कौन करता है यहाँ ?

कौन करता है यहाँ पर , कौन करवाता यहाँ ?

किसके ईशारे से जगत का ,हो रहा सबकुछ यहाँ।।

बिन किये होता नहीं कुछ ,बिन कराये भी न होता ।

है लगा दिन-रात कोई, करता वही या है कराता ।।

अदृश्य रहया है यहाँ, चुपचाप बैठा देखता ।

ईच्छा बिना उसके जगत का,पत्ता न किंचित डोलता।।

घटनाएं जो भी घटित होती ,सब मे उसी का हाथ होता ।

जैसे नचाता लोग को , नाचना उसको है होता ।।

ज्ञान दे ज्ञानी बना दे , धनवान दौलत दे बनाता ।

चाहता जब भी कभी, अंधे को सबकुछ है दिखाता।।

उस जादूगर के सामने , सम्भव सभी है काम होता ।

असम्भव जिसे हैं लोग कहते, वह क्षणों मे पुर्ण होता।।

ओझल सबों की दृष्टि से ,रहता नहीं पर दूर रहता ।

आप के ही पास क्या , आप मेंं ही वास करता ।।

कौन है या क्या है वह , देखा किसी ने तो नहीं ।

अटकल लगा ही सब बताते, अन्य कुछ करते नहीं ।।

शक्ति वो चाहे कोई हो , बनाता ,चलाता है वही ।

ढूँढना आसाँ.न उनको , जल्दी तो मिल पाते नहीं ।।

इन अटकलों की दौड़ में , दुनियाँ तो चलती जा रही ।

जो भी चला जिस मार्ग से , पहुँचती वहीं पर जा रही।।

निकाल सकता ढूंढ कर , मानव अगर जो चाह लेता ।

मंथन जो करता दूध को ,क्रीम उससे ढूंढ लेता ।।

कुछ भी असम्भव तो न होता ,है मनुज के सामनें ।

ठान ले गर आज दिल से , सबकुछ मिलेगा सामने।।

असत्य भी सत्य दिख जाते.

प्यार से देखिए चाहे जिसे , प्यारा नजर आता ।

नज़रें जिधर भी डालिये , न्यारा नजर आता ।।

नज़रिया हर की है अपनी , सबों की सोच अपनी है ।

अच्छा बुरा जो देखते, अपनी नजर की है ।।

बुरा कुछ भी नहीं होता , बुरा कोई क्यो बनायेगा ।

श्रम निर्माण करता का , नहीं क्या ब्यर्थ जायेगा ।।

जितनी चीज लगनी हो , सभी तो चीज लग जाती ।

बुरी चीजें बनाने में , उन्हें क्या चीज़ बच जाती ।।

यहां हर चीज अच्छी है, नजर का फेर पर होता ।

जिसै जिस ढंग से देखें , नजर वैसा उसे आता ।।

दिखाई जो जिसे देता , सदा क्या सत्य ही होता ?

मृग- मिरीचिका तो सर्वदा , असत्य ही होता ।।

अपनी नजर जो दिखती , करता सत्य ही दिखता ?

