दीदार तेरा जब हुआ.

बाण कुछ देखा निकलते , नयनों की तेरे तुणीर से।

आया तो दिल के पास ही,गुजरा जिगर के करीब से।।

दर्द करता जा रहा ,कमता न कोई निदान से ।

मुक्ति न दिल भी चाहता,उनकी बनाई चिह्न से।।

यादें तुम्हारी कौंधती , सीने में दिखते दाग से ।

आती बड़ी रफ्तार से,जाती न उस रफ्तार से।।

यह सितम तुमने निकाला,नयनोंके अपने कमान से।

यह बाण जीने तो न देती, मरने न देती चैन से ।।

क्या करूं मै इस चुभन को,जुड़ गयी मेरे प्राण से।

ऐसा अनोखा दर्द दिया, अपने नयन के बाण से।।

जाने तड़प में क्या मजा , जाने जुड़ा किस तार से।

यह दर्द भी आसां नहीं, जुडा जो मेरे यार से ।।

चिन्ता नहीं मुझको कभी , धो हाथ दूॅ मैं प्राण से।

होना है जो , होकर रहेगा ,किसे क्या पड़ी मेरे प्राणसे।।

दीदार तुमसे जब हुआ, सूरत बसी मन में मेरा।

ओझल नही पलभर कभी,हो पाई है मन से मेरा।।

दिल की दनिया पर मेरी , है अकेला राज तेरा।

तेरे सिवा कोई नहीं ,अखंड सारा राज तेरा ।।

सिवा तुम्हारे और कोई, होगा न कोई दूसरा।

पर्याय भी शायद मिले, इस जहां में दूसरा ।।

मैं नमन करता उसे, जिसने बनाया है तुझे।

लगता है नयनों कि ये तारा ,बस यही केवल मुझे।।

भूल का एहसास हो जाये.

किये गये भूल की अपनी , जिसे एहसास हो जाये।

तो उनकी जिंदगी में सर्वदा , प्रकाश छा जाये ।।

गिरे जो कूप में होते , निकल बाहर चला आये ।

पर्वत की शिखर तक एकदिन,निश्चित पहुंच जाये।।

अपनी भूल का एहसास पर, जिनको हुआ करता ।

उनका दिल में जज्बा , बालपन से ही भरा रहता।।

़झिझक में वे पड़े रहते , बॅधे संकोच से रहते ।

कहीं अवसर मिला उनको,तोड़ बंधन निकल जाते।।

सितारे सा बहुत ऊॅचाईयो तक, वे चले जाते ।

धरा से उठ गगन तक, पहुंचने का हौसला रखते।।

ऐसे लोग इस संसार में , अमर हो जाते ।

बाल्मीकी , दास तुलसी, सा चमक रखते ।।

एहसास करना भूल का , आसान न होता ।

दिल उनका बड़ा होता,कभी कमजोर न पड़ता।।

दृढ़प्रतिज्ञ वे होते , अगर कुछ ठांन वे लेते ।

बिना पूरा किये उसको, दम तक नहीं धरते।।

बाधा देख उनके सामने से, भाग हैं जाते ।

उनके आगमन का रास्ता, प्रशस्त कर देते।।

ऐसे लोग तो जबकभी प्रण , ठान हैं लेते ।

मग में आये बाधाये , हाथों खड़ा कर लेते।।

उनको देखते बाधायें, खुद ही भाग जाती है।

हिम्मत लौट आने की ,फिर, जुटा न पाती है ।।

जो बोलें बिचार कर बोलें.

