मत माॅग मदद.

मत माॅग मदद तूॅ कभी किसी से, तुझे मदद देगा ।

भरपूर उड़ायेगा खिल्ली, जमकर उपहास करेगा।।

करता दयाक्षन कोई किसी पर,अपने मतलबमें सभी लिप्त हैं।

बड़ा समझते हो जिसको तुम, नहीं स्वयंभी कभी तृप्त है।।

करो भरोसा खुद अपनेपर,अपने मेधा अपने भुजबल पर।

निहित अगर होंये गुण तुममें,चिपकेंगे खुदही वेआकर।

नहीं कभी कोई देता ज्यादा,कभी किसीभी याचक को।

निसक समझ कर करें कृपा कुछ,भर दे उनके झोलीको।।

सभी रहें पर उनके नीचे,मानव का स्वभाव यही ।

निकल नपायें उनसे आगे,चाहत मानव का सदायही।।

तोड़ सभी दीवरों को गर,निकल पड़ोगे तुम आगे ।

फिर देख जमाना तेरे पीछे, आयेगा भागे भागे।।

यही चलन चलता आया है, युगों-युगों से दुनियाॅ का।

बदले नहीं बदल पायेगा , ये रस्म पुराना दुनियाॅ का ।।

यह मृत्युभुवन है लोगों का, आना है धर्म निभाना है।

अपना विवेक से कर्म सभी,अपने ढ़ंग से निपटाना है।।

कर्म-कूकर्म करते जोभी,उसका फल उनको मिलता।

किमे गये अपने कर्मों का , उत्तरदाई वह खुद बनता।।

मानव बनकर आये हो ,मानव का धर्म निभा दो।

अनुकरण तुम्हारा लोग करे,कुछ ऐसाकर दिखला दो।।

आने-जाने का क्रम सदा से ,चलता ही आया है ।

अमिट नाम पर उनमें से कुछ, का ही रह पाया है।।

कर्म किये कुछ है ऐसा , जिससे विख्यात हुए वह।

दिये जगत को कुछ ऐसा,जग भूल न पायेगा वह।।

हैं।

जीवन ज्योति.

आसमां में तारे रहते , गहरे सागर में मोती ।

डुबकी बड़ी लगानी होती,तब मिल पाता मोती।।

दीपक में भरकर स्नेह और, कच्चे रूई की बाती।

अग्नि से प्रज्वलित कराते , तब मिल पाती ज्योति ।।

जलन कोई सहता जलता है, तब मिल पाती ज्योति।

बिना किसी के जले न जगमें ,रौशन कभी भी होती ।।

बहुत झेलता कष्ट स्वयं तो, परहीत वह है कर पाता ।

स्वयं जूझ कर कष्टों से , काॅटों में राह बना पाता ।।

सदा जानता है जो देना , नहीं कभी वह है लेता ।

सदा बाॅटने में लोगों को , आनन्द बहुत है वह पाता।।

दाता बन आनन्द उठाते, मजा उन्हें काफी मिलता ।

याचक का कर हरदम नीचे , नहीं सदा क्या है रहता??

दाता का स्थान सदा से ,ऊपर ही हरदम रहता ।

याचकता तो बड़े बड़ों को, भी बौना है बनवाता ।।

किया कठिन श्रम,लगन साथ जो,वह उतनाहीहै पाता।

लगनशीलता ब्यर्थ किसी का,कभी नहीं है हो पाता।।

जग में बढ़ना है आगे तो, निष्ठा पूर्वक काम करो ।

कथनी करनी में मेल रहे ,सदा बात का ध्यान धरो।।

निष्ठापूर्वक जो काम किया ,वही आगे है बढ़ पाता ।

करनी -कथनी एक सदा हो,जिसका ध्यान सदादेता ।।

युगों युगों से सदा सदा ही,यही विधा चलता रहता ।

सुकर्म किया जीवन में जो,वही है आगे बढ़ पाता ।।