तिनका हूॅ भवसागर का.

सागर की उत्ताल लहर पर,मैं एक छोटा सा तिनका हूॅ।

कभी डूब जाताहूं जलमें,ऊपर कभी निकल आता हूॅ।।

नहीं विसात कोई है मेरा,इस अथाह भवसागर में।

मैंतो उससे लघु दिखताजैसे,गागर दिखता सागर में।।

गोते का प्रयास तो करता,जोर भी कम न देता हूं।

फिर भी उनकी गहराई में, नहीं दूर जा पाता हूॅ।।

उत्पलावन जब मुझे उठाता,मैं उपर आ जाता हूॅ।

प्रयास अनवरत करते करतै, पहुंच दूर तक जाता हूॅ।।

अपने धुन में सदा निरंतर,पिला हुआ ही रहता हूॅ।

कम नहीं हौसला होता मेरा, मैं आगे बढ़ता जाता हूॅ।।

यही हौसला लिये हृदय में, सागर पार लगाऊॅगा।

थाह लगाने में मैं अपना , कोई कसर न लाऊॅगा।।

भवसागर के आनमोल रत्न, निश्चितही पता लगाऊॅगा।

ढ़ूंढ़ निकालूंगा उनको, जन-जन तक पहुंचाऊॅगा ।।

जितनी भी हो गहराई, मैं तलतक पहुंच ही जाऊॅगा।

छिपे गर्भ में क्या इनके,सब स्वयं देखकर आऊॅगा ।।

सागर का तो थाह लगाना,यूॅ है इतना आहान नहीं ।

परमानव क्याकर सकता,यहभी कहना आसान नहीं।।

जग निर्माता चाहे जो हो,मानव को श्रेष्ठ बनाया है।

सब जीवों से अधिक ज्ञान दे,जमकर इसे सजाया है।।

जग-निर्माता की इच्छा को,पूर्ण हमें तो करना होगा।

निर्माण कियाजिस मकसदसे,पूर्ण उसेतो करना होगा।

मैं तो केवल निमित्त मात्र,आदेश का पालन करता हूॅ।

वो करवाता मैं करता,उनकी इच्छा का अनुचर हूॅ।।

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