फैसला

किस बात को सच मान लें,लेना कठिन है फैसला ।

कब क्या है करना क्या नहीं,करना कठिन है फैसला।।

विभिन्न कचरे हैं भरे, जहां जन्म लेता फैसला ।

अम्बार कचरों का वहां , होता जहां पर फैसला।।

अपनी आंख पर पट्टी लगाये,करते बैठकर जो फैसला।

खुद देखना नहीं चाहते, सुन सिर्फ देते फैसला ।।

विश्वसनीयता का ले तराजू, जो हो रहा है फैसला ।

धृतराष्ट्र ने जैसा किया , होगा वही क्या फैसला ??

सुनते सदा दिन रात रहते, करते जो रहते फैसला ।

मस्तिष्क थका कर बैठ जाते,करना जिन्हें है फैसला।।

संतोष घटते जा रहा , होता देर से जब फैसला ।

असंतोष से संदेह पैदा, करवा रहा है फैसला ।।

लेकर तराजू बैठ गये, जिनको है लेना फैसला ।

उन्हें सावधानी है बरतनी , कहीं गलत न हो फैसला।।

लगाये टकटकी आंखें थकी ,फिर भी न आया फैसला।

उम्मीद करते जिंदगी गयी, फिरभी हुआ नहीं फैसला।।

पुश्त कितने गये बदल, फिर भी न होता फैसला ।

फिर सोंचना है लाजिमी, बेकार का है फैसला ।।

पथरा गयी हो,आंखें कितनी, फिर भी नआया फैसला।

मौत तक आया नहीं , फिर क्या सुनेगा फैसला ।।

कुछ करने से पहले जिंदगी में, करलें मन में फैसला ।

फैसला गर हो गया तो, बदले नहीं फिर फैसला ।।

जिगर में दर्द है होता.

नयन का तीर मत मारो, जिगर में दर्द है होता ।

कसम बेजोर है होती, दिल भी मचल उठता ।।

तुम्हारी हर अदाओं में , छिपा नश्तर हुआ होता ।

नजर भर देखता जोभी तुझे,चुभन उसको हुआकरता।

विधाता ने लगन के साथ, में तुमको बना डाला।

लगा अपनी कला सारी, करीने से सजा डाला ।।

लगाया कीमती चीजें,मंगाकर दूर से तुममें ।

कहीं से हुस्न मंगवाया , बिठाया था सभी तुममें।।

जहां भी चीज हो सुंदर, वही से उसने मंगवायी।

उचित स्थान पर उसने,लगन से उसको सजवायी।।

जवाब बस तूं ही तेरा , न कोई दूसरा जग में ।

ढूंढ कर हार हूं बैठा , मिला तुमसा नहीं जग में ।।

मुकाबला कौन कर सकता,और कोई है कहां वैसा?

जवाब बस तू ही है अपना,न कोई दूसरा वैसा।।

जन्नत शर्म से भागा , देख सौंदर्य को तेरा ।

छिपा जानें कहां जा कर, छोड़ धरती कोही तेरा।।

नाज रखते जो अपने आप पर,कभी जब हार जाते हैं।

हया से डूब जाते वे, छिपा मुख भाग जाते हैं ।।

किया है धन्य धरती को ,धर कर पैर धरती पर ।

आया बसंत ,तेरे पड़े जब पांव धरती पर ।।

धरा को छोड़ कर फिर से,जन्नत लौट मत जाना।

मुवारक हो तुझे धरती ,अब हरदम यहीं रहना ।।

हिंसक,आदमी ही बन गया.

जब आदमी से आदमी ही, खौफ खाने लग गया।

हिंसक जानवर से अधिक,हिंसक आदमी ही बन गया।

घृणित अब कामज्यादा आदमी काजानवर से हो गया।

‘बड़ा भाग्य मानुष तन पावा”अब मजाक बन रहगया।

अब लूट ही तो आदमी, दिन-रात करता रह गया ।

मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा,इनके सेल्टर बना रह गया।।

ये सारी आस्था की चीज उनका,बन खिलौना रह गया।

मठाधीश फुलाये तोंद अपना,जमींदार बनकर आगया।

जिसको जहां मौका मिला,सब लूटने में लग गया।

थोड़े बचे कुछ मूढ़ होगें,जो मौके से वंचित रह गया ।।

है कौन शत्रु,कौन हितैषी,समझना भी मुश्किलह़ो गया।

मुखौटे बदलने में प्रवीण,हर आदमी ही बन गया।।

इस रोग का निदान की ,दवा भी अब बची कहां ?

