प्रकृति स्वयं सब करती.

कभी विरानों में भी ,कुछ फूल निकल आते ही ।

वगैर मिट्टी के, चट्टानों पर, पौधे भी निकल आतेही।।

प्रकृति चाहती जिसको, सजाना जहाॅ,सज वहीं जाता।

असंभव जो दिखे सबको,संभव हो वही जाता ।।

पठाना चाहता जहाॅ जिसे , जाना ही पड़ता है।

जाना पड़ता नहीं केवल , पहुंचा दिया जाता है ।।

सारी ब्यवस्था प्रकृति ,खुद ही किया करती ।

कामतो अनगिनत रहते उन्हें,वाखूबी पर किया करती।

सारे सचर-अचर जगती का, संचालन यही करती।

अपना काम करती स्वयं,भरोसे पर नहीं रहती ।।

करते ब्यवधान जो पैदा ,उनके पावन कर्मो में।

उसे वह ध्यान में रखती , सूचीबद्ध कर ख्यालों में।।

अति पर जब कभी होता ,हल उसका भी कर देती।

निदान बिगड़े हुए कामों का ,क्षणभर में कर देती ।।

पर हम मानव बातों को उनकी,समझ नहीं पाते ।

हर कामों में उनके , ब्यवधान पूर्ण किये देते ।।

पर अपनी नासमझी से, नुकसान स्वयं का कर लेते।

हम बड़े मूढ़ताबस बातों को,समझ कहां भी पाते ??

जो जंगल जीवन देता , हम काट खत्म करते रहते ।

खुद अपने टांगों पर हम, टाॅगा स्वयं चलाते रहते ।।

जो नदियाॅ जल-जीवन देती,गंदा हम खुद ही करते।

उन्हें विषाक्त कर देने में, तनिक भी रहम नहीं करते।।,

चाहत.

कोई चाहत बहुत दर्द , देती हैं दिल को ।

हॅसाती है थोड़ी ,रूलाती भी दिल को ।।

सारी चाहत तो पूरी , न होती किसी का ।

चाहे नृप या साधारण , हो व्यक्ति कहीं का।।

अस्त साम्राज्य में , जिनका सूरज न होता ।

उनके सामर्थ्य का भान , किनको न होता ??

जिनके सुन नाम सब ,अपने सिर को झुकाते ।

उनके आदेश सुनने को , आतुर से रहते ।।

ऐसे सम्राटों को भी , सहन करनी पड़ती ।

कारणवस न कोई , चाहत पूर्ण होती ।।

दंश चाहत का सबको , सहना ही है पड़ता।

कोई चाहत बिना तो , रह ही न सकता ।।

अपनी चाहत पर कब्जा , जो खुद कर है लेता ।

नाम संतों की श्रेणी में , अव्वल उनका होता ।।

पर यह आसान उतना , नहीं जितना दिखता ।

बहत कम ‘खडा़’ लोग , इस पर उतरता ।।

वैसे अच्छों की संख्या , तो होती ही बहुत कम ।

बात यह तो सनातन , इनमें काफी है दम ।।

मानव सब जानकर भी , नहीं त्याग पाता ।

भूत चाहत का दिल से , निकल ही न पाता ।।

कर के प्रयास उसका ,सफल हो जो जाते ।

वह तो मानव से उठ कर , महा सन्त बनते ।।

दिल की चाहत ही मानव को , सब कुछ बनाती।

जैसा दिल में बिठाता , वैसा ही बनाती ।।

चाईना.

