मुक्तक

(क)

ज़ज्बात मे बहकर कभी , कुछ भी न कीजिए।

कुछ वक्त मन को दीजिए , और सोंच लीजिये ।।

हड़बड़ का लिया फैसला , गड़बड़ हुआ करता ।

यह ध्यान सदा दीजिए, मत चूक कीजिए ।।

(ख)

याचक से तो दाता होना , सर्वदा उत्तम होता ।

दाता का हाथ सदा ही उपर, याचक का नीचे होता।।

महत्व सदा दाता का होता ,याचक गौण सदा होता ।

सम्मान सदा पाता यह , याचक तो बस याचक होता।।

(ग)

व्यक्तित्व बड़प्पन से होता, दौलत से कभी नहीं होता ।

सम्मान बड़प्पन दिलवाता ,दौलत से सिर्फ नहीं मिलता।।

दौलत के साथ बड़प्पन हो , तो फिर उसका क्या कहना।

‘सोने पे सुहागा ‘बोला जो भी , अक्षरशः सच लगता ।।

मन है रत्नों का आगार.

दर्द देते है सभी , पर दर्द लेते भी सभी ।

बात यह मानव की है, यों जीव तो हैं ही सभी।।

जो पराया दर्द को भी , महसूस करते करीब से ।

सिर्फ मानव वह नही , उपर है मानव जीव से ।।

मानव की संख्या बढ़ रही , विभिन्न अनेक रुप हैंं ।

बाहर से जैसा नजर आते , भीतर वही क्या रूप है??

बाहर से कुछ दिखते वही , अन्दर भी वे होते नहीं।

इन्सान को ही लीजिए ,कुछ भी पता चलता नहीं ।।

जो अन्दर भीतर एक होते, वह मानव होते बडे महान।

छल-प्रपंच से वंचित होते, सज्जनता का यह प्रमाण ।।

मानव मस्तिष्क में ज्ञान भरा, भरने वालों ने ज्यादा।

उम्मीद बाँध रखा था उससे ,पहुँचा उससे भी ज्यादा।।

जो छल-प्रपंच का जीवन जीते,अमन चैन खो देते ।

जिनका जीवन सादा होता , जीवन का रस वे पाते ।।

सादा जीवन, सुखमय जीवन , जीवन रस काफी होता।

जीवन का माधुर्य सही में , जीवन भर उसको मिलता ।।

नहीं किसी का भय है उनको , ईर्ष्या नहीं किसी से ।

सुखमय जीवन वे जीते हैं ,हटकर इन सब कुछ से ।।

मानव मन की गहराई , होती जो बहुत अनन्त ।

पा सकते हैं तल तक जा कर , रत्नें वहाँ अनन्त।।

स्वयं आप का मन ही तो है, रत्नों का आगार ।

अन्यत्र खोज में भटक रहा क्यों , यह सारा संसार।।

मत तोड़ फूलों को झटक कर

मत तोड़ फूलों को ,इस तरह झटक कर ।

कोमल बड़े ये होते , दर्द से सिहर जायेगें ।।

स्पर्श अपने कोमल करों का , प्यार से करते उन्हें ।

तो शायद टूटकर भी वह , निहाल हो ही जायेगें ।।

देता हो दर्द कोई तो , देनें की भी नीयत होती

हैं हार जो रखे पहन फूलों का ,उतारने तो पड़ही जायेंगे।।

खुशियाँ तो आती है हर किसी की , जिन्दगी में कभी न कभी।

पर ठहर पाती है कितनी ,इन्हें लौटने तो पड़ ही जायेगें ।।

जाना तो जाना ही है सबको, यह है सत्य -अटल ।

निकले जनाजा धूम से , पहचान थोड़ा बन ही जायेंगे।।

हो भी कोई गिला शिकवा , अगर आपको हमसे ।

निकाल दें कहकर उसे बाहर, वरना ये हरदम सतायेंगे।।

कौन करता है न प्यार, इन कलियों, फूलों,पंखुड़ियों को।

हृदय की भावना से अधिक कोमल ,पल में कुम्हला जायेंगे।।

फूल तो फूल ही होते , सबों के आँख का तारा ।

कभी बन आपका सेहरा , समाँ में रंग लायेंगे ।।

होता जिन्दगी का यह , अति विशिष्ट पल सब से ।

दुल्हे राजा कहकर लोग , कंधों पर बिठायेंंगे ।।

हो सवार घोड़ेपर ,कमर में , तलवार लटका कर ।

क्या है शान जीवन का ,मजा क्या खूब आयेंगे ।।

दुनियाँ यूँ चलती जाती.

