संयम स्वयं पर रखें.

अच्छे दिनों में मित्र का ,भरमार हो जाता ।

जिनका दरश तक था नहीं ,अब यार हो जाता ।।

देखते आप चाहें जिस तरफ ,जो मिलने आपसे आते।

परम हितैषी आप के , बतलाते नहीं थकते ।।

है कौन अपना आपका , पराया कौन आप का ।

यह जानना आसान नहीं , कठिन यह काम आपका।।

पहचान कर मन में धरें , कह व्यक्त न कर दें ।

दिल मे आपकी जो भावना, वही संयोग कर रखदें।।

अपनी जिंदगी की गूढ़ को , बस गूढ़ रहने दीजिए।

भूलवस इसको कभी मत , सार्वजनिक कर दीजिए।।

जानकर आप की कमजोरियां, लेने लाभ हैं लगते।

कुछ फायदा नाजायज , लेने में है लग जाते ।।

आजकल ब्लैकमेलिंग को ,नया धंधा बना देता ।

दिखाकर आपकी कमजोरियां , आपसे ऐंठने लगता।।

परम जो मित्र होते आज का, कब शत्रु बन जाये।

जड़ खोदने वालों का परम ,सहयोगी बन जाये ??

घर की भेदिया से कोई बड़ा , ना शत्रु है होता ।

जिनके घर में घुंस जाता , सत्यानाश कर देता ।।

ये आस्तीन का सांप तो ,हैं हर जगह मिलते ।

आपके साथ ही रहते सदा , पर दिख नहीं पाते।।

इन शत्रुओं का आक्रमण, बेजोर है होता ।

कब डंस लिया आभाष तक , होने नहीं देता ।।

जो संयम स्वयं पर रखते,सफलता भी वही पाते।

पाते कामयाबी वे , वही कुछ दिखा देते ।।

अब भी संभल जा चीन

अब चांद जा कहीं सो गया, दिन-रात चलता थक गया।

जाने कहाँ गयी चांदनी , घनघोर अंधेरा छा गया ।।

आती नजर में कुछ नहीं ,सर्वत्र तम का राज है ।

सद्भावना तो लुप्त हुई, दुर्भावना बस व्याप्त है ।।

निशाचरों का दौर मानो , अब धरा पर आ गया ।

भूत औ बैताल का ,आधिपत्य जग पर छा गया।।

कीड़े-मकोड़े भक्ष करके, जानवर ही बन गया ।

उपहार कोरोना का दे, सारे जग में मातम छा दिया ।।

आहार का प्रभाव मन पर ,क्या है पड़ता, देख लो ।

इंसान ही इंसान के, पीछे पड़ा है, देख लो।।

इंसान तो लगता नहीं , बस आदमी का रूप है ।

कब धरेगा रूप कैसा , यह महज विद्रूप है ।।

बात है कोई नई नहीं , है युग-युगों से आ रही।

बुराई ने अच्छाई पर , कहर सा बरपा रही ।।

अच्छाई की पर जीत होती , यही अंतिम सत्य है ।

देर हो सकती है पर, अंधेर नहीं, ये तथ्य है ।।

संस्कार का महती धनी , भारत का हर संतान है ।

सदियों से भारत विश्व को, देता रहा सतज्ञान है।।

बुद्ध के दिए ज्ञान को, पर चीनी कहीं बिसार गये।

भूले वे शायद ज्ञान सारा, संस्कार सब बिसार गये ।।

अब भी संभल जा , चीन तू, फिर वक़्त न मिल पाएगा।

इंसानियत से प्रेम कर, सच्चा बौद्ध तब कहलायेगा।।

जरूरत क्या है?

ब्यर्थ पत्थर फेंकने की , भी जरूरत क्या है?

संदेह पर इल्जाम मढ़ने, की जरूरत क्या है??

प्रमाण जबतक न मिले, किसी बात की सच्चाई की।

बनाना बतंगर बात का , भी जरूरत क्या है ??

काम तो भरे पड़े हैं , उन्हें कुशल कर्ता चाहिए ।

अपने आप को बेरोजगार कहने,की जरूरत क्या है??

रोजगार हैं कितने पड़े , अपने शहर या गांव में ।

इसे छोड़ कर अन्यत्र जाने , की जरूरत क्या है??