जितनी बात दिल में हो,बताई जा नहीं सकती।

होती बात कुछ ऐसी, छिपानी सख्त उचित होती।।

कुछ ऐसी हुआ करती , गलत प्रभाव जो देती।

अच्छे भले माहौल को, दूषित किये देती ।।

बातें मन में जो आये , उसे मंथन जरा कर लो ।

मस्तिष्क गर उचित कहदे,तो अवश्य ही कह दो ।।

बिन सोंची हुई बातें , कभी ऐसी गलत होती ।

सुधारें भी अगर उसको,सुधर पर वह नहीं पाती।।

नतीजा क्या निकल आये, कोई कह नहीं सकता।

सदा संग्राम महाभारत,जैसा भी करा सकता ।।

समय पर ही सभी बातें , उचित मालूम है पड़ती।

असमय ब्यक्त खूबियां भी, कभी बेकार सी लगती।।

किसी भी बात करने का समय, अनुकूल जब आता।

बातें आपकी भी उस समय,अति प्रभावी हो जाता ।।

समय ही सब कराता है, मानव कुछ नहीं करता ।

वक्त जब साथ देता है ,तब सबकुछ सुधर जाता।।

सच बोल देना भी,कभी अपराध हो जाता ।

गुण जितना भरा हो आपमें,अवगुण कहा जाता।।

मस्का लगाते जो, उन्ही का कद्र है होता ।

मस्केबाज की नजरों में , ऐसा भद्र कहलाता ।।

पर मस्का लगाते जो , भरोसे का नहीं होते ।

जरूरत आ गयी तो आपसे, मुॅह फेर भी लेते।।

ऐसेलोग दुनियां में, अधिकतर ही मिला करते।

बहुत कम लोग होते जो,समय पर काम हैं देते।।

भरोसा के कबल उसको, बहुत अच्छी तरह परखें।

खड़ा उतरे अगर फिरभी ,नजर में ही उन्हें रखें ।।

सिर्फ बता सकता वही.

छोटी सी है दुनियाॅ हमारी , छोटे -बड़े सबलोग हैं।

पर कौन हैं अपने हमारे, इनमें कितनें लोग हैं ??

ढूंढना आसान न उसमें,लगते एक जैसे लोग हैं।

पर सोंच तो अपना सबों का,स्वतंत्र सारे लोग हैं।।

पहचान लेना आदमी को,काफी कठिन यह काम है।

किसके दिल में क्या छिपा,क्या जानना आसान है??

मनोविज्ञान सारा फेल होता, लोग कुछ के सामने।

धज्जियाॅ देते उड़ा , वे लोग अपने सामने ।।

जिसने बनाया मानवों को,दे ज्ञान का तोहफा उन्हें।

कुछ अभागे लोग उन्हीं में, ब्यर्थ कर डाला उन्हें ।।

सबको बनाता एक जैसा, मूर्तिकार अपनी मूर्त्तियाॅ।

एकाध कोई उसीमेंसे , निखर बनती सुर्खियाॅ ।।

शिल्पी कहाॅ जाने छिपा है , निर्माण करता जा रहा।

विभिन्न गुण और शक्तियाॅ भर , मानवों को गढ़ रहा़‌।।

किससे कराना काम है क्या,सिर्फ वही तो जानता।

कैसे करेगा क्यों करेगा , केवल उसी को है पता ।।

शिल्पीकार केवल ही नहीं , निदेशक बड़ा सबसे यही।

कब किसे क्या रोल करना, सिर्फ बता सकता यही।।

उसके बिना निर्देश के, कुछ कमी होता नहीं ।

जो चाहता वहहै कराता ,कुछ अन्य कर सकता नहीं।।

दुनियाॅ बनाई जो किसी ने, क्या बनाई खूब है ।

हम सब खिलौने मात्र उनके,क्या नहीं ताज्जूब है??

नीर ,नयन या बदली का.

नीर भरी बदली और तेरी ,नयनों में क्या फर्क रहा।

दोनों ही जल बरसा देती, जब भी उनका जी चाहा।।

तुम दोनो जीवनदाता हो, बिन दोनों जीवन कैसा?

नहीं रहे दोनों में कोई, कमी खलेगी तब कैसा ??

