ज्ञानी मचाते शोर नहीं .

सच्चिदानन्द सिन्हा

चाहता विध्वंस वही , जो निर्माण कर पाता नहीं।

आसान है विध्वंस करना, निर्माण पर आसाॅं नहीं।।

जिसने बनाई सृष्टि सारी , उसको समझ पाया नहीं।

क्या बनाया, क्यूँ बनाया , भेज़े में घुंस पाया नहीं ।।

देखा नहीं जिसको अभी तक,तेरी सोच में जो गया नहीं।

अज्ञानता की दौड़ में, भटके पड़े होंगे कहीं ।।

ज्ञान जिनमें हो भरा , कहकर बताते हैं नहीं ।

पड़ती जरूरत जब कभी, करके दिखाते हैं वही।।

बकवास करते वे रहे, संदिग्ध जो होते वही।

जिनका भरोसा हो अटल,शांत रहते हैं वही।।

खाली ही बर्तन है खनकता,शांत है रहता नहीं।

भर जाए जो बर्तन, कभी नाहक खनक करता नहीं।।

नकली चमकते हैं अधिक,असली कभी उतने नहीं।

नकली चमक पर है क्षणिक,असली कभी उतरे नहीं।।

हंडिया बराबर काठ का , है चढ़ा करता नहीं ।

झूठ कैसा भी हो, आगे सच के टिक सकता नहीं।।

जो लोग कम कुछ जानते, समझाये समझ पाते नहीं।

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