प्यार करते पर कह जताते नहीं.

प्यार करते बहुत, कह जताते नहीं ।

दिल तो कहता,हलक से निकलता नहीं।।

ऊॅचा उठता लहर , ज्वार सा ले कहर ।

फिर भी दिखता नहीं , चेहरे पर असर ।।

दिल ये गहरा है , सागर की गहराई से भी ।

न पड़ता असर , इसके उपर कभी भी ।।

प्यार लेता है अॅगराई , तन्हा में कभी भी ।

पर परखने न देता , किसी को कभी भी ।।

दिल ये जलता जले , चाहे जितना भले ।

जुबां बिन हिलाये , कभी न हिले ।।

दाब रखना इसे , इतना आसाॅ नहीं ।

रोक लेना भनक भी , तो आसाॅ नहीं ।।

दिल ये कहता कभी ,भेद कह दूॅ उन्हें ।

कसक दिल की अपनी , बता दूॅ उन्हें ।।

पर झिझक कुछ न करने , न देता मुंझे ।

रौक कर वह विवस,किये क्षय देता मुझे ।।

दिल में बातें छिपी , कैसे कह दूॅ तुझे ।

बिन कहे चैन मिलता न सम्भव मुझे।।

चाहे जैसे हो हिम्मत जुटानी पड़ेगी ।

झिझक चाहे जैसे , मिटानी पड़ेगी ।।

मुखौटे बदल लेते.

न जाने लोग क्यो अपने , मुखौटे को बदल लेते।

उतार कर एक मुखौटा को, लगा कोई दूसरा लेते।।

मुखौटे को बदलने में, ये प्रवीण बड़े होते ।

अन्य सब जीव में यह गुण, बहुत ही कम हुए होते।।

डाल कुछ ज्ञान ज्यादा प्रकृति , मानव बनाई है।

निर्देशन स्वयं दे अपना ,इसे सब कुछ बनाई है।।

मुखौटे को बदलने की कला, उसने ही तो डाली।

कचरों से भरा मस्तिष्क ,मानव की बना डाली ।।

मौका देखकर अपना , मुखौटा ही बदल लेता ।

उल्टा काम कुछ करके, उसे फिर से बदल लेता।।

कभी यह चोर बन जाता,कभी शरीफ बन जाता।

शराफत का मुखौटा में ही ,इसका ऐब छिप जाता।।

मुखौटे ही बदल कर ये ,सदा धोखाधड़ी करते ।

किसी के दिल में घुॅस जाते , उसे बर्बाद करलेते।।

किसी को है नहीं बख्सा, मुखौटा बदलने वाले।

यहां था कद्र संतों का , उसे बदनाम कर डाले ।।

मुखौटे ही बदल अपना, ये नकली संत बन जाते ।

असली रूप में अपना, ये जालिम, दुष्ट है होते ।।

समाज का पथ-प्रदर्शक थे,अब शोपक वही बन गये।

हो गये खुद दुराचारी, अधम सब कर्म में लग गये ।।

थी उनकी ख्याति दुनियाॅ में , उन्हें भी यह नहीं छोड़ा।

उनकी स्वच्छ छवि पर भी ,गन्दगी फेंक कर छोड़ा ।।

मुखौटे को समझ पाना, न बस की बात है सब में ।

संतो के प्रति दुर्भावना , है भर ‌दिया सब में ।।

किसी को भी नहीं बख्सा , मुखौटा बदलने वाले।

यहाॅ था कद्र संतों का , उसे बदनाम कर डाले ।।

आॅखें सबों को दो दिया.