नीर ,नयन बिन जीवन का,क्या संभव है बचना ।

नयन बिनाजीवन दुष्कर,पर जलबिन बचेगा कितना।।

जल बरसाते हैं दोनों ही ,पर भेद अलग दर्शाता है।

बरस बादल खुद जीवन देता,आंसू दुखको दर्शाता है।।

काम अहम दोनों का रहता,जीवन दोनों से चलता है।

कमी किसी का गर हो जाये,जीवन दूभर हो जाता है।।

दोनों ही नीर हुआ करते,पर कर्म अलग दोनों का।

एक नयन का रक्षक होता,एक पूरे जीवन का ।।

पर महत्व दोनों का अपना, दोनों ही धर्म निभाते हैं।

निरत रहते दोनों कर्मो में,कर्म को धर्म समझते हैं।।

दोनों हैं बरदान प्रकृति का,सारे जीव-जंतु के खातिर।

मुफ्तबाॅटती रहती खुदही,सबकेजीवन रक्षणकेखातिर।

आभारी हम सारे मानव,देख प्रकृति के कामों को।

क्या क्या चीजें दे रखी है,‌हमसब के जीवन यापनको।।

जग में जितने जीव-जंतु हैं,सबके सब अनुगृहीत तेरा।

जो दे रखा सब तेरा है, उसमें रखा क्या मेरा ??

जो कुछ भी तूॅ दे रखा , बहुत ही दे रखा है।

हर चीजें जो हमें जरूरत,कम कहीं नहीं रखा है।।

असली नकली.

कुछ बिश्वास करते लोग , हाथों की लकीरों में ।

हनन पर कर नकली ,घुसे जो है फकीरों में ।।

नकलची लोग दुनियाॅ में , सर्वदा से रहा करते।

चाहे कोई भी युग हो , उपस्थित वे रहा करते ।।

नकलची ,नकलची होते, नकल कुछ का भी कर लेते।

चाहे वे किसी का भी , नकली रूप धर लैते ।।

करिश्मा यह‌ दिखाकर लोग को ,भ्रमित कर देते ।

नकली रूप को उनके , लोग असली समझ लेते।।

नकली की ही दुनियाॅ में,अति विकास होता जा रहा।

असली यूं भी कम होते ,अब तो लुप्त होता जा रहा।।

अब अधिकांश चीजें भी , नकली बना करते ।

हर उपयोग की चीजें, असली कम मिला करते।।

अब लोग में नकली की आदत,घुंस गयी ऐसी ।

यहां तक जान-रक्षक दवा को, भी नहीं बख्सी।।

भले ही जान अपने ,स्वजनों की ही चली जाये।

मकसद सिर्फ है उनका,अधिक दौलत चली आये।।

दौलत के अलावे,और कुछ उनको नहीं भाती ।

मतलब तक नहीं उनको,ये चाहे जैसे भी आती।।

कूकर्म दौलत के लिए, ऐसे किया करते ।

कितनी जान जा सकती ,सोंचा तक नहीं करते।।

न जाने क्या करेंगे लोग ऐसे,दौलत जमा करके।

खाली हाथ ही जाना पड़ेगा ,नहीं कुछ साथले करके।।

नियति का यह नियम तो,सर्वदा से ही अटल है।

दौलत छोड़नी पड़ती यहीं, चाहे चल अचल है।।

फिर भी मोह माया ने मनुज को, जकड़ है डाला।

जानता लोग सब सच्चाई को, पर भुला जाता ।।

जाम नजर आया .

छलकता तेरी आंखों से मुझे , जाम नजर आया।

काली घटा सी जुल्फ में ,लिखा पैगाम नजर आया।।

मुखरे की निकलती तेज में , कुछ अजीब नजर आया।

दिव्य-ज्योति का मुझे , एहसास हो आया ।।

तूॅ धरा की अमानत हो , या हो हूर जन्नत की ।

मैं क्या तुझे समझूॅ , समझ में कुछ नहीं आया ।।

तेरी शोख चितवन में ,भरा जादू नजर आया।

चितवन बाण से आहत ,सारा जहान नजर आया।।

रोको निकलते वाण अपने ,अब और मत मारो ।

सम्भावना बचने का हमें , थोड़ा कम नजर आया ।।

घायल हो गया गम्भीर ,तेरे चितवन के बाणों से।

चुभोते वाण में मुझको , उभरता प्यार नजर आया ।।

कभी मुॅह खोलता नहीं.

