चल अपनी राहों पर

राही चल अपनी राहों पर ,जितना चल सकते तुम ।
ध्यान सदा ही रखना , कहीं भटक नहीं जाना तुम ।।

चौराहे पर खडे़ हुए हो , यह जीवन का चौराहा है ।
चयन तुझे ही करना है पथ ,किन राहों पर जाना है।।

राह यहाँ से बहुत निकलते, अलग जगहों पर जाने का।
जिसने पकड़ा जो मार्ग , बस वहीं पहुँच जाने का ।।

इसी जगह से मार्ग निकल कर , सभी दिशा में जाते हैं।
जिसने जो पकडा मार्ग यहाँ से, वहीं पहुँच वे जाते हैं ।।

अपने विवेक से चयन मार्ग कर, जो तुमने पाया है ।
दे कर विवेक ही तुमको भेजा , जिसनें भी तुझे बनाया है।

हर मानव अपनी किस्मत का , खुद ही तो है निर्माता ।
देर सबेर उसे एक दिन , गणतब्य अवश्य है मिल जाता।।

पथभ्रमित पथिक अपनी राहों से, गणतब्य नहीं पाते हैं।
कहीं सोंच कर चलते पर, कहीं और पहुँच जाते हैं ।।

दोषी खुद हों ,पर दोष न लेते,अन्य किसी के सर चढ़ते ।
जीवन में जन साधारण , सदा ही यही किया करते ।।

महसूस जो करते स्वयं भूल को, प्रायश्चित करते हैं ।
बाल्मिकी और कालिदास की , श्रेणी में रहते हैं ।।

भूल कभी भी हो जाये तो ,मानव का स्वभाव रहा है ।
किये चूक महसूस करे , ऐसों का सदा अभाव रहा है।।

सदा चाहते किये भूल को , तर्को को ढ़क देना ।
अपनी गलती छिप जाये ,गलत को सत्य बना देना ।।

आसान न होता सत्य दबाना ,यह बारूद का है गोला ।
नहीं दबा सकते ज्यादा , बिस्फोटक भी होता गोला ।।

हम सब जीवन-पथ के राही , सम्हल कर चलना सीखो ।
चूक न कर , चल सदा सम्हल ,सावधानी बरतनी सीखो।।

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