संविधान को समर्पित.

निर्माताओं को नमन मेरा,जो संविधान गढा अपना।

गैर देश के संविधान से,चयन भी पुष्प लिया अपना ।।

कुछ देशों के संविधान से, बातें अच्छी ग्रहण किया।

ग्रहण उसके सुन्दर चीजें भी,ले अपना निर्माण किया।।

याद करो रायायण को,संवरी ने जो करतब दिखलाई।

पुष्प और बेरों की चयण में, पूर्ण सतर्कता दिखलाई।।

कितनी लगन लगाई होगी,तब पथ वह तैयार हुआ।

ईष्टदेव आए उसपथ से,सफल उनका अभियान हुआ।।

धन्य है बाबा भीमराव,,और उनके सारे सहयगी ।

कितना सुन्दर निर्माण तुम्हारा,नहीं तेराकोई प्रतियोगी।

तेरे निर्दिष्ट पथपर चल कर,अपना भारत देश बढ़ेगा।

पर संसदके विद्व सदस्यगण,कौन कहांतक इसे सुनेगा।

यूॅ संसद को दायित्व मिला था,पालन करवाने का।

उनकी रक्षाहेतू ही कोई, गर हो सुझाव तो देनेका।।

खड़ा कितना उतरा है पथपर,स्वयं सोंचकर देखें।

दूरदर्शन अब सब दिखलाता,देखें,समझें,सोंचें ।।

श्रद्धा खत्म होता जाता, उनके करते कृत्यों से ।

चयन जिन्हें हम करके भेजा,देख वहाॅके दृश्योंसे।।

जबकभी स्वर्गसे सुनते होंगे,निर्माता इन कारनामों को।

कर तोड़-फोड़ बदल हीडाला,उनके निर्मित धाराओंको

संविधान बेचारा रोताहोगा,उनकी हरकतको देखकर।

जो बैठे हैं संसद में, उनके करतूतों को सुनकर ।।

जिन्हें बना हम रक्षक भेजा,वे ही भक्षक बन गये।

कुछ तो भूल हमारी भी है,हमभी नैतिकता खो गये।।

जबकभी शीर्षपर बैठा व्यक्ति,अपनी नैतिकता ही खोदे

खुद सोंचें भारत माता,कैसे न खुद ही रो दे ।।

फिर से करता हूॅ नमन तुझे,ऐ भीमराव अम्बेडकर जी।

बनाया तो तुमने था सुन्दर,करदिये हेर-फेर नेता जी ।।

नहीं दूर का समझ जिन्हें, पर पावर वही दिखाते।

मन में बैठा चोर है उनका,उल्टा उनसे करवा लेते ।।