जिसने किया निर्माण दुनियाॅ, आॅखें सबों को दो दिया।

रखे नजर हरलोग पर,जरूरत समझ हर को दिया ।।

देखना और समझ पाना, दोनों अलग ही बात है।

गहराई उनकी जान पाना, उससे भी गहरी बात है।।

जो आॅखें हमारी देखती ,वह वाह्य को ही देख पाती।

अन्दर छिपी जो चीज है,उसको कहाॅ है नजर आती।।

अंतर्दृष्टि की हो शक्ति जिनमें,उन्हें गूढ़ भी आती नजर।

रहती सदा जागृत हो, उसको सभी आती नजर ।।

जीवन दिया है जो हमें , कुछ साथ भी उसने दिया ।

पर काम हम लेते न उनसे, निष्कृय ही कर लिया ।।

ंनेत्र तृतीय जो पड़े , हो अक्रिय सब लोग में ।

अपार शक्ति पूंज है वह , जो जाग सकता लोग में।।

ज्ञान का भंडार दे कर, प्रकृति मानव बनाई।

खोज सकते हैं वहीं से , गर जरूरत पड़ गयी ।।

ज्ञान का भंडार से , अज्ञानता का अंत इसमें।

हो जो जरूरत खोज सकते,मिलजायेगेंसबकुछ ही इसमें।

यह अनोखी चीज है, बर्बाद मत करदे इसे ।

घुॅसने न इसमें गन्दगी दें, स्वच्छ रखना है इसे ।।

आत्मा का वास इसमें ,निर्मल सदा वह स्वयं होता ।

गर गन्दगी घुंसने नहीं दें,तो स्वच्छता भी कम नपाता।।

धन्य तूॅ है प्रकृति , क्या चीज है तूॅने बनाई ।

जिसकी जरूरत है उसे, सब चीज ही तूॅने बनाई।।

बर्बादियों से हम बचा लें, पर्यावरण गर शुद्ध हो।

फिर चैंन की बंशी बजे , हर ब्याधियों से दूर हो ।।

घृणा और प्रेम.

घृणा ,प्रेम तो साथी दोनों ,अलग भी कभी नहीं रहते।

हर दिल में दोनों वासहै करते,जुदा वे कभी नहीं होते।।

जिनके दिल में घृणा नहीं हो, ऐसे लोग नहीं होते।

होते भी होंगे ऐसे तो ,गिनती में काफी कम होते।।

जिनके दिल में आधिक्य हो जिनका,प्रभाव वही है दिखलाता।

बना बेचारा दूजा बैठा, चुपचाप वही नजर आता।।

घृणा उग्रता पैदा करती, प्रेम सुधा है बरसाता ।

असर जिसका जिसपर जब होता,वही प्रभावहै दिखलाता।।

प्रवृत्तियाॅ दोनों ही अपनी,अलग अलग हुआ करती।

होते विपरीत एक दूजे का,कभी भी मेल नहीं खाती।।

जैसे दो विपरीत धुर्व मिल,एक चुम्बक पूर्ण बना देते।

दोनों ही रहते एक साथ ,प्रभाव अलग दोनों रखते।।

ईच्छायें दिल पैदा करता, उसका तो काम वही है।

मस्तिष्क उसका मंथनकरता,जिसकानिर्णय अंतिम है।

घृणा शत्रुता पैदा करती , प्रेम तो मित्र बनाता है।

एक गरल पैदा करता,तो एक सुधा बरसाता है।।

यह घृणा मनुज का शत्रु होती,विवेक खत्म करदेती है।

उल्टा-पुल्टा काम करा, बदनाम उसे कर देती है ।।

प्रेम बड़ा अनमोल विधा है,असंभव को संभव करदेता।

डूब रहे नैया को भी , जा कर उबार उसे कर देता ।।

प्रेम ही पूजा है दुनियाॅ में, अन्य न कोई इसके पूजा।

जिसके दिल में प्रेम सुधा हो, क्या उसे बिगाड़े दूजा।।

बदल गया कितना विहार.

बदल गया कितना विहार, अपनी आॅखों से देख लो।

कितना विकास कर रहा सुनोमत,स्वयं नजरसे देखलो।

एक आदमी क्या करसकता,स्वयं देखकर करो विचार।

महसूस करो,क्या सोंचा थाकोई,बदलेगा इतना विहार।

और बदलना है कुछ बाकी, धीरे-धीरे सब बदल रहा।

जोजकड़ गयाथा रोग पुराना,लेस्वास्थ्य लाभमें वक्तरहा

पा लेगा सम्मान पुनः यह,जो कालचक्र में लुप्त हुआ ।

गौरव प्राप्त करेगा खोया,फिरसे विहारका उदय हुआ।।

पा लेगा सम्मान पुनः यह,जो कालचक्र में लुप्त हुआ।

गौरव प्राप्त करेगा खोया,फिरसे विहारका उदय हुआ।।

मेधाबल की कमी नहीं थी,माहौल सुनहरा देना था।

सोयोंको पुनः जगा जगाकर,नया विहान फिर लानाथा।

अग्रणी रहा है सदा बिहारी,फिरसे आगे बढ़ जायेगा।

कररहे कदम डगमग थेमेरे,लेठोस कदम बढ़ जायेगा।।

बुद्ध दिया,गुरुगोबिंद दिया,सम्राटअशोक हमनेही दिया

समस्त विश्व में वैशालीने, गणतंत्र का पैगाम दिया ।।

पुनः उभर कर एक विहारी,आया उस धरती के ऊपर।

बढ़ा रहा आगे विहार को, बड़े प्रेमसे इसे निरंतर।।

झेल रहे आॅधी तुफान,पर कदम हमारे बढ़ते जाते।

उदय लिया है एक सूर्य, अब अंधकार छंटते जाते।।

दूर करेगा सूर्य यही बन,एकदिन भारत की अंधियाली।

गणतंत्र के ही जैसा फिर , विश्व बनेगा अनुयायी ।।

जा बढ़ते अपनी राहों पर ,पुरा बिहारी साथ तेरे है।

जनता के दिल में तुमहो,तूंने विकासका काम किया है।

पेड़ अति जरूरी है.