जिसने बनाई दुनियाॅ ,कभी कुछ बोलता नहीं ।

छिपा सब भेद को रखता ,कभी मुख खोलता नहीं।।

जगत में चीज जितनी है , सभी उनके नजर में है।

कौन क्या कर रहा कहां, छिपा उनसे कहाॅ कुछ है??

नज़रों से कभी ओझल , नहीं कुछ भी हुआ करता।

कहां कुछ कर रहा कोई, खबर उनको रहा करता।।

मर्जी के बिना उनकी, खड़क पाता नहीं पत्ता ।

उनकी बिना ईच्छा , कहीं पर कुछ नहीं होता।।

कुछ भी कहीं होता , सब कुछ वही करता ।

कहते वह नहीं करता,तो कुछ भी नहीं होता।।

सारे जीव-जंतु को , वही भोजन कराता है।

कितना चाहिए उसको,वही सब कुछ पठाता है।।

आहार किसका क्या , वही निश्चित किया करता।

अनुरुप ही उस जीव क़ो, सबकुछ मिला करता ।।

जिसे जैसा बनाया है, वैसा सब उसे मिलता ।

जो घास खाता है , उसे तो घास ही मिलता ।।

खाती चींटियां मीठा , उसे मीठा मिला करता।

जो माॅस भक्षी हो , उसे तो माॅस ही मिलता ।।

बनाई जो भी हो दुनियाॅ , क्या खूब बनाई है।

जरूरत की सभी चीजें, वाखूब बनाई है ।।

कैसे जी लेते हैं.

(गजल)

पीने का कुछ न कुछ तो,बहाना बना देते हैं।

उठा के जाम सभी , जहर का, पी लेते हैं।।

पता सभी को है, ये चीज है बहुत ही बुरी ।

फिर भी उस जाम को, होंठों से लगा लेते हैं।।

ज़िन्दगी छोड़कर ,जाना तो है, निश्चित ही कभी ।

कुछ लहमों को , खुद यूं ही ,लुटा देते हैं ।।

बनाने वाले ,बनाया तो , यूं ही सब को ।

पर वे अपनों को , गैरों सा बना देते हैं ।।

खुद ही पीते हैं मगर, देते नहीं, तोहमत खुद क़ो।

इल्जाम कुछ ढ़ूंढ़ कर, औरों पे लगा देते हैं ।।

खुद ही बेहोश रहते , न होता होश उन्हें ।

इल्जामे बेहोशी का , पीने का लगा देते हैं।।

जो पीना नहीं जाना.

तुझे मैं भूलना चाहा , मेरा दिल भूल न पाया।

तेरी याद की तोहफा , दिल से जा नहीं पाया।।

कर के देख ली कोशिश ,अथक प्रयास कर डाला ।

कहाॅ मैं भूल पाया कुछ, उल्टे बढ़ा कुछ डाला ।।

भटकता देखकर मुझको, शरण दी प्यारी मधुशाला।

भुलाने केलिये गम को , थाम ली , मय का मैं प्याला।।

सुबह जब आंख खुल जाती ,थामता हाथ में प्याला ।

निरंतर यह चला करता ,खुला जब तक हो मधुशाला।।

यही हमको सुलाती है,यही हमको जगा देती ।

यही एक है सखा सच्ची,सदा जो काम है देती।।

असर जब तक रहा करता, सारा गम भुला रहता।

असर कमता मधु का जब , गम भी पलट आता ।।

खुदा भेजा है दुनियाॅ में, शायद गम भुलाने को।

साकी साथ दे रखा, मय सब को पिलाने को ।।

हलक से जब उतरती है, गमों को दूर कर देती।

सबकुछ भूल जाने को, उसे मजबूर कर देती।।

कहाॅ गिर जाये वह पी कर ,रहता गम कहाॅ उसको।

कुत्ते शू करे मुॅह पर , पड़ता फर्क क्या उसको ।।

गमों से दूर रखती है ,उसे आनै नहीं देती ।

गम चाहे वो जैसा हो, खटकने पास न देती ।।

यह बरदान है भेजा , खुदा ने मय औ मयखाना ।

भला वह मर्म क्या जाने , जो पीना ही नहीं जाना।।