घर जलाने के लिए.

बस एक तीली ही बहुत, घर को जलाने के लिये।

ज्यादा समय लगता कहां , बनें को मिटाने के लिये।।

लगाई हजारों वर्ष प्रकृति, मानव बनाने के लिये ।

पर कुछ पलों का खेल है, इन्हें मृत करनें के लिये।।

वक्त लगता है बहुत, निर्माण करने के लिये‌ ।

पर समय लगता कहां , विध्वंश करने के लिये।।

कहते,ढ़ेर पर बारूद की , आज बैठी है ये दुनिया।

है एक चिंगारी ही काफी , विष्फोट करने के लिये ।।

विध्वंश की सामग्रियां , मानव ने बनाया खुद जिसे ।

भयभीत उससे हो रहे , अपना ही जीवन के लिये ।।

मानव रोज बढ़ता जा रहा,निकट मृत्युके जाने केलिए।

फिर भी समय बर्बाद करता, ब्यर्थ कामों के लिये ।।

मानव जिंदगी हम पाये थे, सूकर्म करने के लिए।

पर हम लगाये घातबैठे,किसीकाजान लेने के लिये।।

मानव बना सब एक ही , यह प्रकृति की देन है ।

सम्प्रदाय ‍मानव ने बनाया,आपस में लड़ाने के लिये।।

घर को जलाकर लोग का ,जो रोटियां निज सेंकते।

घर जले चाहे किसी का,पड़ता फर्क क्या उनके लिये।।

मकसद उन्हें आतंक करना ,सम्प्रदाय चाहे कोई हो।

तलवार गर्दन काटता , गरदन एक सब उनके लिये।।

दहशतगर्द दहशत फैलाते,दहशत ही समझते फर्ज वो।

बस सोंचते इतना ही वह , कुछ और न उनके लिये।।

मुसाफिरों का कौन ठिकाना.

कौन अपंना कौन पराया, झमेले में इसके क्यों पड़ना।

यहां तोसब है एक मुसाफिर,किसीको किसी सेक्या लेना।।

मुसाफिरों का कौन ठिकाना,कहांसे आये कहांहै जाना।

जानकर क्या फायदा,तय तो सबको ही है जाना ।।

मत फंस माया के चक्कर में,सब के सब हैं बेगाना।

सिवा दुख के क्या देगें तुझे, जुदाई तो हो ही है जाना।।

दर्दो के सिवा कुछ और नहीं, सीखा है यह दे देना।

करके विश्राम ,पल दो पल को,उठ कर है चल देना ।।

‘मिलेगें फिर’यह कह देंगे,पर यह तो है फकत फसाना।

सच तो है यह ही केवल, नहीं लौटकर फिर मिलना ।।

यह दुनियां बस है केवल, मात्र एक मुसाफिर खाना ।

मुसाफिर ठहर जाते पल दोपल,उठते उठकरचलदेना।

सब के सब यहां मुसाफिर ही है,यह दुनियां एक मुसाफिर खाना।

फिर भी दिल लगा दिया कोई तो, निश्चित है दुख पाना।

मुसाफिर हो मुसाफिर ही रह,मिलोतो एक मुसाफिरसा

बंधन-मुक्त रह गये अगर,तो समझें तय है सुख पाना।।

सबके सब है हाथों तेरे, कहीं से खोज नहीं कुछ लाना।

बनाओ खुदको मत बोझिल,होगा मुश्किल फिरढ़ोपाना

क्यों लाद रहे गठरी सरपर, कचरो से भरा खजाना ।

यही छोड़ कर कचरे सारे,एकदिन खाली ही है जाना।।

सुनों ध्यान से बातें मेरी ,महज मशविरा इसे समझना।

लगे उचित तो इसे मानना, वरना अलग हटा देना ।।

जानकर अनजान बना रहता.