कुछ गाऊँ ,पर किसे सुनाऊँ , कौन सुनेंगा मेरा ?

सभी त्रस्त हैं खुद अपने में , गजब समय का फेरा।।

सुनने को तैयार न कोई, चाहे जो कुछ उसे सुना दो ।

खोल पेटारी भरा ज्ञान का , चाहे अपना वहाँ लुटा दो।।

लाख बुलाओ भरे प्यार से , देकर बहुत आवाज।

नहीं सुनेंगे फिर भी कोई , उनमें से कोई आज ।।

ध्यान न देगा बातों पर , अनसुनी कर देगा ।

मन ही मन में आपको, भरदम वह कोसेगा ।।

पर भरी नोट से पाकेट तेरी, अगर उसे दिख जाये ।

फिर तो सबकुछ छोड़ दौड़ वह,पास तेरे आ जाये ।।

बडे खुशामद से वह फिर तो , तेरा चरण दबायेगा।

मनगढी़ कहानी सुना -सुना, दिल को तेरा बहलायेगा।।

बडी लालची हो गयी दुनियाँ, हो गयी काफी लोभी ।

देकर मोटी रकम किसी से , करवा लें चाहे जो भी ।।

बिकने को तैयार सदा हो, बैठे ही रहते वे ।

ग्राहक आते दिख जाये तो, दौड़ पकड लेगें वे ।।

बहुत बचे कम ,थोड़े ऐसे , कभी न जो बिकते हैं ।

अम्बार मिले दौलत का भी , ईमान नहीं हिलते हैं ।।

लगता उनके सत्यबल से ही, दुनियाँ सारी चलती जाती।

आकण्ठ पाप में डुबो का भी , लिये बोझ बढ़ती जाती ।।

बहुत तमाशा होता रहता , दुनियाँ के इस रंगमंच पर।

दृश्य बदलते रहते हर दम,कोई कभी न रहता सदा मंचपर।।

क्या उचित यह हो रहा?

करते गुनाह खुद मगर , गुनहगार कहते और को ।

खुद गन्दगी में डूब कर , छींटा दिखाते और को ।।

सिलसिला ही समाज में , आज ऐसा हो रहा ।

सच्चाईयों पर झूठ का, पर्दा गजब का चढ़ रहा।।

चोर चोरी स्वयं कर , हल्ला मचाता चोर चोर ।

एक शरीफ को ही शोर कर, कहता रहा है चोर-चोर।।

लगता है इस परिवेश में , शराफत गुनाह बन गयीं।

शरीफ की गरिमा महज , मखौल बनकर रह गयी ।।

संख्या बलों का राज है ,अच्छे बुरे में भेद क्या अब?

बुद्धिमान, मूर्खाधिराज में ,रह ही गया है फर्क क्या अब??

‘खाजा टके सेर ,भाजा टके सेर,’ कहावत बहुत पुरानी।

मात्र थी पहले कहावत ,हुई अब संविधान की वाणी ।।

फर्क ही अब है बचा क्या , हों विद्वजन या हों गँवार।

हक तो सबों का एक है , मिला बराबर का अधिकार।।

शिक्षित अशिक्षित में नहीं अब, फर्क कुछ भी रह गया।

अशिक्षितों का राज अब तो , शिक्षितो पर हो गया ।।

मतलब ही हमने नागरिक का ,बदलकर के रख दिया।

देखा नगर नहीं जिन्दगी भर, पर नागरिक उसे कह दिया।।

एक प्यून बनने की नहीं थी, योग्यता जिनमें कभी ।

चयन कर गद्दी दिलाना , क्या उचित लगता कभी।।

तेल चमेली का छुछुन्दर ,के सिरों पर की कहावत ।

चरितार्थ होती नजर आती,क्या नहीं है यह कहावत??

