समाधान हो जाये.

घृणा हो ही नहीं इस लोक में, बस प्यार रह जाये ।

तो सबसे श्रेष्ठ लौकों में , ये पृथ्वी लोक हो जाये।।

यही है कर्म का स्धल , यही सब कर्म होता है।

हो कूकर्म या सूकर्म ,सारे यहीं होता है ।।

कहीं पर स्वर्ग है होता , जैसा लोग सब कहते।

यही, स्थल परीक्षा का , परीक्षा सब यहीं होते ।।

सफल हैं जो हुआ करते , उसे वह लोक मिल जाता।

स्थिति-प्रज्ञ रहने का , अहम संदेश मिल जाता ।।

परिक्षा पर कठिन होता,सफल कमलोग हैं होते ।

मही पर आ भटक जाते , गलत राहों पे चल देते।।

काम,क्रोध, मद ,लोभ का , फंदा बिछा होता ।

फैला जाल को अपना , लोगों को फंसा लेते ।।

घृणा का जड़ यही होता , अनोखा ढंग है इनका।

‘ये चारों अस्त्र जो होते ‘, बड़े मजबूत है इनका ।।

घृणा जब फैल जाता है, मनुज शैतान बन जाता ।

हिंसक जानवर से भी , इसे बदतर बना देता ।।

इसे बदनाम कर सबके ही , नजरों से गिरा देता ।

सदगुण ही मानव जिन्दगी का,खत्म कर देता ।।

घृणा का भूत मानव जिन्दगी से, दूर हो जाये ।

मात्र पावन हृदय में ,प्रेम का संचार हो जाये ।।

फिर हर आदमी, अपने आप में महान हो जाये।

सारी समस्या जगत की , समाधान हो जाये ।।

फिर तो बात ही जन्नत की, सारी खत्म हो जाये।

मही ही स्वयं ‘जन्नत’ का, नया पर्याय बन जाये ।।

विश्व-हिन्दी दिवस.

हमारी हिन्दी का विश्व में, बढ़ रहा सम्मान हो ।

जब विश्वब्यापी हिंदी का, मिल रहा स्थान हो ।।

जब विश्व के हर कोने में, हिंदी का मान हो ।

फिर क्यो न हिंदी भाषियों को,गर्व का भान हो।।

फैलता जब जा रहा , हिंदी का कीर्तिमान हो ।

देता दुआ है मन मेरा , बढ़ता ही रहे शान हो ।।

हिंदी में बोल-चाल में ,गर्व का एहसास हो ।

इसकी सुगम मधुरतासे, श्रोताओं को मिठास हो।।

कर्ण-प्रिय सब का बने, ऐसा मधुर प्रवाह हो ।

स्वीकार सब का दिल करे, इस हिन्दी का मिठास हो।।

हिंदी बढ़े आगे बढ़े, सूरज सा किर्तिमान हो ।

इसी के आलोक में,चमकता रहे जहान हो ।।

प्रसार में जो लोग हैं , जयकार हो , जयकार हो ।

हैं प्रशंशा के पात्र ये , उनको भी नमस्कार हो ।।

मांगता हूं मैं दुआ , यह विश्व को रौशन करे ।

आभा निकल इसके सदा ,लोक आलोकित करे।।

सदा ही चमकता रहे अब , किर्तिमान तेरा विश्व में।

ज़ुबां से निकलता रहे , तूं हिन्दी पूरे विश्व में ।।

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रूप होने से मानव नहीं होता.

