खाती नजर धोखा

जो आंखें देखती है देख,पूर्ण बिश्वास मत कर लें ।

खाती भी नजर धोखा, इसपर गौर तो कर लें ।।

भ्रम में डाल मस्तिष्क को ,न जाने दिखा देता ।

मस्तिष्क देख कर उनको ,पूर्ण बिश्वास कर लेता ।।

धोखा पूर्ण खा जाता, बातों को उलट देता ।

दिल को झूठ अपने जाल में ,कसकर जकड़ लेता।।

झूठी बात को ही सच समझ,उसपर अडिग होता।

घुसायें लाख सच्चाई उन्हें, पर घुस नहीं पाता ।।

भ्रमित को राह पर लाना,कभी आसान न होता।

मस्तिष्क पर पड़े प्रतिबिंब, वहां से हट नहीं पाता।।

समस्या आज की कोई नयी नहीं, काफी पुरानी है।

दिग्गज जो हुआ करते, वह भी हार मानी है ।।

अन्यथा कृष्ण कोथी क्या जरूरत,ब्रह्माण्ड दिखलाना।

खुद थकते नजर आये, पड़ा यह सब उन्हें करना ।।

अर्जुन थे पड़े भ्रम में, समझ पाते न समझाये।

लाचार हो कर कृष्ण यह,करतब थे दिखलाये।।

कभी आसान होता है नही,समझे को समझाना ।

प्रथम जो भी छवि बनती , उसे बिल्कुल मिटा देना।।

जो दिखता आंख को, सच मान लेना भी गलत होता।

मृगमिरीचिका जो है दिखाता ,गलत ही होता ।।

तहों तक जाइये ,जाकर उसे , हर तरह समझें।

खड़ा उतरे अगर वह हर तरह,तो सत्य उसे समझे।।

ऐ मन-मुसाफिर.

ऐ मन -मुसाफिर क्यों मेरे , तुम चैन से रहते नहीं !

रुकते नहीं पल भर कहीं, पल में यहां,पल में कहीं।।

चलते सदा दिन-रात रहते, विश्राम बस थोड़ा कहीं।।

चैन पल भर भी न मिलता , मिलती कहीं शान्ति नहीं।।

अशांत मन को सुख मिले, होता कभी ऐसा नहीं ।

सुख के बिना तो शान्ति , मिल कभी सकती नहीं ।।

बस शांति में ही जिन्दगी को , प्राप्त होता ज्ञान है।

चिन्तन-मनन कर आदमी, बनता रहा महान है ।।

ऐ मन-मुसाफिर तुम सदा ,बढ़ते हो, रुकते हो नहीं।

चिन्तन बिना कोई कभी, ज्ञान गूढ़ पाता है नहीं।।

गंतव्य क्या है, ऐ मुसाफिर,यह तो पहले जान लो।

सबसे सुगम क्या रास्ता ,जान लो पहचान लो ।।

यूं ही भटकने से कभी, मिलता नहीं गंतव्य है ।

दौड़े अगर भर जिन्दगी, मिलता नहीं मंतव्य है।।

पहुंचता नहीं कोई बिन चले,यह बात बिल्कुल सत्य है।

गंतव्य बिन चलता रहे, चलना नहीं क्या व्यर्थ है!!

हासिल नहीं बिन दूरदृष्टि , कोई कर पाता नहीं ।

पक्के इरादे के बिना, कोई सफल होता नहीं।।

मन-मुसाफिर गर बढ़े, गंतव्य पक्का जान कर ।

तय पहुंचना ही उसे है ,चलना यही है मान कर।।

हासिल जिन्हें गंतव्य है , वे ही सफल व धन्य हैं।

जो रास्ते में गये अटक , वे जिन्दगी मे फेल हैं।।

किसका कौन सुनता है .