चीज घर की ही भली , होती परायी चीज से ।

मिले गर घरकी सूखी रोटियां,पराठे की जरूरत क्याहै?

अपनी चीजतोअच्छी ही होती,मिठास मिट्टी की अलग।

जो स्वाद देती चीज अपनी,छप्पन भोगभी देता हैक्या?

हम संतुष्ट अपने आप में है,यह देन है धरती की मेरी।

कहते हैं लंका स्वर्ण का था,हमको गिला है क्या ??

गिला हमें है ही नहीं, शिकवा नही करते किसी का।

जो पास मेरे है, बहुत है, करना अधिक उससे है क्या?

करतें गलत हम हैं नहीं, करना नहीं हम चाहते ।

पर कोई गलत हम से करे, उसे है माफ करना क्या??

जैसा जो करे वैसा करो,यह धर्म गीता ग्रंथ का।

दुष्ट को देनी सजा ही ,धर्म नहीं है क्या ??

अत्याचार सह कर मौन रहना,अधर्म यह होता बड़ा।

चुपचाप बनकर मूकदर्शक, धर्म होता क्या ??

पैगाम उल्फत का .

पैगाम उल्फत का तेरे , पास पटाऊं कैसे ?

छिपा रखा हूं जमाने से ,अब और छिपाऊं कैसे??

बहुत बेहाल है दिल , समझता नहीं समझाने से ।

काफी उलझन है मुझे, उलझन को हटाऊं कैसे ??

बुलंद कर हौसला,पहुंच जाता हूं,कभी दरपर भी तेरे।

हौसला पस्त हो जाती सभी,आवाज निकालूं कैसे??

लगा है पहरा ज़मानें का ,हर ओर से नजरें हमपर।

बहुत मुश्किल है ज़माने की , नजरों से बचाऊं कैसे??

जान दे दूं भी अगर , मिलनें की बेकरारी में तुमसे।

डर है बदनामी की तेरी ,बदनाम कराऊं कैसे ??

अब दौलत के लोग दीवाने.

अब कर कुटुम्ब का क्या कीमत,दौलत मंदों से प्यार ।

हो गये दौलत के लोग दीवाने,बाकी सब कुछ बेकार।।

उनकी दौलत उनको होती, उसमें क्या तकरार ।

नहीं मिलेगी कुछ भी तुमको,सारे ऐठन बेकार।।

अपनी औकात में रहना सीखो, औरों से क्या लेना ।

तुझे काम देगा तेरा ही , ब्यर्थ भुलावे में क्यों रहना।।

दिया हाथ है दो दो , चाहे जिसने भी भेजा तुमको।

उन हाथों से काम करो , फैलाओ कभी नहीं उनको।।

उन हाथों में शक्ति दिया , ‘भेजा’ में बुद्धि भी डाला।

इन्ही हाथ दोनों से मानव ,जाने क्या क्या कर डाला ।।

प्रकृति बनाई जितनी जीवें , मानव उनमें सर्वोत्तम ।

अपने ही बल और बुद्धि से , कहलाता वह सर्वोत्तम।।

हो रहा क्षिण मानव बुद्धि बल ,जो है भी भटक रहा है।

रज,काम,क्रोध,मद,लोभ ,मोह का,पडता प्रभाव रहाहै।

इन अवगुण का प्रभाव मनुज पर,चढ़ता निज जाता है।

सारे कूकर्म करने का उनमें, इच्छा जागृत करता है।।

जा रही बदलती नित्य प्रवृतियां,सद्गुण सेदूर हुएजाते।

अवगुण का प्रभाव नित्य, हावी उनपर होते जाते ।।

भर गया मैल मानव मस्तिष्क में,दूर इसे करना होगा।

सात्विक विचार मनमें आजाये,ऐसा कुछ करना होगा।

ये बातें नहीं असम्भव ,पर उतना भी आसान नहीं ।

लेगा अवतार महामानव कोई,परकब कहनाआसान नहीं।।

एक अकेला ही दिनकर तो,तम को रोज भगा देते।

अपनी उर्जा दे जीवों पर,अपना अलख जगा देते ।।

हर बातें बताई तो नहीं जाती.

