दोस्ती दुखदाई भी होती .

करनी दोस्ती गाढ़ी , कभी दुखदाई भी होती ।

निभाना ही इसे ताउम्र , बहुत कठिनाई भी होती।।

यूं दोस्त राहों में कभी , चलते भी मिल जाते ।

चाहे चाहिए जितना ,अधिक उससे भी मिल जाते।।

जितने लोग मिल जाते, सभी क्या मित्र बन जाते?

बनाना दोस्त तो आसां , निभाना पर कठिन होते ।।

नहीं जो मित्र होते हैं होते , शत्रु तो नहीं होते ?

करनी बुराई उनकी , नहीं क्या ब्यर्थ ही होते ??

मित्र बनाना आजकल , आसान इतना है ।

दबाकर बटन मोबाइल का,उधर से हामी पाना है।।

सामान्य रहना भी नहीं, आसान है होता ।

हर कठिनाइयों का सामना ,करना उन्हें होता।।

आज उन दोस्ती का कोई भी , मतलब नहीं होता।

स्वार्थ साधन का सुगम , एक रास्ता होता ।।

स्वार्थ गर सध गया हो , दोस्ती भी खत्म हो जाती ।

आप का नाम उनके लिस्ट से, डीलिस्ट हो जाती ।।

इन्टरनेट ने तो दोस्ती का ,कद ही बढ़ा डाला ।

संसार के हर देश तक , पहुंचा उसे डाला ।।

हर देश से ही आपकी , अब दोस्ती हो गयी ।

”बसुधैव कुटुम्बकम” भावना ,भी सत्य सी हो गयी।।

बहुत से देश में संसार के,आपका मित्र बैठा है।

अपने देश से नित भेजता , संदेश रहता है ।।

संदेश ही केवल नहीं, गीत ,संगीत आता है ।

वहां की संस्कृति और सभ्यता ,का बोध होता है।।

कभी ऐसा न गुजरा था .

समय जो आज गुजरा जारहा,कभी ऐसा न गुजरा था।

सारा बिश्व ही स्तब्ध , कभी क्या यह नजारा था ??

सबों में मौत का भय है, सबों की जिंदगी प्यारी ।

छिपे सब लोग हैं घर में,गजब ये दास्तां न्यारी ।।

नहीं ऐसा कभी जग में, हुआ था वाकयां पहले ।

नहीं फिर से दोबारा हो , यह लो कसम पहले ।।

मन अशांत है कितना , बाहर से शांन्ति दिखती ।

भयाकुल लोग हैं सारे , प्रकृति सो रही लगती ।।

लगता मौत का तांडव, हर ओर छाया है ।

हो भूमिगत, भयभीत मानव, खुद को छिपाया है।।

मानव का शत्रु तो पापी , कहीं पर सो रहा होगा ।

स्वजन उनके कही छिप कर ,बैठा रो रहा होगा ।।

कीड़े पतंगे खा के , बुद्धि भ्रष्ट कर डाला ।

स्वजनों का शत्रु तुम बता, यह क्या है कर डाला?

चेतना शून्य हो गये , या बची कुछ चेतना तुममें।

बची कुछ है अगर तो सोंचना, यह क्या हुआ तुमसे।।

सोंचोगे अगर निष्काम , दोषी खुद को पाओगे ।

तेरी आत्मा कोसेगी तुमको, कहीं का रह न पाओगे।।

प्रायश्चित करने योग्य भी, तुम रह न पाओगे ।

अपना मुंह दिखाने योग्य , खुद को रख न पाओगे।।

कूकृत्य इससे और ज्यादा ,हो ही नहीं सकता ।

तुम इतने गिरे हो , सर तुम्हारा उठ नहीं सकता ।।

बात को मन ही जन्म देता है.

