सारा खेल समय का होता.

समय बीतता जाता, संग में सोंच बदलता जाता ।

साथ समय के अवनी का, हालात बदलता जाता।।

बदलाव नियति का खेल है,यह खेल निरंतर चलता।

कभी न रुकता पलभरभी,चलता जाता,चलता रहता।।

दृश्य भी एक नहीं होता , बदलता हरदम रहता ।

कभी कभी तो अनहोनी , दृश्य नजर भी आता।।

नयी चीज जब आ जाती , भूल पुराने को सब जाते ।

नयी,पुरानी चीज न होती ,यहतो सिर्फ समयकी बातें।।

आज नया जो है दिखता,कल वही पुराना हो जाता।

सिर्फ समय का फेरा है, नया पुराना हो जाता ।।

बदलाव कभी हरलोग चाहते, चाहे उससे दुख पाते।

मेवा-मिष्ठान उपलब्ध जिसे,तीखा,कडवा वेभी खाते।।

बदलाव बने दुख का कारण,लोग तभी भी चख लेते।

भले कष्ट का कारण बनता ,दारुण दुख भी पा सकते।।

बालक सा व्यवहार मनुज तो ,कभी-कभी कर देता ।

गर्म चीज भी खेल समझ कर, अपना हाथ जलाता।।

याद जलनका जबतक रहता,तबतक भूल नहीं करता।

साथ समय के याद न रहता, पुनः उसे दुहरा देता ।।

सचमुच महसूस वही करता ,जिसने दुख को झेला।

हासिल करने में इसको , कितने खतरों से खेला ।।

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