निर्मल मन ले आये जग में.

दोष तेरे दिल में है प्यारों, दोष भरा दिल तेरा है।

नजरें डालो स्वयं स्वयं पर,चले पता क्या फेरा है।।

निर्मल मन,आता ले जग में,कचरों का नहीं बसेरा है।

निर्मल मन पर सदा गंदगी,डाल रही खुद ड़ेरा है।।

नित्य गंदगी का रज उनको, करती रहती है गंदा ।

निर्मल,कोमल,मन पर अपना,फैलाता है फंदा ।।

लगी विकृति असर डालने, अपने अवगुण का उनपर।

असर गंदगी करने लग गयी,उनके निर्मल मन पर।।

प्रभाव गन्दगी की होती, निर्मल मानव मन गंदा होता।

स्नेह भरा कोमल दिल पर,परत गन्दगी का पर जाता।।

फिर मानव वहीअमानव बनता,साराअवगुण भरजाता

बसरूप बचा मानवका रहता,पशुओंसे बदतर होजाता

ब्यर्थ बिधाता का हो जाता,सब देकर जिसे बनाया।

सब जीवों से अधिक ज्ञान दे,धरा पर जिसे पठाया।।

श्रेष्ठ बना जिसको भेजा था,भटक गया खुद राहोंसे।

जिन राहों से था चलना,भटक गया चौराहों पे ।।

कहां उन्हें जाना था पर,अन्यत्र कहीं वे चले गये।

मकसद क्या था जानें का,मकसद से भी भटक गये।।

दिशाहीन नाविक सागर में, कहीं भटक गर जाये ।

लक्ष्यहीन चलते चलते, सागर सै निकल न पाये ।।

उसे किनारा मिल जायेगा, कठिन बहुत है कहना।

रह भी सकता सदा भटकते, मुश्किल दावे से कहना।।

दोष खोजकर अपने दिल से ,उसे भगा गर सकते।

जो मानवता आये थे लेकर,साथ निर्वहन करते ।।