नालंदा का खण्डहर.

बना खंण्डहर अड़ा खड़ा है,नालंदा का पुरां धरोहर।

गर्वसे सीना चौड़ा होता,गौरवकी उनकी बातें सुनकर।।

ज्ञानपुंज का महाधरोहर, रौशन सारा जग इससे था ।

ज्ञान पिपासु विश्व से आते,तृप्त सबोंको यह करता था।

पुरे विश्व का गौरव तबका,आज खंडहर बना पड़ा है।

एकबार नहीं,कईबार दुश्मनों,ने इसका विध्वंस कियाहै

सुनते हैं कई महीनों तक, पावन पुस्तक जलते रहगये।

मानवता का वह प्रवल शत्रु,उसे खाक बनाते रहगये ।।

खुदा दंड देता है गर तो, दंडित उसे किया होगा ।

कमीना बख्तियार खिलजी को,सजाअवश्य दियाहोगा।

अवशेष बचेजो याद दिलाते,उनके कूकर्म कीबातों को।

उस विद्याके पावन मंदिर में,उनकी की आघातों को।।

जहां सम्प्रदाय कीबात नहीं,सबको ज्ञानदिया जाताथा।

हिन्दू,मुस्लिम,देश विदेश का,भेदभावभी तनिकन था

अत्याचारीका कोई धर्म न होता,बस अत्याचार हीआता

जहां देखता मौका जैसा,वैसा ही काम वहां करता ।।

जोसबको ज्ञान दिया करता था,वगैर कोई विभेद किये।

देश विदेश के सभी देशसे,आये आकर ज्ञान लिये ।।

हम आज विदेश में पढ़ने जाते,पहले वहां से आते थे।

जो आज उपाधी देता हमको,उसे कभी उपाधी देतेथे।।

जिसके कण-कणमें,बसा आजभी,तबके गुणकी आभा

ज्ञानवान पैदा होते हैं,ले तीव्र बुद्धि और प्रतिभा ।।

पुनः सम्हल बन जायेगा, पालेगा फिर खोई की्र्ति

हमें दमन कर डाला था, पुनः मिलेगी खोई कीर्ति।।

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