जो बनी सबे खत्म हो गये,डुप्लीकेट केवल रह गया।।

शैतान की शैतानियत से, शैतान भी अब डर गया।

अपनी ही बनाई’भायरस’से,अब स्वयं मरने लग गया।।

गैरों के घर के सामने,कुआं खोदने में लग गया ।

स्वयं ही आकर उसी में, गिरना शुरू भी कर दिया ।।

इन शैतान को शैतानियत की,देती दंड सदा ही प्रकृति।

फिर भी पतित इन्सान इतना,जो बात को ठुकरा दिया।

किस्से ,कहानीमें कभी थे, लोमड़ी को धूर्त कहते ।

अब लोमड़ी को छोड़ पीछे, इन्सान आगे बढ़ गया।।

कहते काक भी तो काक का, मांस को खाता नहीं।

पर आदमी तो आदमी का , मांस खाता रह गया।।

सारे जीव की उदंडता, आकर इसी में घुस गया ।।

जीवों में अजीब यह जीव मानव ,इस धरापर रह गया।

लगन.

लगन लगती किसी को जब, वही कुछ कर दिखाता है।

असम्भव जो लगा करता, कर सम्भव दिखाता है ।।

कहीं कछ भी असम्भव तो, दुनिया में नहीं होता।

जिसे कहते असम्भव हम ,वहम मन का वो है होता।।

लगन जिसमें लगी होती, कदम बढते चले जाते ।

असम्भव छोड़ पथ उनके,बगल में हो खड़े जाते।।

सफलता आ लगन के सामने,करबद्ध हो जाती।

लगनशील के चरणों में आ, नतमस्त हो जाती ।।

सफलता हर कदम चरण उनका, चूमती रहती।

कदम पड़ते जहां उनके , पांवड़े वह बिछा देती।।

लगन जिसमें लगी होती ,वही तो युग पुरुष बनता।

जमाना अनुशरण करता, कुशल नेतृत्व वह देता।।

कुशल नेतृत्व का मिलना, बड़ा संयोग है होता ।

नायक हर जगह और हर समय,पैदा नहीं होता।।

अलग कुछ शक्तियां लेकर, कहीं अवतार वह लेता ।

बिगड़ी ब्यवस्था को , नया एक मोड़ वह देता ।।

बड़ा संयोग होता है ,तो यह अवसर मिला करता।

नसीब ही हर लोग का, कब एक सा होता ।।

खल-गण नहीं आते नजर ,धरातल में चले जाते।

उनके विलक्षण रोशनी में, लुप्त हो जाते ।।

लगन हो खोजने की , वह कहीं से खोज ही लेते।

अदृश्य जो रहते , उसे भी द‌श्य कर लेते ।।

आओ जरा सम्हालो.

आता नजर न कोई , आवाज दूं मैं किसको ।

सुनेगा कौन मेरा , दिखता न कोई मुझको ।।

बिलकुल हूं मैं अकैला , नजरों से दूर सब है।

आवाज दूं मैं किसको , खुद ही में ब्मस्त सब हैं।।

है वक्त कहां किसीको , सुनकर जो पास आये ।

रग दुख रहे जो मेरे , मरहम वहां लगाये ।।

है एक मसीहा ऐसा ,सब का वही है सुनता ।

जरूरतों की पूर्ति , हर का अकेला करता ।।

देखा न कोई उसको , देखा न कोई करता ।

लोगों का यह कथन है, कहे को लोग सुनता।।

गज ने था जब पुकारा, वह दौड़ कर था आया।

थक हारता था गज को , उसने ही था बचाया ।।

अनेकों कथाएं ऐसी , सबलोग कहते आये ।

रोचक कथाएं लगती ,सब लोग सुनते आये ।।

जब भी समय हो गाढ़ा , उनको बुलाओ , देखो।

आये जो आर्त सुनते , उसे आजमा तो देखो ।।

गहरी थी बात कितनी , कुछ आजमा तो पायें ।

सुऩें जो हैं बात कानों , आंखों तो देख पायें ।।

सुनकर न कर भरोसा ,खुद आजमा तो देखो ।

वैज्ञानिकों का युग है , जरा सिद्ध कर तो देखो।।

देता सबों को वह है , लेता न कुछ किसी का ।

उसके भरोसे चलता , सब काम ही सबों का ।।

ऐ विश्व का रचयिता , आओ जरा तूं देखो ।

ब्यवधान तेरे कामों , में हो रहा सम्हालो ।।

ऐसा इतिहास गढ़ो.

