उससे निपटते जाइये.

अब सोचने का वक्त नहीं,सोंचना अब छोड़िए।

बीत गये हैं वक्त कब के, नसे निपटना सीखिये।।

बचाव के कुछ टिप्स हैं , पालन लगन से कीजिये।

भूल से उस काम को ,ढीला कभी मत सोंचिये ।।

झेलना कुछ कष्ट पड़े भी, खुशियों के साथ झेलिये।

रक्षार्थ है वह आपका , उसे झेलना मत बोलिये ।।

यह कवच है आप का, लगाई गयी पावंदियां ।

पावंदियों को मानिये , औरों को भी मनवाइये।।

विश्वभर के मानवों का , शत्रु खड़ा है सामने ।

पावंदियां ही ढाल तेरा ,इसे प्यार से अपनाइए।।

अज्ञातवास तो है पुराना , हमलोग सुनते आ रहे।

पर हमारा चन्द दिनों का,निष्ठा से इसको निभाइये।।

मानव कैसे बढ़ पाया होगा.

श्रम कठिन किया होगा मानव,तभी आगे बढ़ पाया होगा।

बल केसाथ विवेक लगाकर,अपना काम बढ़ाया होगा।

सोचें आदिमानव की बातें,पग पगपर बाधा झेला होगा

कुछ भीतो पास नहींथा फिरभी,जीवनका खाका खींचा होगा।।

पग-पग पर आये बाधाओं से,उसे जूझना पड़़ता होगा।

अपने जीवन को सदा दावपर,लगाये रहना पड़ताहोगा

कोई नहीं साथ देता होगा, स्वयं अकेला करता होगा।

सिर्फ भरोसा अपने पर, करके जीवन जीता होगा ।।

प्रकृति प्रदत्त विवेक का,यह हरदम लिया सहारा ।

इसी विवेक के बलबूते ,जीवन में नहीं किसीसे हारा।।

जरूरत जब महसूस किया, मस्तिष्क पर जोर लगाया।

मंथन करते करते मस्तिष्क ने, उसे खोज ही लाया ।।

आवश्यकता पड़ती मानव को,तब करता आविष्कार।

बिना जरूरत कभी न कोई, होता आविष्कार ।।

दृढ़-प्रतिज्ञ मानव जब होता,उसमे धुन आ जाता ।

छिपी हुई चाहे जितनी हो ,ढ़ूढ़ उसे ही लेता ।।

यही खोज करके मानव, आज यहां तक पहुंचा ।

पर विकृति कुछ अन्य तरह का,उसमें भी आ पहुंचा।।

विकृतियों के बस मे हो,मानव मस्तिष्क बदल गया।

सारे जीवों से उत्तम मन , दुर्जनता में बदल गया ।।

अब मानव का कौन भरोसा, जाने क्या कर डाले।

सारी जगती हो नष्ट जाये,ऐसा कुछ कर डाले ।।

सृजन कार्य होता कठिन ,विध्वंस बहुत आसान।

विध्वंस जगत का शत्रु होता ,पर होते सृजन महान।।

मानवता का दुश्मन.

विज्ञान अधूरा बहुत आजहै,इसपर करना ब्यर्थ नाजहै।

बहुत दंभ थे भरते तुमपर, आती होगी शर्म आज है।।

करोना का निर्माण कराकर,इठलाता फिरता हैखुदपर।

घिरा स्वयं भी चक्रब्यूह में,अपनों गैरों की जानें लेकर।।

मानवता का तुम शत्रु हो,खुद को बुद्धिस्ठ भी कहतेहो।

लाशोंका अम्बार लगाया,क्यों बुद्धधर्म बदनाम कियेहो।

बिच्छू का मंत्र न आता पूरा,चले खेलने बिषधरके संग।

रे मूढ़ तेरी बुद्धि कच्ची,तूं कर दी सबको रंगों में भंग।।

मानवता का दुश्मन बन गये,हैंकड़ी तेरी कमी नहीं।

कितनों की जानें ले ली तूं,फिर भी दंभें गयी नहीं।।

मानवनहीं अमानव होतुम,हिंसक पशुओं सेभी बदतर।

मानव को बर्बाद किया तुम,कैसा तुम निकला बर्बर??