अहमियत दीजिए हरलोग का,अवश्य देना चाहिए।

महत्व सबका है अलग, बातें समझ लेनी चाहिए।।

किस चीज की पड़ जाये जरूरत,कौन जानता?

कब आ पड़े कोई जरूरतमंद,है किसी को क्या पता??

किस पौधे में छिपा है क्या गुण,जो जानते सो जानते।

हो सकता जीवनरक्षक वो, जानते सो मानते ।।

हमें ज्ञान नहीं ,समझ न पाते, गुण कितने छिपे पड़े हैं।

यह प्रकृति का अनमोल खजाना, में क्या भरे हुए हैं।।

प्रकृति-प्रदत्त उपहार को, हम ब्यर्थ बर्वाद किये देते।

यह रत्न बड़ा अनमोल है,भले पहचान नहीं पाते ।

निकल आये ऐसा पोधा, जो संजीवनी बन जाये।

जिनके प्राण हो उड़ने को,जीवन उनका बन जाये।।

कहीं अनजान पौधे को, हम बर्बाद ही न कर दें ।

अज्ञानताबस काट उसे , ईंधन ही न कर दें ।।

फिर तो कोई बेहोश लक्ष्मण, कैसे बच पायेंगे ?

हनुमान चाहकर भी फिर उसे, कैसे ला पायेंगे ??

पडी थी सामने संजीवनी, हमने तो उसे जला दी ।

जंगलों से काट ब्यर्थ,कितनी जिंदगी गंवा दी ।।

प्रकृति का अनमोल रत्न,हम बर्बाद करते जा रहे।

अपने ही हाथों अपनी , मृत्यु को बुलाते जा रहे ।।

रोकना कोई चाहता , तो हम उसे शत्रु समझ लेते।

अपने ही परम रक्षक को, हम भक्षक समझ लेते।।

उनमें छिपे गुणों को ,हम समझ ही कहाॅ पाते ?

खर-पतवार समझ हवाले ,अग्नि को करवा देते ।।

हमें हर रोज,बिन मांगे, जो देता प्राणवायु है ।

बिना बताये ही हर जीव का, बढाता जो आयु है।।

हम बेरहम, हो बे झिझक, उसे खत्म कर देते ।

अपने प्राणवायु श्रोत को, खुद ही नष्ट कर देते ।।

सम्हलिये , सोंचिये वरना , सब को तय है मर जाना।

बिन प्राणवायु जिन्दगी को ,सम्भव है बच पाना ??

यह तो कोरोना से भी भयानक ,रोग फैला जा रहा।

धरती पर से जीवों का,निशां भी मिटता जा रहा ।।

जब तलक पौधे रहेगें ,हर जीव भी रह पायेगा ।

अगर ये सब खत्म होगें, न कोई जीव भी बच पायेंगा।।

विवेक से निपटिये.