लुत्फ भला लेते क्यो इतना,नफरत को फ़ैलाने में।

अपने घर के ही कोने में, खुद ही आग लगाने में।।

कितना सुन्दर,कितना बिशालघर,थातेरा इस दुनियामें।

उतना सुन्दर इतिहास भारतका,जोर नहीं था दुनियांमें।

फिरभी जानें क्यों तु फंस गये,गैरों के कुटिलछलावो मे

विकृत मस्तिष्क जो खुदहै बहके,उनके ही बहकावे में।

रख जगा चेतना अपनी हरदम,पड़ना मत तूं झांसे में।

हरगिज कभी नहीं फंसना तुम,उनके फेंके पांसे में।।

बहुत लोभ,लालच की बातें, कर तुमको भटकायेगे ।

सुख शांति का जीवन तेरा, उसमें आग लगायेंगे।।

सम्प्रदाय और धर्म-अधर्म की,बात सामने लायेगें ।

जो स्वयं धर्म को समझ नपाते,पर औरोंको समझायेगें।

है मकसद उनका सिर्फ आपको,सत्पथ से भटकाना।

चल रही जिंदगी अमन-चैन से, उसमें आग लगाना।।

मजहब उनका एक सिर्फ, दंगों को फैला देना ।

जलते कटते देख सबों को उसमें लुत्फ उठा लेना।।

ये बिके लोग है होते ,करवाते हैं हत्यायें चोरी ।

मरे कटे चाहे जो कोई, है करनी उनको गिनती पूरी ।।

अगर चाहते जीना सुख से,मानवता का पाठ पढ़ो ।

सुख-शांति, समृद्धि हो ,ऐसा ही इक इतिहास गढ़ो।।

अपने पूर्वज गये दिखला जो,सुख,शान्ति का मार्ग हमें।

उनका ही अनुकरण करें, कुछ और जरूरत नहीं हमें।।

समय सब कुछ कराता है.

न कोई मित्र होता है , न कोई शत्रु होता है ।

समय के हाथ में सारे ,वही सबकुछ कराता है।।

स्नेह जबतक भरा होता, दीपक प्रज्वलित रहता ।

पर जब खत्म हो जाता,दीपक स्वयं बुझ जाता।।

जलते स्नेह ही,पर दीप का जलना इसे कहते ।

दीप तो बिन स्नेह के, एक पल नहीं जलते ।।

करता कौन है जग में, किसी का नाम पर होता ।

प्रचलन यह पुराना है ,। यही तो सर्वदा होता ।।

जगत जिसने जना , उसको कहां देखा किसीने ?

अटकल बाजियों का खेल , खेला है सबोंने ।।

वर्चस्व रखने का सदा , झगड़ा यहां है ।

निज फायदे का फिक्र ही , रहता उन्हें है ।।

सब लोभ ,लालच मोह में, मानव फंसा अब ।

निस्वार्थ और निष्काम , जानें गये कहां कब ।।

यही अवगुण है हावी, जो मनुज को खा रहा है ।

सद्गगुण को दबा उनके , उन्हीं पर छा रहा है ।।

दिल में हो रहा है, अवगुणों की वृद्धि नित-दिन।

अब हो रहा है ह्रास , मानवता का प्रति-दिन ।।

न जाने यह कहां तक जायेगा , गिरता हुआ अब ?

गिरेगा और ज्यादा , या सम्हल ही जायेगा अब ??

लटकता ही रहेगा क्या अधर में, भविष्य इसका ?

या निकलेगा चमक कर और ज्यादा,भाग्य इसका ??

जो भी है समय के हाथ में, सारा पड़ा है ।

यही बतला सकेगा , और क्या बाकी पड़ा है।।

समय सबका बदलता ,बस यही तो सत्य अटल है।

सुधा भी तो समय के साथ,बन सकता गरल है ??