नियंत्रण मानव-मन का.

दिलकी बातें कह बतलाना,कठिन बहुत, आसान नहीं।

दुखते रगको झकझोर हिलाना,लेलेगा क्या प्राण नहीं?

पर अक्सर लोग हिला ही देते,उस दुखते से रगको।

लेते हैं आनन्द उसीमें,देकर दर्द अधिक उनको।।

दुखतों को ही और दुखाकर, लेते लोग मजा है ।

इन्हे दुखाये तभी समझते,कितनी कठिन सजा है।।

जो दर्द पराई का समझे,वह दिल का बहुत बड़ा होता।

वह मानव सामान्य नहीं,काफी ऊॅंचे स्तर का होता ।।

काम,क्रोध, मद,लोभ मनुज का,शत्रु बहुत प्रवल होता।

पावन मानव-मन के मगमें,अवरोध बना खड़ा रहता ।।

जो मानव अपने मनको,नियंत्रित कर खुद रखता है ।

उनको सारे अवगुण मिलभी,कुछनहीं बिगाड़ पाता है।

जहां नियंत्रण घट जाता,हावी उसपर सब हो जाता।

उसे नराधम बिना बनाये, चैन नहीं ले पाता ।।

बिना नियंत्रण कुछ भी जगका,शुद्ध नहीं चल सकता।

नियंत्रण तो है परमावश्यक , तभी शुद्ध चल सकता ।।

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