सारी बात को कहकर ,बताई तो नहीं जाती ।

समझना चाहते,लेते समझ, समझाई नहीं जाती।।

सृष्टि रची जो भी कोई ,नजर भी तो नहीं आता ।

उनकी कृतियों दिखती भले ,पर खुद कहां दिखता।।

ढ़ढ़ने में रात-दिन , है जो लगा रहता ।

किसी के बिन बताये ही , उसे वह ढ़ूंढ़ ही लेता।।

प्रकृति जो कुछ बनाती है , नहीं सब कुछ बता देती।

कुछ को यह बता देती , कुछ को ढ़ूढ़नी पड़ती ।।

यह सृष्टि अनंत है, है अनंत उनकी कृतियां ।

विविध चीजें बना उसमें , भर दी कला की कृतियां।।

असंख्य चीजों से भरा , ब्रह्मांड है अपना ।

सम्पूर्ण कोई देखान शायद,महज यह एक है सपना।।

बहुत सी बात ऐसी है , जिसे हम गुप्त है कहते ।

समझ तो लोग सब जाते स्वत ,समझाया नहीं करते।।

अन्य कुछ और बातें हैं, जो संदेह में रहते ।

जिसे देखा नहीं कोई ,लगाया अटकलें करते।।

उसे विज्ञान की भांती , साबित कर नहीं सकते ।

खड़ा करभी कसौटी पर ,परख कर कह नहीं सकते ।।

शक पैदा कराने का , यही एक मार्ग रह जाता ।

तर्क को काटनें का तर्क से ,यही एक रास्ता होता।।

उठाने का इसी का फायदा , मिल लोग को जाता ।

अवसर बरगलाने का , उनको प्राप्त हो जाता ।।

विवेक तो सबको मिला , बातों को समझने का ।

जरूरत ही नहीं पड़ती , अलग फिर से बताने का।।

कभी तकलीफ होती है.

दुखे रग को हिलाने से , बहुत तकलीफ़ होती है।

आहत दिल को ,हल्की बात भी तकलीफ देती है।।

समय का फेर ही कहिये ,वही सब कुछ कराता है।

कभी कुछ जोक हल्का सा , खड़ा तुफान करता है।।

एक ही बात पर परिवेश से , मतलब बदल जाता ।

सुखद बातें बदल परिवेश में, कुछ और हो जाता ।।

कुछ बोलिये उसके कबल ,चिन्तन करें मन में ।

माकूल गर समझें , फिर क्यों देर करने में ??

हरगिज करें कोशिश नहीं ,किसी का दिल दुखाने का।

मतलब आप का केवल , अपना ईष्ट साधन का ।।

मृदुभाषी भी अपने आप में , एक गुण बड़ा होता ।

हदें जब पार कर जाये , यह पर ब्यर्थ न जाता ।।

दुखे रग को हिला कर लोग तो ,आनन्द ले लेते ।

पराये दिल दुखाने का , घृणित अपराध कर देते।।

नृशंस यह काम जो करते , बड़े वह मूर्ख हैं होते।

निन्दनीय स्वयं होते पर , निन्दा और का करते ।।

किसी का दिल दुखाने में ,मजा आता किसी को जब ।

दुखा उस मूढ़ को भी जब,सबक आकर सिखाये तब।।

निसक जो दिल से होते हैं , वही यह काम है करते ।

देकर दर्द औरों को , तड़पता देख उन्हें हंसते ।।

उन्हें जब स्वयं पर चूता , तभी महसूस होता हैं।

कितना दर्द होता है , तभी मालूम होता है।।

किसी से प्रेरणा मिलती .

कभी जब आदमी कुछ काम , करता या हो करवाता।

किसी की प्रेरणा होती , कभी ऐसा नहीं लगता ??

