आज सच्चाई विवस है.

ये दुनिया उसी की , जमाना उसी का ।

जो शराफत न सीखी, हुआ न किसीका।।

नहीं पास तहजीब, न तौर न तरीका ।

नहीं पास विद्या , न सीखा सलीका ।।

गलत काम सबको ही , मन आज भाये।

गलत जो न करते , वे मूरख कहाये ।।

बेईमानों के हाथों ,सच्चाई बेबस है ।

सिवाये सिसकने के ,चलता न बस है।।

बुरा कर्म करना , उन्हें सिर्फ आता ।

जो बुराई में डूबे , मन इनको भाता ।।

चोरों , बेईमानों का , संगत उन्हें है।

नजरों में उनकी , सज्जन ही बुरे हैं ।।

रखते वे खुद को , नशा में डूबोये ।

कोई नशा उनसे , बचने न पाये ।।

डूबे रहते तो खुद , औरों को भी डुबोते।

नये लोग को ,अपना पथ ही बताते ।।

इनकी संख्या बड़ी है,जामायत बड़ी है।

बुरे पथ पे चलने की ,हिमायत बड़ी है ।।

इनसे बचकर निकलना, तो आसां नहीं है।

जो आये इधर ,उनको फॅसना ही तय है ।।

जो जीवट के होते , बच पाते वही हैं ।

जिन्दगी की भॅवर में वे, फॅसते नहीं हैं।।

करोना से बहुत , येतो होता है घातक ।

बना कर ही छोड़ेगा , युवकों को पातक।।

समय जब निकलता ,पश्चाताप होता ।

जो पक्षी उड़ा , फिर पकड़ में न आता।।

जुगनू

गाॅवों के परिवेश में, अद्भुत चमक हम देखते हैं।

सन्ध्या समय उन्मुक्त पवन में, तैरते कुछ देखते हैं।।

कौन सा ये जीव प्यारा,जो मन हमारे मोहते हैं?

नाम जुगनू दे इसे हम, प्यार से ही पुकारते हैं ।।

इठला के उड़ता है हवा में, गर्व से कुछ सोंचकर।

चुपचाप उड़ता मौज में ,संध्या प्रहर को हेरकर ।।

लगता है मानों आ गये , तारे उतर कर आसमाॅ से।

उड़गण के बच्चे खेलते,मिलजुल जो बच्चे हैं जमीं से।।

बैठकर कुछ लूट सकते, हैं मजा इस दृश्य का ।

लुत्फ ले सकते सभी, इस टिमटिमाते दृश्य का।।

दिन-रात दोनों का मिलन, सन्ध्या प्रहर है नाम तेरा।

इस गोधुली के वक्त से , क्रीड़ा शुरू होता है तेरा ।।

यह मिलन का वक्त है ,संन्ध्या , दिवस दोनों प्रहरका।

वक्त पावन और उत्तम , मुहूर्त है अच्छा मिलन का ।।

टिमटिमाता जुगनूओं का , दृश्य आकर्षक बड़ा है।

कुमकुम जमीं पर आसमां से, कोई तो बरसा रहा है।।

देखकर तेरा नजारा, लोग पीछे पड़ गये हैं ।

छोटे अनेकों बल्ब ले ,तेरे नकल में लग गए हैं।।

पर चीज असली और नकली ,एक हो सकती नहीं।

नकली सदा नकली रहेगी,असली तो हो सकती नहीं।।

पर तुच्छ जुगनू कीट छोटी , तौलकर तो देखिये ।

गुण कम नहीं उसमें भरा है,औसत लगाकर देखिये।।

यह न करता है क्षति , छोटे बड़े कोई जीव को ।

नृत्य अपना है दिखाता , उड़ चमक हरलोग को।।

जीव तुम छोटे ,बड़े पर खेल दिखलाते सदा ।

तुम टिमकते , टिमटिमा , मन मोहते सब का सदा।।

दूर करता नृत्य तेरा, परेशानियाॅ सब लोग का।

मन भी बहलाते सबों का, मिटता थकन हर लोग का।।