दिखे मरूभूमि में पानी सदा , असत्य ही दिखता ।।

नजर खाती कभी धोखा , बुद्धि फंस वहीं जाती ।

असत्य को ही सत्य ,बु द्धि मान है लेती ।।

नतीजा ही उलट जाता , फैसला गलत हो जाता ।

सत्य पर असत्य भारी , हो तभी जाता ।।

आंखें देखती उस बात को ही , सत्य कह देना।

नहीं संदिग्ध क्या लगता ,असत्य कह देना ।।

किसी को देखते ही फैसला, देना नहीं अच्छा ।

परख कर , जाँच कर दे फैसला , होगा वहीं अच्छा।।

उसकी अहमियत होती, मौत या जिन्दगी मिलती ।

अति गंभीरता से लें , जो जाती फिर नहीं आती ।।

बापू

बापू, एक बार तुझे , धरती पर आना होगा ।

ब्यवस्था चरमरा सी गयी ,फिर सुधारना होगा।।

ईशा की ही जरूरत है , बुद्ध की भी जरूरत है ।

भरे दोनो का गुण तुममें, तैरी तो श्ख्त जरूरत है।।

तुम तो आये थै शायद , यही सब काम करने को ।

त्रसित थे लोग जो मही पर , उन्हीं को त्राण देनें को।।

बहुत कुछ तुम किये पूरा , बाकी था बचा थोड़ा ।

एक सिर फिरा आ कर , नहीं होने दिया पूरा ।।

दिया कर छेद छाती को , तुम्हें पिस्टल की गोली से ।

ईशा को छेद डाला था , दिवार मे ठोक काँटी से ।।

अधूरा छोड़ अपना काम , जन्नत को पड़ा जाना ।

जन्नत को जरूरत थी ,इनसे कुछ काम निपटाना।।

जरूरत आ पड़ी फिर आप की ,बिना तेरा नहीं सम्भव।

बचा जो काम था करना , तुम्हीं से सिर्फ है सम्भव ।।

कृपया एक बार आकर , आप दिक्दर्शन करा दें फिर।

बैठी है जगत बारूद पर , उससे बचा लें फिर ।।

धधकती जा रही थी , विश्व-युद्ध की अग्नि गुस्से सा ।

अहिंसा -मार्ग दिखला कर ,दिया कर शमन गुस्से का ।।

शान्ति का मसीहा बन , किया उपकार मानव को ।

“अहिंसा परमों धर्म ” का दिया, एक मंत्र मानव को।।

तुमने कर दिखाया जो , मानव कर नहीं सकता ।

थे मानव से बहुत उपर , ‘सिर्फ’ मानव हो ही नहीं सकता।।

तुझे जो दिल से सोंचा है , तुझे भगवान माना है ।

गौतमबुद्ध, ईशा मसीह के , समकक्ष माना है ।।

तुमने जो दिखाया रास्ता , सन्मार्ग का है पथ ।

सत्य , अहिंसा , ईमानदारी , से भरा यह पथ ।।

विश्व भी अब लग गया, समझने मार्ग क्या इनका।

विश्व मे शान्ति देगा यही , जो मार्ग है इनका ।।

शान्ति के पुजारी तुम ,तुझे जग नमन है करता ।

समझता जा रहा जो करीब से ,सब अमल है करता ।।

आँखों में तेरी जाम देखा.

सुरमयी आँखों मेंं तेरी , छलकता सा जाम देखा ।

अधखुली पलकों मे तेरी , मेरा लिखा ही नाम देखा।।

आती जुबाँँ पर आपकी , मैंने कभी ना नाम देखा ।

जुबाँ जिसे कभी कर न पायी , पलकों को करता काम देखा।।

दिल मे जगह थी जो मेरी , आता कभी बाहर न देखा।

दिल तो दबाये रह गया, करता ईशारा नैंन देखा ।।

प्यार का इजहार तो , सब लोग कर पाते नहीं ।

संग जिन्दगी के दफन कितने, हो गये पर कौन देखा??

गुमनाम ही मैं चल दिया , देखा भी जिसनें क्या किया ?