अनिवार्य शिक्षा भी जरूरी, चाहिए उन लोग को ।

चाहें जो बनना जनप्रतिनिधि, उन सभी हर लोग को।।

मुक्तक.

(क)

मिली जिनको नहीं आँखें, अँधेरा क्या बिगाड़ेगी ?

सुरीली तान बंशी की, बधिर को क्या रिझायेगी ??

समाँ खुशबू भरा ही हो ,अनेकानेक फूलों से ।

घ्राण हो ही नहीं जिनमें, मादकता क्या झुमायेगी??

(ख)

कदम खुद ही बहकते हैं नहीं, बहकाये जाते हैं ।

जुबानें खुद फिसल जाती नहीं ,फिसलाये जाते हैं।।

गलत कुछ काम करनें के कबल,साजिश रचे जाते।

जिसके तहत सब काम को ,करवाये जाते हैं ।।

(ग)

बहाना लाख मारे कोई, बातें निकल जाती है ।

कब्रमें दफ्न कर देते , निकल कर आही जाती है।।

जरूरत अक्ल की होती, गडे को ढूँढ लेने की ।

धरती में छिपायी चीज भी, नजर आ ही जाती है।।

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शक्ति कलम की है इतनी.

उठता है मन मेंं एक द्वन्द्व ,जब पलकें होने लगती बंद।

थकन महसूस तभी होती,चलता है पवन जब मंद-मंद।।

कब नींद कहाँ से आ जाती ,तन मन को मेरे सताने लगती।

पलकें स्वतः हो जाती बंद, खुमारी मुझ पर छाने लगती।।

आलस्य न जानें क्यों आता,लगता तनमन है थक जाता।

विवस मुझे करने लगता,ब्यवहार अरि सा कर देता।।

कुछ चाह रहा था मैं करना,मन की बातें लिपिबद्ध करना।

पर कहाँँ इसे कर पाता हूँ, कलम पकडे सो जाता हूँ ।।

कभी तो कलम छिटक जाती,ऊँगली की पकड़ ढीली होती।

तब दिल को चोट पहुँच जाती,अफसोस मुझे काफी होतीं।।

मैं फिरसे इसे उठाता हूँ ,प्रायश्चित मन में कर लेता हूँ।

उद्धत होता फिर लिखने मे ,पर कर कुछ क्या पाता हूँ।।

मन में इच्छा है जग जाती, जग कर बलवती हो जाती।

फिर नींद कहाँ है चल देती, दूर बहुत है हो जाती ।।

कलम जब जोर पकड़ लेती, निर्विघ्न वही चलने लगती।

सागर को मीठा करदेती, पर्वत को बौना कर देती ।।

सब झुक जाते उनके आगे, सर अपना नहीं उठा पाते।

योद्धा भी खड़े नहीं होते , घुटनें टेक सभी देते ।।

चारण जयकार मचा देते ,कलम की बातें पढ़ लेते ।

कलम की शक्ति है कितनी ,नजर से सब को दिख जाते।।

सोया को पुनः जगा देती , हारे को जीत दिला देती ।

रणछोड़ भागना चाह रहे को , फिर से वापस लौटा देती।।

शक्ति कलम में है इतनी , नहीं एटम बम में जितनी ।

तुफान खडा करवा सकती ,कुछ और अधिक दमभीइसकी।।

पर शाँत सदा यह रहती है , बेचैन नहीं यह दिखती है।

जा रहा किधर है जगवासी ये नजरें सब पर रखती है ।।

जब कभी जरूरत पड़ती है, दिग्दर्शन भी करती है।

है किधर जरूरत जाने की ,बातें भी उसकी करती है।।

गुणगान नहीं करती खुद का ,है खुद छोटा दम बहुत बड़ा ।

बड़ों का यही बडप्पन है, औरों को कहता सदा बड़ा ।।