कहते ‘ले डूबता है एक पापी’, नाव को मझधार में।

चाईना का नाम भी कुछ, इस तरह संसार में ।।

जा रहा यह भी डुबोये , अनेकों देश को संसार के।

देश कहना कम पड़ेगा , संसार के महादेश के ।।

हुआ नहीं निकृष्ट ऐसा ,आज तक संसार में ।

सारी हदें जो पार कर दे ,लिखा ही नहीं इतिहास में।।

भक्ष कर कीड़े-मकोड़े , भ्रष्ट बुद्धि कर लिया खुद।

नीचता की हदें सारी , पार कर पहुॅचा यहाॅ खुद।।

अपने देश का भी नागरिक को, मार देना चाहता ।

अपने लोगको हत्या कराकर, संख्या घटाना चाहता।।

शासक नहीं ,शोषक है ये, मानवता का प्रवल शत्रु।

हदें सारी नीचता की , कर चुके हैं पार शत्रु।।

इस नीच ,पामर ,धूर्त से, सावधान खुद ही रहें।

करोनाजनक करोना सा शत्रु ,को कुचल ही दम धरें।।

यह शत्रु है घातक बहुत, विश्वास के काबिल नहीं।

घात कर दे कब किसीपर , कह कोई सकता नहीं।।

मित्र बनकर घात करना ,यह पुराना काम इनका ।

कर दोस्ती जो चोट खाई ,गयी नहीं है दर्द तब का।।

हिसाब चुकता है कराना, सन् बासट से बाकी आ रहा।

व्याज के है साथ लेना , जो दर्द तब से दे रहा।।

ताजा पड़ा है स्मरण में, भूल कैसे जाऊॅ मैं ।

हडपी गयी जमीं हमारा ,वापस उसे करवाऊॅ मैं।।

सावन की घटा.

सावन की घटा जब आती है, मस्ती लेकर आती है।

उनकी छटा अवनी पर, बन हरियाली छा जाती है।।

सूखे प्यासे अवनी पर ,बादल बन जल आता है।

धरती के सूखे होंठों को,तर कर प्यास मिटाता है ।।

मोर नाचने लगता वन का , मनमोर नाचता मन का ।

सावनकी कालि देखघटायें,खिलता मुखड़ा जनजन का

एहसास धरा के जीवों को,राहत गर्मी से देता ।

झुलसते जीव-जंतु,प्राणि पर, नव यौवन भर देता ।।

सूख रहे पेड़ों पौधों पर, फिर से हरियाली छा जाती।

बेहोश पड़े से जीवों में,खुशियाॅ ही खुशियाॅ भर जाती।।

दृश्य धरा का मनमोहक, हरा,भरा,प्यारा लगता ।

नीले ,काले , घन आसमान में, आता जाता ही रहता।।

धूप-छाॅव की आॅख मिचौनी,हरदम खेल कराता रहता।

कभी सूर्य को ढ़क देता,कभी दूर भाग खड़ा रहता।।

रात भयावह हो जाती, तम छा जाता घनघोर ।

उरगण डर खुद छिप जाते , पता नहीं किसओर।।

बिजली जब कभी कड़कती है, नभ गर्जन करता है।

मानों झुड गजराजों का, चिघ्घार किया करता है

झुंड मतवाला कुंजर सा , वन में जब दौड़ लगाता ।

पेड़ों पौधों को रौंद-रौंद कुछ, ध्वस्त किये देता ।।

नाले, नदियाॅ,ताल -तिलैया, जल प्लावित हो जाते।

कृषक खेत में सस्य लगा, कितना हर्षित हो जाते ।।

भयभीत नहीं बादल का गर्जन,या उल्कापात करापाते।

बेफिक्र बड़े होते हैं ये , चाहें गर नहीं डरा पाते ।।

ज्ञानी-जन भयभीत न होते.

रहता पता कहाॅ किसी को,क्या अगला पल होने वाला।

सब के सब अनभिज्ञ यहां, कोई कहाॅ बताने वाला ??

कौन आयेगा ,कब आयेगा, नहीं जानता कोई ।

नहीं यहाॅ अवगत है रहता ,इन बातों से कोई ।।

अगर ज्ञात होगा किन्हीं को ,होयें वैसा कोई ।

उन्हें खोजें,शायद मिल पायें, ऐसे दुर्लभ हों कोई।।

पर है इतना तो ज्ञात सबों को, जायेगा सब कोई।

चाहे करले लाख यतन, पर रुका कहाॅ है कोई??