जिसने तुमको जन्मा होगा,खुद कितना शर्मीन्दा होगी।

तेरी करनी पर मां भी तेरी,सबसे सुनती निंदा होगी ।।

हाउस अरेस्ट सबको किया, नहीं किसी को छोड़ा।

लाचार हुए सब बैठ गये, तूं गर्क कराया बेड़ा ।।

अपनों कितनें का जान लिया, फिर भी दर्द न तुमको ।

इस दुनिया में रहने का,अब हक भी नहीं है तुमको ।।

तेरे पापों के बोझों को,धरती अब नहीं सहेगी ।

बर्दास्त नही होती अब उनको, खुद कुछ कर बैठेगी।।

जा सम्हल अभी भी ऐ पामर,घृणित पापों से दूर रहो।

बुद्ध धर्म का अनुयायी हो, बुद्धों कोमत बदनाम करो।

क्या करे विज्ञानी.

उल्टा-पुल्टा काम भी , कभी कर देता विज्ञानी ।

राजनितिज्ञ करता रहता ,इनपर अपनी मनमानी।।

वैज्ञानिक निज खोज में , लगाये रहता ध्यान ।

नयी -नयी चीजों का है , करता अनुसंधान ।।

सिवा खोज के अन्य उसे , कुछ नहीं कभी है दिखता।

अपने कामों में सदा लगाये ,मन-मस्तिष्क को रखता।।

कभी कभी तो लोग इन्हें , पागल तक कह देता ।

इनको तो अधिकांश लोग , समझ नहीं है पाता ।।

खोजों में ही डूबे रहते , सदा लगाकर गोते ।

काफी गहराई तक जातै, तब ही कुछ ला पाते।।

राजनीति की गहराई में, नजर नहीं वे देते ।

यही लाभ ले राजनीतिज्ञ, उनसे उल्टा करवाते ।।

उल्टा-पुल्टा का एक उपज ,’था दिया करौना नाम’।

मानवता का बन दुश्मन,कर दिया घिनौना काम ।।

जाने उनके चक्कर में पड क्यो, ऐसी चीज बनाई।

लाखों लोगों को उसने तो , मौत की नींद सुलाई ।।

आज विश्व उनके कुचक्र में,ऐसा फंसा हुआ है।

त्राहिमाम का शोर अब , हर ओर मचा हुआ है ।।

यह मानवता का शत्रु, सुन सुन हंस कहीं रहा होगा।

मौतों का माला गूंथ -गूंथ ,गले में पहन रहा होगा ।।

नहीं बख्श पाया अपनों को ,ऐसा नीच अधम है ।

अपने बच्चों तक को न छोड़ा, यह सर्पों से न कम है।।

जिन्दगी एक सपना.

यह जिंदगी क्या है ,महज बस एक है सपना ।

पवन का एक झोंका भी , तोड़ देता कभी सपना।।

सपना तो बस सपना, इस में दम ही है कितना ।

अधूरी ,पर बिना इसके , रहती जिंदगी अपना ।।

असफल जिंदगी उसकी, नहीं देखा जो हो सपना ।

पता गणतब्य नही जिसको, निश्चित है भटक जाना।।

वही कुछ कर दिखा सकते ,जो पहले देखते सपना।

एक लक्ष्य जीवन का , शुरु करता वही सपना ।।

लक्ष्य जो देखते रहते , मंजिल तक पहुंच जाते ।

अथाह सागर जिन्दगी का , पार कर जाते ।।

जिन्हें पर लक्ष्य न दिखता, उन्हें तो डूबना तय है।

दिशा से हीन भटकों को , होना ही लय तय है ।।

यह जिंदगी नाज़ुक बहुत, सागर अथाह है ।

है जाना तैरकर इसको ,अति-दुर्गम ये राह है।।

जिसे पर हौसला होता , तैर कर पार हो जाता।

न सीखी भी हो तैराकी ,वह उस पार हो जाता ।।

असंभव जो हुआ करता ,वह संभव भी हो जाता।

न जाने कौन सी शक्ति , उसे है पार करवाता ।।

वधिरों के गले सेभी , कभी स्वर फूट पड़ता है ।

गूंगे भी कभी अपनी , जुबानों बोल पड़ता है ।।

बातें ये संभव है , कभी ऐसा हुआ करता ।

कैसे हुआ संभव , गुत्थियां है सुलझ सकता ।।

विधि कुछ है विधाता का , जिसे विधान है कहते ।

असंभव हो कभी संभव ,उसे बरदान है कहते ।।

ऐ मानवता का शत्रु.