दो दांत होते हाथी का,एक दिखाने का एक खानेका।

रूपभी आदमीका दोहोता,एक शराफत काएकशैतानी का।

इन्ही दो प्रवृतियों के बीच,मानव जिंदगी चलती ।

जब जिसकी मात्रा बढ़ती, वैसी ही प्रवृति होती।।

अच्छी बुरी बातों को मन ही, जन्म देता है ।

यही तो काम है मन का, अपना काम करता है।।

मस्तिष्क सोंचता इस पर, सोंच कर फैसला देता ।

नियंत्रण तो इन्हीं का है, जो चाहता होता ।।

गुण तीनों भरे रहते सदा, हर मानव मस्तिष्क में।

प्रभावित पर वही करता ,हो जो सर्वोच्च मस्तिष्क में।।

आचार और बिचार तो ,मन में उपजता है ।

सतोगुण का अगर प्रभाव हो,तो उत्तम भाव होता है।।

बहुत कम लोग दुनिया में,जो दिल की बात कहते हैं ।

जो बातें बोलते मुख से , वही मन में भी रखते हैं ।।

जो मिथ्या बात करते हैं, जगत में कद्र पाते हैं ।

जनता पूजती उनको , सभी जयकार करते हैं।।

जिनका सत्य कथन होता ,जो करना चाहते कहते ।

उनकी बात को सुन लोग,मुंह मोड़ चल देते ।।

संख्या कम बहुत उनकी, पर वे ठोस होते हैं ।

जो बातें बोल दी उसनेे, पाषाण की लकीर होते हैं।।

अपनी बात पर रहते, मुकरना जानते नहीं ।

चाहे काल हो आगे , मुकर कर भागते नहीं ।।

बात फिर भी निकलती है, भले कुछ वक्त लग जाता।

समझ जब लोग जाते हैं,महा तुफान बन जाता ।।

संयम स्वयं पर रखें.

अच्छे दिनों में मित्र का ,भरमार हो जाता ।

जिनका दरश तक था नहीं ,अब यार हो जाता ।।

देखते आप चाहें जिस तरफ ,जो मिलने आपसे आते।

परम हितैषी आप के , बतलाते नहीं थकते ।।

है कौन अपना आपका , पराया कौन आप का ।

यह जानना आसान नहीं , कठिन यह काम आपका।।

पहचान कर मन में धरें , कह व्यक्त न कर दें ।

दिल मे आपकी जो भावना, वही संयोग कर रखदें।।

अपनी जिंदगी की गूढ़ को , बस गूढ़ रहने दीजिए।

भूलवस इसको कभी मत , सार्वजनिक कर दीजिए।।

जानकर आप की कमजोरियां, लेने लाभ हैं लगते।

कुछ फायदा नाजायज , लेने में है लग जाते ।।

आजकल ब्लैकमेलिंग को ,नया धंधा बना देता ।

दिखाकर आपकी कमजोरियां , आपसे ऐंठने लगता।।

परम जो मित्र होते आज का, कब शत्रु बन जाये।

जड़ खोदने वालों का परम ,सहयोगी बन जाये ??

घर की भेदिया से कोई बड़ा , ना शत्रु है होता ।

जिनके घर में घुंस जाता , सत्यानाश कर देता ।।

ये आस्तीन का सांप तो ,हैं हर जगह मिलते ।

आपके साथ ही रहते सदा , पर दिख नहीं पाते।।

इन शत्रुओं का आक्रमण, बेजोर है होता ।

कब डंस लिया आभाष तक , होने नहीं देता ।।

जो संयम स्वयं पर रखते,सफलता भी वही पाते।

पाते कामयाबी वे , वही कुछ दिखा देते ।।

अब खुद मकोड़ा बन गया .