भरा हौसला होता जिनमे, कुछ करके दिखलाने का।

सफल वही हो पाते अपना , मानव जीवन पाने का।।

मानव जीवन पाने का मकसद,वही सफल कर हैपाते ।

जो जीवन को अपने हरदम,सन्मार्गों पर लेजा पाते।।

सदा भलाई औरों का,करने की हो अभिलाषा जिनकी।

मानव वही सफल होते, सफल जिन्दगी होती उनकी।।

वन्य जीव भी तो अपना, खुद का जीवन है जी लेता ।

किसी जीव की कर हत्या ,अपनी भूख मिटा लेता ।।

नहीं फिक्र उनको रहता है, बाकी अन्य जीवों का ।

फिक्र सिर्फ इनको रहता ,उदर अपना भरने का ।।

मानव जीवन वही सफलहै,करतेऔरोंका जो कल्याण।

‘जियो और जीने दो’का , करते जो हरदम सम्मान ।।

वृथा लोग वैसे होते , जो अपने लियै जिया करते ।

नहींभलाई कभीकिसीका,तन,मन,धनलगा कियाकरते।

एक वन्य-प्राणिऔर उस मानवमें,फर्क कहां रह जाता।

इससे अच्छा तो वन्य-प्राणि, जो धोखा कभी न देता।।

जौ मानव हो कर कर्म नहीं, मानव का है करता ।

कर्त्तव्यनिष्ठा हो न जिसमें, पशु से भी बदतर होता ।।

रूप नहीं काफी होता , एक मानव बन जाने का ।

वहतो पशु सेबदतर होता,हकक्या मानव कहलाने का।

ऐसे ही निकृष्ट कर्मों से , मानव बदनाम हुआ करता ।

परदेख मुखौटा कभीनहीं,इसका पहचान हुआ करता।

सोंच है अपना.

कोई दुनियां बड़ी कहता ,तो छोटी कोई है कहता।

जिसकी जो समझ होती,वही उसको कहा करता।।

नहीं है कोई पैमाना , उसै जो नाप ले जा क र ।

पैमाने से बड़ा को बडा , चलाते काम है कहकर।।

है अहमियत उसका नहीं, अहमियत सोंच का होता।

नापना चाहते कैसे , अहमियत ढंग का होता ।।

होती सोंच की सीमा नहीं, सीमा से रहित होता।

किसी का सोच है कितना बड़ा,कोई कहनहीं सकता ।।

कहां कोई बांध पाया आजतक,इस सोच को अपने।

बनाया है उसे जिसने, बनाया खूब है उसने ।।

एक ही चीज को कहते बड़ा कोई,छोटा कोई कह देता।

नजरिया है अलग सब की,जो कहता ठीक ही कहता।।

दुनियां है बड़ी कितनी ,अभी तक है कहां जाना ।

अभी समझा जहां तक, मानता उसको ही पैमाना।।

प्रयासरत हैं जानने में, रहस्य कुछ ब्रह्माण्ड का हम।

समझना है अभी बाकी ,पर हैं लगे दिन-रात सब हम।।

हौसला जो है तो शायद, हम वहां तक भी पहुंच लें।

बहुत जो दूर दिखते ,रास्ता पर सुगम कर लें ।।

मनुज जब ठान लेता है,हासिल किये बिन दम न लेता।

विधाता स्वयं आ उसको, सबकुछ पूर्ण करा देता ।।

बहुत सी शक्तियां देकर , मनुज उसने बनाया है ।

कुछ भी कर दिखाने का, जौहर दे पठाया है ।।

उन शक्तियों को जागृत , कर सिर्फ है रखना ।

अपने कर्म-पथ पर अग्रसर , होते सदा रहना ।।

सफलता

सफलता आज भी ,उनके चरण की धूल बन जाती ।

कर्मठ ,दृढ-प्रतिज्ञों की सहर्ष,अनुचारी बन जाती।।

नहीं वे मांगते कर जोड़,ना गरदन झुका अपने ।

सफलता स्वयं आती है ,गले की हार बन उनके।।

कर्मों का भरोसा हो , अपने आप पर जिनका ।

सफलता चूमती भरदम कदम ,उस कर्मयोगी का ।।

सफलता स्वयं जा उनके, गले की हार बन जाती।

आती स्वयं ही चलकर, आकर धन्य हो जाती ।।

पाने को सफलता जो , कोई भी गिड़गिड़ाते हैं।

सफल समझें वे अपनी जिंदगी में, हो न पाते हैं।।

इसके लिये अपने , जो घुटने टेक हैं देते ।

असफल लोग ये होते , बड़े बदनाम भी होते।।

सम्मान ,मानव की निधि , अनमोल है होती ।

जिसने खो दिया उसको, मानव में कहां गिनती??

मानव खत्म हो जाता , ढांचा सिर्फ बच जाता ।

चलता हुआ बस एक , नर कंकाल रह जाता ।।

सफलता चाहिए हर को, बेंच सम्मान पर हरगिज नहीं।

संकट जायेपड़नी झेलनी,समझौता कभी हरगिजनही।

वरना आदमी और जानवर में,फर्क क्या रह जायेगा।

एक जानवर सा आदमी,भरता पेट ही रह जायेगा।।

एक इन्सान और एक जानवर में ,क्या होता फर्क है।

आदमी संयमित हर काम में, रहता यही तो फर्क है।।

होते जो सफल हों ज़िन्दगी में, कर्म कर अपना ।

बनताहै सितारा वह गगन का,जिसे पहचान है अपना।