ज्ञानी मचाते शोर नहीं .

चाहता विध्वंश वही , जो निर्माण कर पाता नहीं।

आसान है विध्वस करना, निर्माण पर आसाॅं नहीं।।

जिसने बनाई सृष्टि सारी , उसको समझ पाया नहीं।

क्या बनाया,क्यो बनाया , भेजे में घुंस पाया नहीं ।।

देखा नहीं जिसको अभीतक,तेरी सोंचमें जो गया नहीं।

अज्ञानता की दौड़ में, भटके पड़े होंगे कहीं ।।

ज्ञान जिनमें हो भरा , कहकर बताते हैं नहीं ।

पड़ती जरूरत जब कभी, करके दिखाते हैं नहीं।।

बकवास तो करते किया, संदिग्ध जो होते वही।

जिनका भरोसा हो अटल,शांत रहते हैं वहीं ।।

खाली ही वर्तन है खनकता ,शांत वह रहता नहीं।

कथन बिलकुल सत्य लगता,असत्य तो यहहै नहीं।।

नकली चमकते हैं अधिक,असली कभी उतनी नहीं।

नकली चमकती कुछ दिनों,असली चमक जाती नहीं।।

हाॅडी बराबर काठ की , तो चढ़ा करती नहीं ।

बस लोग कहते एक बार, बार-बार कभी नहीं।।

जो लोग कम कुछ जानते, समझाये समझ पाते नहीं।

समझाना उन्हें मुश्किल अति,सुनाये सुन पाते नहीं।।

समझायें ब्रह्मा स्वयं ही , पर खल समझ पाता नहीं ।

स्वयं ही थक जायें वे ,खल पर असर होता नहीं ।।

सर लाख अपना फोड़ ले ,पाषां द्रवित होता नहीं ।

दें झोंक भटठी में उन्हें , तुरत द्रवित होता नहीं ।।