सबकुछ जानकर भी आदमी, अनजान बना रहता।

भूलकर सच्चाईयों को , नादान बना रहता ।।

गलत कुछ काम करने से,दिल हरदम ही रोकता।

पर ‘अहम’ फटकार कर ,उसे ही दबा देता ।।

अहम को दबाये रखना , मुश्किल बहुत ही होता।

असम्भव कहें अगर तो , कथन सत्य सा लगता ।।

हमारी बेईमानी चोरियां, हर रोज बढ़ती जा रही ।

पर हवस भी साथ में , उतनी ही बढ़ती जा रही ।।

आजकल आदमी से आदमीयत, दूर होती जा रही ।

इन्सानियत बनकर बेचारी , सिसकती सी रो रही ।।

मानव जो कोई हो चाहे, कभी कमजोर नहीं होता।

बल और बुद्धि दोनों का , गंठजोड़ यही होता ।।

पर इन्सानियत का साथ कम, आज देते लोग हैं ।

कलियुगी मनोवृत्तियों से , प्रभावित ये सारे लोग हैं।।

नैतिकता कमजोर पड़ती , जा रही हर ओर है।

हैवानियत भाड़ी पडी , इन्सानियत की हार है ।।

बोलें समय का दोष इसको, या युग का ही प्रभाव है।

अब कैसा बदलकर रह गया, मानवीय स्वभाव है ??

बदलाव करना तो प्रकृति का, नियम होता शाश्वत।

रुक गया बदलाव ही गर ,हो गया विकास का अस्त।।

सृष्टि बिना विकास का , बढ़ कभी सकती नहीं ।

या यो कहें यह सृष्टि , चल कभी सकती नहीं ।।

ऐ सनम.

ऐ सनम आज भी , दिल में बसाये रखता हूं।

बीत गये वर्ष कितने पर, तुझे भुला न पाता हूं।।

वही सूरत भी तेरी , अंतिम हुआ दीदार जिसका।

बसाये दिल में उन्हें, दर-दर ही फिरा करता हूं ।।

न जाने मौसम ,क्या क्या खिलाते रहते गुल ।

तुझे महफूज बलाओं से ,पर किये रखता हूं ।।

मन का मंदिर मे तुझे , रखता हूं सजा कर ऐसा ।

असर पड़े न बलाओं का ,ये इन्तजाम रखता हूं।।

दर्द उठता है कभी जोरोंकी , दिल तड़प उठता ऐसा।

बड़े मुद्दत से इसे , पर सम्हल रखता हूं ।।

यूं रूलाती तो मुझे रोज ही, बादलों की तरह।

ख्वाब बह जाये न अश्कों संग ,ध्यान रखता हूं।।

मिले भी जब कभी , सयोगबस जमाने के बाद।

बदली हुई सूरत में भी , पहचानने की कूबत रखता हूं।

करो प्यार मुझे या न करो , ये तेरी मरजी ।

मन के मंदिर मे मूरत की तरह ,बसाये रखता हूं ।।

समय का फेर भी , नहीं दिया पड़ने तुम पर ।

आये गये तो कितने मौसम , कर बे-असर रखता हूं।।

गयी हो भूल अगर ,तुम मुझको, कोई बात नहीं ।

मन में बसी सूरत से तेरी ,दीदार रोज करता हूं ।।

अहिंसा का पुजारी

प्यार की गीत जो गाते , नहीं लाचार वे रहते ।

जोअहिंसा के पुजारी हों,कभी कमजोर न पड़ते।।

समझते जो इन्हें कमजोर, पड़े वे भूल में होते ।

असली हीरा भी उन्हें, शीशा नजर आते ।।

असली कनक को भूलवस ,नकली समझ लेते ।

पीतल को चमकता देख , कनक इनको समझ लेते।।

यह भूल तो उनकी नहीं , अपनी हुआ करती ।

इसपर सितम इल्जाम , उनके सर मढ़ी जाती ।।

अहिंसा का पुजारी प्रवल ,बापू स्वयं थे अपने ।

अंग्रेजों को भगा डाला , इसी हथियार से अपने।।

जिनके राज थे इतने बड़े, सूर्य हरदम जहां रहते ।

इनके किसी भू_भाग में ,चमका सदा करते ।।

काफी कठिन था काम यह , पर कर दिखा डाला ।

अस्त्र , अहिंसा ,सत्य का ले , उनको भगा डाला ।।

हृदय मजबूत था कितना, इन्होंने करके दिखलाया ।

ब्रिटिश सा शक्तिशाली को ,भगाकर इसने दिखलाया।।

असंभव लोग थे कहते , उसे संभव बना डाला ।

पडी हुयी बेड़ियां मां भारती को , तोड़ ही डाला।।

तुफान उठने के कबल जो ,शांति हुआ करती ।

बड़े तुफान का ही आगमन का , सूचक हुआ करती।।

जो होते शांत बाहर से, लिये ज्वालामुखी होते ।

पर जब फूट वे पड़ते , तो कर वे क्या से क्या देते।।

जिसे मस्का नहीं आता.