किनको गले लगा लूॅ ,किससे करूॅ किनारा ।

कब कौन घात कर दे ,दे कौन कब सहारा ।।

बातें न साफ दिखती , मुश्किल नजर है आती।

नीतय का क्या भरोसा, पल-पल जो रंग बदलती।।

है बेवफा ये दुनियाॅ , भरी बेवफायी बातें ।

हैं लोग कम बहुत ही ,जो दिल से करते बातें।।

कूचक्र रहता दिल में, मीठी है करते बातें ।

बातों से मित्र दिखते , भीतर में खुराफातें ।।

मुश्किल उन्हें समझना ,दिल में गरल है रहते ।

बोतल तो एक रहता ,जिसे सब सुधा समझते।।

भ्रम एक ही न होते , भ्रमित है सारी दुनियाॅ ।

भ्रम है कहाॅ न होते , भ्रम से भरी है दुनियाॅ ।।

भ्रम से रहित जो होते , ऊपर मनुज से होते ।

उनको यथार्थ दिखता , सब भेद खुलते जाते।।

आते नजर न हरदम ,ओझल सबोंसे रहते ।

होते करीब हरदम, सबपर नजर हैं रखते ।।

दिल से अगर पुकारें, कुछ ही पलों में आते।

बिगड़ी को आ बनाते , नजरों में खुद न आते ।।

दिल हो भरा छलों से , छिपाये भी छिप न पाते ।

प्रयास लाख कर लें , उजागर कभी तो होते ।।

बच उन सबों से रहना ,अपना विवेक से तुम ।

उन सारे मुश्किलों पर , पा जाओगे विजय तुम।‌।

अपना विवेक से ही , अब सोंचना तुम्हें है ।

परेशानियों जो आये , अब जूझना तुम्हे है।।

किये गये कर्म का भुगतान तय है.

नीयत आजकल इन्सान की,अक्सर बिगड़ जाती।

उनपर लोभ , लालच,मोह का, चश्मा जो चढ़ जाती।।

ये सारी विकृतियां इन्सान को, शैतान कर देती ।

जिनका यश चमकना चाहिए, उसे मलीन कर देती।।

जो होता ऑख का तारा, वही बन किरकिरी जाती।

बनी अट्टालियें यशों की, ध्वस्त हो जाती ।।

परिदृश्य ही सारा वहाॅ का, है बदल जाता ।

सम्मान का था रूप जो, घृणा का पात्र बन जाता।।

सम्मान पा लेना किसी से, आसान तो होता नहीं।

ब्यवहार से अपना बनाना,गलत तो होता नहीं ।।

सम्मान पाने के लिए, सम्मान देना चाहिए ।

किसीको भूलकर हरगिज नहीं,अपमान करना चाहिए।

प्यार से काम जो बनता , कभी अपमान से होता नहीं।

यूॅ अपमान करना किसी को,शोभा कभी देता नहीं।।

सम्मान बस शंभु कभी, विषपान तक भी कर गये।

धारण गले में कर उसे, जनहित बड़े वे कर गये ।।

दुनियाॅ रहेगी जब तलक ,याद सब करते रहेंगे ।

श्रद्धा सुमन उनपर सदा ,अर्पित किया करते रहेंगे।।

हैवानियत, इन्सानियत पर, जुर्म ढाते ही रहे हैं।

पर समय का चक्रमें, मार खाते ही रहे हैं ।।

हैवानियत के सामने, घुटने टेकना अच्छा नहीं ।

मसीहा कोई आता सजा देता , छोड़ तो देता नहीं।।

प्रकृति देर तो करती कभी , पर छोड़ तो देती नहीं।

कियेगये कर्मका भुगतानबिन ,रहकभी सकतीनहीं।।

ज्ञानी मचाते शोर नहीं .

चाहता विध्वंश वही , जो निर्माण कर पाता नहीं।

आसान है विध्वस करना, निर्माण पर आसाॅं नहीं।।

जिसने बनाई सृष्टि सारी , उसको समझ पाया नहीं।

क्या बनाया,क्यो बनाया , भेजे में घुंस पाया नहीं ।।

देखा नहीं जिसको अभीतक,तेरी सोंचमें जो गया नहीं।

अज्ञानता की दौड़ में, भटके पड़े होंगे कहीं ।।

ज्ञान जिनमें हो भरा , कहकर बताते हैं नहीं ।

पड़ती जरूरत जब कभी, करके दिखाते हैं नहीं।।

बकवास तो करते किया, संदिग्ध जो होते वही।

जिनका भरोसा हो अटल,शांत रहते हैं वहीं ।।

खाली ही वर्तन है खनकता ,शांत वह रहता नहीं।

कथन बिलकुल सत्य लगता,असत्य तो यहहै नहीं।।

नकली चमकते हैं अधिक,असली कभी उतनी नहीं।

नकली चमकती कुछ दिनों,असली चमक जाती नहीं।।

हाॅडी बराबर काठ की , तो चढ़ा करती नहीं ।

बस लोग कहते एक बार, बार-बार कभी नहीं।।

जो लोग कम कुछ जानते, समझाये समझ पाते नहीं।

समझाना उन्हें मुश्किल अति,सुनाये सुन पाते नहीं।।

समझायें ब्रह्मा स्वयं ही , पर खल समझ पाता नहीं ।

स्वयं ही थक जायें वे ,खल पर असर होता नहीं ।।

सर लाख अपना फोड़ ले ,पाषां द्रवित होता नहीं ।

दें झोंक भटठी में उन्हें , तुरत द्रवित होता नहीं ।।