हरदम हर किसी मानव का , मस्तिष्क सोंचता रहता ।

यही है काम मस्तिष्क का , उसी में ब्यस्त ही रहता ।।

न जाने कौन देकर प्रेरणा , कुछ काम करवाता ।

असम्भव सा लगे जो देखने में,सम्भव करा देता ।।

सोंचा तक नहीं जिसने, उसे जागृत करा देता ।

टूटी हुई किश्ती से , सागर पार करवाता ।।

लगे ऊत्ताल लहरें आ, डुबोये बिन न छोडेगी ।

बिना आगोश में उनको लिये ,हरगिज न छोडेगी ।।

करिश्मा पर किसी का, कोई उसको पार करवाता ।

साहिल तक उसे मजधार से ,ला स्वयं पहुंचाता ।।

प्रेरणा कौन है देता , समझ में कुछ नहीं आता ।

कौई अदृश्य शक्ति हो ,नजर से कुछ नहीं दिखता ।।

किसी में चेतना कुछ भी , कोई जागृत कराता है।

चयन उस आदमी का कर , काम अपना कराता है।।

महज वह आदमी तो बस , कठपुतली हुआ करता ।

नचाता कोई उसको डोर से , वह नाचता रहता ।।

देता प्रेरणा कोई , मनुज भ्रम पाल लेता है ।

मैनें ही किया ये सब , नासमझ मान लेता है।।

दिया जो प्रेरणा उसको , न उसका ख्याल आता है।

स्रोत निकला कहां से वह ,उसे ही भूल जाता है ।।

शिकार हो जाता वहम का , कभी नहीं ढूंढ़ पाता है ।

दिशा से हो भ्रमित जो भी ,साहिल पा न पाता है ।।

अंत तय है जिन्दगी का .

अंत तय है जिन्दगी का,यह जानते तो लोग सब।

कथन को सत्य शत-प्रतिशत , मानते भी लोग सब।।

फहम में डालकर अपना कोई, उसमें बसा लेता ।

कुछ शुरुआत करने के कबल, उसे कर स्मरण लेता।।

तय है वह कभी सन्मार्ग से , भटक नहीं पाता ।

स्वयं तो चलता ही चलता , औरों को चला देता ।।

जो कहना जानते अच्छा , खुद पर कर नहीं पाते।

दिखाते लोग जो पथ ,खुद ही चल कहां पाते ??

प्रभावित कर वही पाता , गूढ़ को जो समझ पाता ।

दिशा से स्वयं जो भ्रमित , समझा वह नही पाता ।।

पथ के जो हों पारंगत ,वही कुछ कर दिखा पाते ।

चलते हुए निज मार्ग से , लोगों को चला पाते ।।

अकेला खुद निकल पड़ते ,पीछे लोग लग जाते।

बढ़ता कारवां उनका , हुए लम्बा चले जाते ।।

कुछ छंटते चले जाते , नित जुटते चले जाते ।

कारवां रुक नहीं जाता ,निरंतर ही बढ़े जाते।।

प्रवीण गर पथ प्रदर्शक हों ,मकसद तक पहुंच पाते।

पथ में आये चौराहे अनेकों, पार कर जाते ।।

ऐसे लोग कम बहुधा , बहुत ही देर से आते ।

हद से जब गुजरती है , तभी खुद अवतरित होते।।

आते जो यहां उनको , जाना तय सबों को है ।

खाली हाथ ही जाना , यहीं सब छोड़ जाना है।।

लगे क्यों लूटने में हो , सभी कूकृत्य भी करके ।

रह जायेगा सब कुछ यहीं, जाओगे हाथ मल कर के।।

दाता जो दिया तुमको , उसी में खुश रहो हरदम ।

दिखा दो कर्म कर ऐसा , सबों को लाभ दे हरदम ।।

ख्वाब ही संजीवनी.

गर ख्वाब है ये जिंदगी , तो ख्वाब का फिर क्या ?

यह कुछ पलों का खेल है ,इस खेल का फिर क्या??

ख्वाब तो है ख्वाब ही , हकीकत से वास्ता ही क्या ?

किस पल न जाये टूट , बिखरने में होती देर क्या ??

रब ही बता सकेगा सच , किसी और को पता ही क्या?

डूबोये रहेगा कब तलक , यह माजरा ही क्या ??

सोने को ही खोना बताते , कुछ लोग है न क्या ?

पर, खोये वगैर ख्वाब भी , आती कभी है क्या ??

ख्वाब ही संजीवनी , न जिंदगी का क्या ?

बुझते हुए दिये को फिर ,जलाती नहीं है क्या??

मिट जाये ख्वाब जिंदगी से , तो खत्म जिंदगी न क्या?

बिन ख्वाब कोई ज़िन्दगी ,वह जिंदगी भी क्या ??