस्मेंँ वादा।

जो प्यार का बंधन टूट जाये ,जग नहीं चलेगा ज्यादा।।

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दिल नाजुक तूं क्यूं बनाया.

ऐ दिल बनानेवाले,इसे नाजुक तूं क्यो बनाया ?

इस बेरहम दुनिया में ,फिर क्यो हमें पठाया ??

देता है कोई ठोकर , सब की ज़ुबांयें चलती ।

यूं चोट भी हो हल्की , फिर भी है दिल को सलती।।

कोई बेरूखी सी हरकत ,बेचैन करती मुझको ।

बदला किसी का तेवर , परेशान करता मुझको।।

संजीदगी से लेता , है क्यो किसी की बातें ।

परेशानियां है सलती ,करवट में कटती रातें।।

जरूरत ही क्या थी मुझको , बातों को उनकी सुनना।

सुन भी लिया अगर तो , ध्यान उस पे रखना ।।

तूं नाजुक बनाया दिल को , परेशानियां में पड़ गये।

यह चूक थी तुम्हारी, हम भोगते ही रह गये ।।

था पत्थरों पे जीना , पत्थर बनाते हमको ।

दुनिया लगाती ठोकर ,पड़ता न फर्क मुझको।।

संवेदना न होती , गर नाजुक न दिल ये होता ।

अनुभूति मेरे दिल को , थोड़ा हुआ न होता ।।

दिल को बनाया नाजुक, तूं ही बता किया क्या ?

होता सहन न दिल से , तूं ही बता करूं क्या ??

कोमल हृदय हमारा , पत्थर सहन न करता ।

कठोरता तुम्हारी , बेचैन कर के रखता ।।

वेदना हृदय का , सुनता न कोई मेरा ।

आक्रोश होता तुम पर , क्या तूं बना के छोड़ा।।

था भेजना मही पर , अनुकूल बनाया होता ।

शक्ति सहन की मुझमें , कुछ और ज्यादा देता।।

मुक्तक

१३/११/२०१९

जिन्हे पक्का इरादा हो ,सफलता भी वही पाते ।

बिना इसके सफल कोई, हरगिज नहीं होते ।।

उनका ठान लेता दिल , फिर विचलित नहीं होते।

बिना पूरा किये मकसद, दम तक नहीं लेते ।।

(ख)

जिन्हे पक्का इरादा हो , आसमां छू वही सकता ।

लगा गोते अथाह सागर , थाह भी सकता ।।

डरकर किनारे पर , बौरा बैठ जो जाता ।

बैठ सिर्फ हाथ है मलता ,हाथ पर कुछ नहीं लगता।।

(ग)

अटल जिनका इरादा हो , वही कुछ कर दिखाते हैं ।

असंभव को वही संभव , डट कर बनाते हैं ।।

जहां रखते कदम , रास्ता तो खुद-ब-खुद बनते।

स्वयं कठिनाइयां आकर , चरण इनका दबाते हैं।।

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फूलों को गले लगायें.

फूलों को गले लगायें ,पर वहां भी सावधानी से।

भरे होते जहां कांटे , ध्यान रखने ही पड़तै हैं।।

आंखें खोल कर रहिये , बिलकुल बंद मत करलें।

भरोसा कीजिए, पर ध्यान तो देने ही पड़ते हैं ।।

भरोसा कीजिए, भरोसेमंद पर, सावधानी बरत कर।

चलेगें बंद कर आंखें , ठोकर खा ही सकते हैं ।।

दिया है देनेवाले ने तुझे, आखिर दो दो आंखें क्यों?

यही कुछ बात को समझें,कारण कुछ हो ही सकते हैं।।

चुभन तो हर जगह होता ,गुलाब कांटे भरे होते ।

सम्हल पर तोड़ने वाले, मजे से तोड़ लेते हैं ।।

कहीं गर चूक हो गई तोड़ने में, गुलाब पौधे से ।

चुभ जायेगें काटे उन्हें भी, कहां बख्सते हैं ??

जो दिखते हर तरह सुंदर, सब की निगाहों से ।

खुनुस उनमें भी हो सकते ,जिसे छिपाये होते हैं ।।

धधकते दिल में हों शोले , चेहरे शांत पर दिखते ।

मन की बात को मन से , न बाहर जानें देते हैं ।।

खतरनाक होते हैं बड़े , कुछ शख्स वैसे जो ।

भीतरघात करने में, बड़े माहिर ये होते हैं ।।

बाहर के दुश्मन से तो कुछ , आसान होता है निपटना।

मश्किल है निपटना जो , आस्तीन का सांप होते हैं ।।

शिक्षा जहां महंगी

शिक्षा हो जहां महंगी ,बता क्या देश का होगा?

शिक्षा सिर्फ अमीरों के लिये,गरीब का हाल क्या होगा?

बंचित हो रहे कितने, मेधा साथ में रख कर ।

विवस हो कर पड़े हैं पस्त , धन की मार खा-खा कर।।

ब्यवस्था ही हमारे देश की , चरमरा सी गयी ।

जनता चोर बनने को , लगभग विवस सी हो गयी।।

मेधा हो गया बेकार , दिया है डाल खुद हथियार।

गरीबी दाब कर उसको , बिलकुल कर दिया लाचार।।

अगर फिर भी न माना हार,करता रह गया ललकार।

शिक्षा पा लिया ऊं चा, भले ही बिक गया परिवार ।।

चयन हमकर जिन्हें भी , देश की चाभी थम्हा डाली।

उन्ही ने लूट मेरे देशकी, तिजोरी कर दिया खाली ।।

नंगा कर दिया हमको, बड़े तरतीब से लूटा ।

बेशर्मी से बनाया मुर्ख , धूर्त से कुछ नहीं छूटा ।।

बिल्ली ही हमारी आज, हमपर म्याऊं करती है।

दही की खा गयी छाली हमारी,हम्हींपर गुड़गुराती है।।

जिसे रक्षक बना भेजा , बन भक्षक वही बैठा ।

लूटा ही न केवल देश को, कर्जा में डुबो बैठा ।।

सुबिधाये जितनी हो सकी, अपनें लिये रखा ।

जनता को झूठी सान्तवना दे,फांस कर रखा ।।

सुरक्षित कर दिया खुद को ,सुरक्षा जेड का पाकर।

जनता का किया शोषण , बड़े ही शान से जमकर ।।

बनाया है तुझे जिसने, उसीपर जुर्म करते हो ।

अरे बेशर्म तो सोंचों जरा , क्या कर्म करते हो ।।

शिक्षा ज्ञान का मंदिर का, भी ब्यवसाय कर डाला ।

देश की आत्मा का तूं , घृणित ब्यापार कर डाला ।।

नयी पीढ़ी जो निकलेगी , बता क्या बात सोंचेगी?

उसे कितना सताया है , नहीं क्या बात सोंचेगी ??

भावना देशभक्ति की , क्या भरने नहीं दोगे?

सोचों देश की क्या दुर्दशा, करके ही छोड़ोगे??

गुलामी से भरा एक रास्ता , है नही यह क्या ?

कदम उस ओर ही बढ़ते, नहीं हम जा रहे हैं क्या??