कितने आये वैद्य विशारद,गुण थोड़ा दिखलाये ।

नहीं आजतक कोई आया,आकर जो कभी न जाये।।

नहीं कोई है जगमें ऐसा , गूढ़ समझ जो पाये ।

देख ,किसी के जीवन का,त्रिकाल उसे समझाये ।।

मिलते तो वैसे ज्ञानी पर ,कभी कभी दिख पाते ।

सौभाग्यवस संयोग से , अवतारित धरा पर होते ।।

जाना तो जाना है सबको ,कब जाना भी तय है।

रोक नहीं सकता कोई भी,फिर क्यों जाने का भय है।।

ज्ञानीजन जो बात समझते, मृत्यु से भयभीत न होते।

आभाष उन्हें है हो जाता, खुद ही तैयारी कर लेते ।।

भय उनको नहीं सता पाते,कोई पथसे नहीं डिगा पाते।

कभी नहीं डरतेहैं किसीसे,हॅस मौतको गले लगा लेते।।

इन्सानियत ही लुप्त होती जा रही.

लगता नहीं क्या दुनियाॅ की,परिदृश्य बदलती जा रही?

इन्सान की इन्सानियत ही, लुप्त होती जा रही ??

विकास हरगिज कह न सकते,ह्रास होता जा रहा ।

मनोभावना ही अब मनुज का ,नित्य गिरता जा रहा।।

समय का प्रभाव समझें , या असर आहार का ।

सत्य पर रहना कठिन, पतन नैतिकता का होरहा।।

हर आदमी बिश्वस्थ था , स्वयं अपने आप में ।

काबिल भरोसे के सदा , प्रपंच करने से रहा ।।

अब बदलते सब गये ,कदम मिलाये वक्त से ।

बदलते बदल इतना गये ,कि मूल ही अब न रहा।।

यथार्थ से गये दूर होते , प्रकृति को त्यागते गये ।

कृत्रिमता हर लोग को , लेकर घसीटे जा रहा ।।

मतलबी इन्सान होता , मतलब से मैत्री गाॅठता।

साधकर मतलब तो फिर , पहचान से कतरा रहा ।।

शर्म हया सब खत्म हो गये ,लेहाज भी बचे नहीं।

मतलब सधाने के लिए, कूकृत्य नंगा हो रहा ।।

लोभ लालच बढ़ गया, इस श्रेष्ठ मानव जीव में।

श्रेष्ठता का गुण सभी , अब खत्म होता जा रहा।।

सत्य-पथ को छोड़ कर , मिथ्याचार अब अपना लिया।

लेकर सहारा झूठ का ही,अब काम सारा हो रहा ।।

सत्य-पथ का पथिक अब, बच ही रहे थोड़े बहुत।

जो बचे ,उसपर हथौड़ा , अत्याचारियों का पर रहा ।।

सत्य-पथ का रास्ता , जाने बनाया क्यों विधाता ।

सत्य-पथगामी ‘बेचारा,’ बन यहां पर रह गया ।।

तुम सा कोई और नहीं होगा.

कंचन सी काया गौर वर्ण, आभा उसपर छाया होगा।

कोईआसमान से देखा होगा,क्या मनमें आया होगा??

जन्नतकी हूरों से भी ज्यादा,तुझे आभासित पायाहोगा।

उथल पुथल दिलमें उसके,कितना हरहोर मचाया होगा

सागर की उत्ताल लहर सा,दिल में ज्वार उठा होगा।

रोके भी ,रुक सकान होगा,फिर कैसे उसे दबाया होगा।

जब कोई मसीहा जन्नत वाले,झाॅक धरापर देखा होगा।

जब तुमपर नजर पड़ीहोगी,मलहाथ बेचारा रहता होगा

धरतीवालों का नाज तुम्हींपर,महसूस गर्व करता होगा।

धरा नहीं है कम जन्नत से,मनमें सोंच उपजता होगा।।

तूॅ लाजवाब,जवाब नतेरा,तुम सा कोई और नहीं होगा।

हो बेमिसाल तूॅ,मिसालन तेरा,जगमें को़ई औरनहीं होगा।

तुम मात्र अकेला, जोड़ नकोई इस जग में तेरा होगा।

तुम्हीं अनोखा जग में सबसे,तुलना तेरी किससे होगा।।