मानवता का प्रवल शत्रु, सोचो तुमने क्या किया?

धरा के सारे मानवों पर , कहर कैसा वरपा दिया ??

बुद्ध का अनुयायी हो तुम , लोग कहते बात यह ।

पर कर्म तो विपरीत तेरा, तुमने किया जो कर्म यह।।

जो शिष्य होता बुद्ध का ,ऐसा कर्म कर सकता नहीं।

मानवता का प्रवल शत्रु , बन कभी सकता नहीं ।।

मानव भीहो सकता नहीं तूं,मानव का तूं है रूप केवल।

जिसने जना होगा तुझे,हो रो रहा कहीं बैठ केवल।।

पश्चाताप केवल कर सकेगा,क्या और कुछ करपायेगा?

आंसू बहाने के सिवा ,अब और क्या कर पायेगा ।।

जीवित अगर मां-बाप होगें,आजतक गर इस धा पर।

झुकी होगी आज ग्रीवा,तनय के कर्मो देख कर ।।

तूं मानवता का प्रवल शत्रु,स्वयं अपने आप का भी ।

जैसा किया कूकर्म तुमने,सोंचा न कोई आजतक भी।।

कुकर्म जितने भी हुए हों,इस मही पर आज तक ।

तुम सा भयावह कूकर्म कोई,किया न होगा आजतक।

कलंक बन तूं जन्म लिया, शर्मसार तुमसे है धरा ।

ऐ निकृष्ट तुम जन्में न होते , निश्चिंत रहती यह धरा ।।

है बची थोड़ी हया भी ,तो आत्महत्या स्वयं कर ले ।

मनहूस सूरत ले यहां से , नरक को प्रयाण कर ले ।।

विश्व भर से बददुआ , तुमको मिला निकृष्ट प्राणी ।

तुम सा अधम इस विश्व में, कोई दूसरा होगा न प्राणी।।

जल्दी छुट कहां पाता.

जो रहते सावधान खुद ही, उन्हें खबरदार क्या करना।

हों बैठे स्वयं जो जागे, उन्हें परेशान क्यो करना ।।

जो हर मोड़ से वाकिफ , मानव जिंदगी का हो ।

उन्हे कोई पथप्रदर्शक की जरूरत ,ही कभी क्यो हौ??

जिन्हेंआदत मेंही होसावधानी,जरूरत सीखनेकी क्या?

किसी की बनी बनाई आदतें;कभी छूटती भी क्या ??

‘आदत है बुरी बला ‘, लोग सब जानता , सुनता ।

चाहता छोड़ना इसे जब कभी ,‌जल्दी छुट कहां पाता?

जो अच्छी डालते आदत, वे सुखमय सदा रहते ।

बड़े परेशानियों से मुक्त , वै जीवन जिया करते ।।

गलत आदत जो रखते पाल कर, दुख उन्हें होता ।

अपनी की गयी नादानियों का,फल उन्हें मिलता ।।

भले ही दोष देते अन्य को , पर सब लोग जानता ।

बनाये बात ये कुछ भी , कहां बिश्वास कोई करता ??

भरोसा स्वयं खो देता , गलत कह जो ठगा करता ।

खुलता भेद जब उनका, होना तिरस्कृत पड़ता ।।

गलत जो काम करता है, नतीजा वह गलत पाता ।

भले कुछ देर से मिलता ,अवश्य पर मिलता ।।

फल जब देर से मिलता , यही गफलत उन्हें होता।

सुने हैं देर होने से उन्हें , असंतोष हो जाता ।।

लालच , लोभ फिर उनपर , पकड़ अपनी बना लेता ।

गलत नव-प्रवृतियां उनमें ,‌ फिर जागृत करा देता ।।