अब चांद जा कहीं सो गया, दिन-रात चलता थकगया।

जाने कहां गयी चांदनी , घनघोर अंधेरा आ गया ।।

आती नजर में कुछ नहीं ,सर्वत्र तम का राज है ।

सद्भावना तो लुप्त हो गई,दूर्भावना अब ब्याप्त है ।।

निशाचरों का दोड़ मानों , अब धरा पर आ गया ।

भूत और बैताल का ,आधिपत्य जग पर हो गया।।

कीड़े मकोड़े भक्ष करके, खुद मकोड़ा बन गया ।

विश्वभर में फैल कर , संघार करने लग गया ।।

आहार का प्रभाव मन को ,क्या बनाता देख लो ।

बना है आदमी ही आदमी का , जानलेवा देख लो।।

यह आदमी लगता नहीं , बस आदमी का रूप है ।

कब धरेगा रूप कैसा , यह महज विद्रूप है ।।

यह बात तो कोई नई नहीं , यह युग युगों से आ रही।

बुराईयां अच्छाईयों पर , कहर बरपाती रही ।।

अच्छाईयों की जीत होती , यह कथन भी सत्य है ।

देर हो सकती कभी पर , होती कथन यह सत्य है ।।

संस्कार का होता धनी , हर भारती ही आ रहा ।

प्राचीन मेरे पूर्वजों , चीनीयों को समझाता रहा ।।

बुद्ध की बातें नहीं, भेजे में तेरे रह गया ।

भूल गये क्या ज्ञान सारा , ब्यर्थ कचरा भर गया ।।

अब भी सम्हल जा ,कर अक्ल ठिकाने,भूलजो है दिया

रे , मानवों का प्रवल शत्रु , बन के क्यो तूं रह गया ।।

जरूरत क्या है?

ब्यर्थ पत्थर फेंकने की , भी जरूरत क्या है?

संदेह पर इल्जाम मढ़ने, की जरूरत क्या है??

प्रमाण जबतक न मिले, किसी बात की सच्चाई की।

बनाना बतंगर बात का , भी जरूरत क्या है ??

काम तो भरे पड़े हैं , उन्हें कुशल कर्ता चाहिए ।

अपने आप को बेरोजगार कहने,की जरूरत क्या है??

रोजगार हैं कितने पड़े , अपने शहर या गांव में ।

इसे छोड़ कर अन्यत्र जाने , की जरूरत क्या है??

चीज घर की ही भली , होती परायी चीज से ।

मिले गर घरकी सूखी रोटियां,पराठे की जरूरत क्याहै?

अपनी चीजतोअच्छी ही होती,मिठास मिट्टी की अलग।

जो स्वाद देती चीज अपनी,छप्पन भोगभी देता हैक्या?

हम संतुष्ट अपने आप में है,यह देन है धरती की मेरी।

कहते हैं लंका स्वर्ण का था,हमको गिला है क्या ??

गिला हमें है ही नहीं, शिकवा नही करते किसी का।

जो पास मेरे है, बहुत है, करना अधिक उससे है क्या?

करतें गलत हम हैं नहीं, करना नहीं हम चाहते ।

पर कोई गलत हम से करे, उसे है माफ करना क्या??

जैसा जो करे वैसा करो,यह धर्म गीता ग्रंथ का।

दुष्ट को देनी सजा ही ,धर्म नहीं है क्या ??

अत्याचार सह कर मौन रहना,अधर्म यह होता बड़ा।

चुपचाप बनकर मूकदर्शक, धर्म होता क्या ??

पैगाम उल्फत का .

पैगाम उल्फत का तेरे , पास पटाऊं कैसे ?

छिपा रखा हूं जमाने से ,अब और छिपाऊं कैसे??

बहुत बेहाल है दिल , समझता नहीं समझाने से ।

काफी उलझन है मुझे, उलझन को हटाऊं कैसे ??

बुलंद कर हौसला,पहुंच जाता हूं,कभी दरपर भी तेरे।

हौसला पस्त हो जाती सभी,आवाज निकालूं कैसे??

लगा है पहरा ज़मानें का ,हर ओर से नजरें हमपर।

बहुत मुश्किल है ज़माने की , नजरों से बचाऊं कैसे??

जान दे दूं भी अगर , मिलनें की बेकरारी में तुमसे।

डर है बदनामी की तेरी ,बदनाम कराऊं कैसे ??