अश्क के कुछ बूँद भी , उनको अदा करते न देखा ।।

प्रेम ,पर एकांगी , करता हुआ कुछ लोग देखा ।

दिल तड़पता रह गया , हिलती जुबाँ उनकी न देखा।।

जिन्दगी अपनी हवाले, जब से तुझे मैनें किया ।

दूर बैठा जिन्दगी भर , अपलक तेरा ही राह देखा ।।

देखता रह जाऊँगा , नजरें ये देगी साथ जबतक ।

कैसे भला जा पाओगी , ख्यालों में हूँ जब कैद रखा।।

पाषाण भी जाते पिघल , जब प्यार की ताशीर से ।

तुमको पिघलता आज तक , भर जिन्दगी मैंने न देखा ।।

सुरमयी आँखों में तेरी ,छलकता सा जाम देखा ।

अधखुली पलको मे मै ,अपना ही लिखा नाम देखा।…

हरक्षण जीवन निकला जाता

हर पल ,हर क्षण ,जीवन का , निकला भागा है जाता।

सरपट अंतिम घड़ियों की निकट ,स्वयं पहुंचता है जाता।।

गण्तब्य कहूँ या अंत कहूँ , क्या कहूँ समझ नहीं पाता ।

नाटक का परदा का गिरना , बस दृश्य बदलना कहलाता।।

बस कलाकार है रह जाता , पर रोल बदलता है जाता ।

बदल भेष-भूषा अपना ,कुछ अन्य विधा है दिखलाता ।।

कला मे माहिर जो होते , स्वांग सही वह रच पाते ।

जीवन्त स्वांग जो रच देते , वही श्रेष्ठ हैं कहलाते ।।

पर वक्त निकलता है जाता , पलभर भी कहीं नहीं रुकता।

अपनी गति से , अपने पथ पर , अविरल बढ़ता ही जाता ।।

समय बदलता है जाता , सब दृश्य बदलते हैं जाते ।

बदल जाते हैं कलाकार , पर कला यहीं हैं रह जाते ।।

जब परदा है गिर जाता , खेल खत्म है हो जाता ।

कला की चर्चा कलाकार की ,लोगों मे है रह जाता।।

शुरू होता फिर खेल नया , कुछ नये खेलाडी आ जाते ।

कुछ तो आ कर नयी विधायें , अपना कुछ दिखला देते।।

क्रम सदा यही चलता जाता , पर खेला नहीं रुका करता।

कुछ नये खेलाड़ी आ जाते , कुछ छोड़ यहाँ से चल देता ।।

हरेक किस्म के यहाँ खेलाड़ी , विभिन्न खेल खेला करते ।

जिनकी दिलचस्पी होती जिसमेँ , वही खेल खेला करते।।

कुछ दर्शक बन कर रह जाते , देख देख कर लुत्फ उठाते।

दृष्टिकोण अपनी होती , तौल उसी सै कामेन्ट सुनाते ।।

देख-सुन कर ,कुछ करवा कर , यूँ ही समय गुजर जाता।

चुपके -चुपके क्षण अंतिम आता ,जो गुजरे ,गुजरा रह जाता।।

घूंघटों की ओट में.

घूंघटों की ओट में , मैं एक अनोखा चांद देखा ।

झांकती काली घटा से , दामिनी एक बार देखा।।

आंखें तरसती रह गयी , फिर से छटा को देख पाऊं।

तृप्त आंखों को करूं , बेचैन दिल में चैन पाऊं।।

घड़ियां अनेकों गई गुजर , आई नजर नहीं चांदनी ।

बेचैनियां बढ़ती गई ,पर दिखी नहीं कामिनी ।।

दिल तड़पता रहा गया , बेचैन होता मैं गया ।

मुश्किल क्षणों से था गुजरना , जीना भी दूभर कर गया ।।

छा गयी उनकी छबि , दिल की मेरे गहराई में ।

देखें जिधर ,आती नजर , तूं सर्वदा तन्हाई में ।।

ओझल कभी होती नहीं ,रहती नजर के सामने ।

काली घटाएं झेंपती , तेरी गेसुओं के सामने ।।

मुखड़ा तुम्हारा देख कर , चांद कुछ ऐसा गड़ा ।

शर्म के मारे बेचारा, ढ़ूढे नजर फिर न पड़ा ।।

छिपने छिपाने का मजा , आता सदा हर लोग को।

होती है काफी एक झलक , मन मोह लेता लोग का।।

ढूंढने में जो मजा , मिलता , कहीं मिलता नहीं ।

इन्तजार की घड़ियां अलौकिक , जो मिलन देता नहीं।।

तकरार में जो रस छिपा , मिलता मधुर आनन्द जिसमें।

नमकीन ही अनुकूल करता ,रसना को मिलता स्वाद जिसमें।।

उत्प्रेरक कराता प्रतिक्रिया, पर स्वयं कुछ करता नहीं।

रहता वहीं चुपचाप बैठा ,करवाता यही करता नहीं।।

घूंघटों की ओट से जो , वह अनोखा चांद देखा ।

घर कर गयी मेरी जिन्दगी मे , ऐसा अजूबा चाँद देखा।।

घर कर गयी मेरी जिंदगी में , ऐसा अजूबा चांद देखा।।

बचपन की यादों में.

ऐ बचपन यादों में मेरी , बार बार क्यो आते हो ?

मृदुल भाव में था खोया मैं ,क्यो झकझोर जगाते हो??

मुझे त्याग तुम चले गये कब, निष्ठुरता की हद कर के ।

बेरहमी की सीमा सारी , तोड़ी ही नहीं , मसल कर के।।

त्याग चले गये बिना बताए ,ऐसी क्या मुझसे चूक हुई?

नहीं लौट कर है आना ,अटल प्रतिज्ञ जाने क्यों हुई ।।

बहुत दिनों तक साथ रहे , मिलकर आपस में दोनों।

अगाध प्रेम था हम दोनों में , सदा निभाया दोनों ।।

क्या हुआ अचानक ,पता न मुझको , हमको छोड़ चले गये।

भूल गया सारा अबतक का ,परित्याग मुझे क्यों कर गये ।।

निष्ठुर इतना तुम निकलोगे, सोचातक कभी नहीं था ।

बदल जाओगे इतनी जल्दी , शक तक तनिक नहीं था।।

भनक तक नहीं मिली थी हमको , त्याग मुझे चल दोगे ।

मुझे बिलखता छोड़ यहीं , चुपचाप निकल तुम दोगे ।।

करो याद पहले की बातें , सब कुछ भुला गये क्या?

क्या-क्या था अभियान हमारा , कुछ भी याद नहीं क्या??

कंधे पर बोझ दिया कितना , क्या झेल अकेला पाऊं गा।

क्या जिम्मेदारी अपनी सारी , उठा कर ढो ले पाऊं गा??

जिम्मेदारी का बोझ नित्य , बढ़ता ही जाता है ।

उठा उसे क्या पाऊंगा , सोंच ये मन में आता है ।।

फिरभी हिम्मत क्यों हारूं,समझ नहीं मन पाता है ।

पर चले गये क्यो निर्मोही , गम तेरा बहुत सताता है।।