न ज्ञानी का कदर होता ,न विद्वानों का है होता ।

कद्र गुण्डे , लफंगे ,मवालियों का,आज है होता ।।

सबकुछ जानते हो आप , पर मस्का नहीं आता ।

भरे गुण आप में सारे , खुशामद ही नहीं आता ।।

प्रविण हैं आप विषयों का ,तो समझें कुछ नहीं आता ।

अगर चमचागिरी आती ,समझ सबकुछ तुझे आता ।।

यह चीज ही ऐसी ,कि सब झुकते चले जाते ।

आप की मधुर-वाणी में, लोग फंसते चले जाते ।।

अपनी बड़ाई आप के , मन को बहुत भाती ।

दिल चाहता इनलोग की ,संख्या ही बढ़ जाती।।

ग्रसित इस रोग से अधिकांश,मानव ही हुआ करता।

विरले ही मिलेगें कोई, जिनमें यह नहीं होता ।।

ठगी जो हैं किया करते ,इसी का लाभ ले लेता ।

बड़ाई आप की करके , आपको बस में कर लेता ।।

कोई विद्वजन कभी किसी से,ऐसा नही करता ।

अपनी बात को वह आप से , स्पष्ट कह देता ।।

मस्का लगाना तो कभी , सीखा नहीं उसने ।

सदा ही सत्य कहने के सिवा ,जाना नहीं उसने।।

जो कुछ कहेगा आपको,केवल सत्य बोलेगा ।

जो भी उचित लगता उसे ,सीधी बात बोलेगा।।

इन लोग मस्का , लगाना ही नहीं आता ।

घुमा कर बात को अपनी, कभी कहना नहीं आता ।।

बात स्पष्ट करने का , सबों में गुण भरा होता ।

तो समाज कितना स्वच्छ ,और निर्मल हुआ होता।।

खुशी या गम.

गमों की दौड़ भी आती ,आकर लौट भी जाती ।

यादें पर नहीं जाती , जब-तब ही रुला देती ।।

चाहता भूलना तुझको ,भुलाये भी कहां भुलती ।

कोशिश कम नहीं करता , पर तुम कहां जाती ??

मेरा प्रयास जाता ब्यर्थ , जख्में और बढ़ जाती ।

दूर तो चाहता करना , दर्द पर कम कहां पाती ??

गमों की दर्द से दिल को , कहां निजात मिल पाती ?

दिलों में बैठकर दिल को ,कुरेदती ही सदा रहती।।

कहावत है पुरानी, लोग हरदम , ही कहा करते ।

जख्म भर जाये फिर भी,दाग तो हरगिज नहीं मिटते।।

दागें याद करवाता , नजर जब भी पडी करती ।

बीती बात जो अरसों ,उभार जो फिर उसे देती ।।

भरे जो घाव थे उनका ,उसे फिर से खुरच देता ।

दर्द जो सुप्त थे हो गये, पुनः उसको जगा देता ।।

दर्द मिटती मिटाने से ,दाग फिर भी नहीं जाता ।

लगता वक्त भी काफी , पूर्णतः पर कहा जाता ??

याद का इस घरौंदा में, जीवन खेलता रहता ।

अतीत का मंच तो कुछ है सिखाता ,सीखता रहता ।।

यही अनुभूतियां गम की ,खुशी का मंत्र बन जाती ।

लिये पराकाष्ठा पर वह खुशी को , ले चली जाती ।।

खुशी गम का निरंतर खेल ,यह चलता रहे हरदम ।

जीवन वह परम होगा , रहे चाहे खुशी या गम ।।