माया-जाल.

अब देख जमाना कैसा आया, धूम मचा रखी माया।

हम पर ,तुम पर और सबों पर,रंग जमायी है माया।।

कभी हॅसाती ,कभी रुलाती,भयभीत कराती है माया।

छद्मवेश में रहती हरदम,सदा फॅसाती है माया ।।

बाजार गर्म है आज इन्हीं का, लोगों पर रंग चढ़ आया।

रूप अनेकों बदल-बदल कर,फाॅस चुकी सबको माया।

दुनियाॅ के हर लोग फॅसे है,माया के ही चक्कर में।

निर्मल दिल बेचैन हुआअब,सदा भिडांने लक्कर में।।

बहुत हुआ कम यहां लोग,मुक्ति इनसे जो ले पाया।

बड़े -बड़ो को इस दुनियाॅ मे,नाच नचाती हैं माया ।।

हवस हुआ है आज लोग में, कैसे प्राप्त करूं माया।

होड लगी है कैसे लूटूं ,पर लूट रही उल्टे माया ।।

लाख छुडाओ पिंड , नहीं पर पींड छोड़ती है माया।

मधुमक्खी सी दौड़ लिपटती,मार्ग रोक लेती माया ।।

कार्य कराती गलत सभी से, पथभ्रष्ट बनाती है माया।

असर किसी पर करती थोडी,अधिक कहींकरती माया

यहतो है माया की नगरी,फंसकर भी दुखी न हो पाया।

डूब रहे होते हैं इसमें,फिरभी वह समझ नहीं पाया।।

लाख सिखाया है संतो ने,लाख उन्होंने समझाया।

नहीं तनिकभी हम मानव ने,उनकी राहों को अपनाया।

उत्थान कहूं या पतन कहूं, मै समझ नहीं इतना पाया।

भौतिकता की हवस यही ,मै भी त्याग नहीं पाया ।।