किसे रोकूं ,किसे टोकूं , किसका कौन सुनता है।

अपने मन का सब करते, किसका कौन करता है।।

जमाने का असर है, या फिर कुछ और होता है।

समझ में जो जिसे आता, वही सब बात कहता है।।

बड़ो का कद्र होता था कभी, अब कौन करता है।

समय का चक्र कह सकते,समय सब कुछ बदलता है।।

जनश्रुति कभी नवपीढियों का,था मात्र ज्ञान-साधन।

समय का चक्र है, सब आज, सुन,पढ़, देख लेता है ।।

दिखाने का बताने का,आज व्यवसाय होता है।

असर दर्शक पे क्या होगा, सोचा कौन करता है।।

बड़ी कुछ हस्तियां भी, इस काम में संलग्न रहते हैं।

मिलावट झूठ-सच का कर, सबों को बड़गलाते हैं।।

युधिष्ठिर आज दुनिया में, बहुत से लोग बनते हैं।

बिना समझे बुझे गुण को ,झूठ-प्रचार करते हैं ।।

‘अश्वत्थामा हतो’ का अर्ध्दसत्य ,एक बार जो था कहा।

युधिष्ठिर आज पैसे ले , कथन दिन- रात कहता है।।

गरिमा खुद की खो देता , प्रतिष्ठा भूल जाता है ।

दौलत बनाने का हवस , सब कुछ कराता है ।।

ऐसे लोग अपने पथ से जो, भ्रमित रहा करते ।

अर्जित पूर्व के सम्मान, को बदनाम करते हैं।।

सफल एक ज़िन्दगी का अर्थ तो , दौलत नहीं होता।

साधन मात्र है दौलत , साध्य हरगिज़ न ये होता ।।

आज पर बन गया है ज़िन्दगी का,साध्य ही दौलत।

होता ही नहीं कोई काम, चाहे कोई, बिन दौलत ।।

व्यवस्था ही हमारे देश की, आज बिगड़ी है ।

शिक्षा हो जहां मंहगा, शरम की बात कितनी है।।

शिक्षा को सुधारो, कर्णधारों, देर मत कर अब ।

हद से ही गुजर जब जायेगी, फिर क्या करोगे तब।।

कभी हम रह चुके हैं विश्वगुरु,पढाया वि्श्व को हमने।

पुनः हासिल करें सम्मान वह, जो खो दिये हमने।।

बदलेगा तभी स्वरूप.

चांद की चांदनी स्निग्ध, उतर आई धरातल पर।

तम को दूर कर अपनी प्रभा से,रौशन धरा को कर।।

जाने तम कहां भागा, चांद की चांदनी से डर।

जा छिपा होगा कहीं ,निज आबरू लेकर ।।

अंधेरा यूं नहीं भागा, विवशता आ गया उनपर।

कुटिलता जा कहीं छिपता, किसी सज्जन के आने पर।।

दुर्जन को भागना पड़ता , सज्जन के अकड़ने पर।

कहां औकात है उसकी, देख एक बार तो भिड़ कर।।

उसका काम ही चलता,डरे को ही डरा कर के ।

डट जाता अगर कोई ,तो भागता,स्वयं ही डर के।।

अन्याय के प्रतिकार जो, करते नहीं डट कर।

बढ़ावा ही उसे देते, जो खुद भागते कट कर।।

भिड़ना सीखिए अन्याय से,कफन को बांधकर सर पर।

भागेगा वही खुद आपको , डरे नजरों से देख कर ।।

बिना भय प्रीत होती ही नहीं, गये हैं विद्वजन कहकर।

कथन है सत्य शत-प्रतिशत , गये जो वे हमें कह कर।।

शीतल चांदनी में दम , बहुत ज्यादा नहीं दिखता।

पर तम भागता भयभीत हो , मुठभेड़ न करता ।।

जो चलते सत्य के पथ पर, पथिक बैजोर हैं होते।

काया कृश दिखा करती ,शक्ति के स्रोत पर होते।।

जिधर बढ़ते कदम, हैं लोग उनके साथ हो लेते ।

उनके सत्यपथ का अनुसरण , सब लोग कर लेते।।

भय भागता उनसे, उन्हें छू भी नहीं पाता ।

उनकी शक्ति अंतः की, नजर जो है उसे आता।।

तूफां देखकर उनको ,अपना पथ बदल लेता ।

उधर से वह गुजरने का,जुटा हिम्मत नहीं पाता।।

खुदा के ही दिए वरदान से , गर काम ले लेते।

कुकर्मी हम न बन पाते , घृणित अपराध न होते।।

हुई जो भूल हमसे, हम सुधारें सब उसे अब भी।

बदलेगा तभी स्वरुप ,समाज आगे बढ़े तब ही ।।

बातें बताने के लिए .

बचा ही अब क्या पास मेरे, आगे बताने के लिये।

बातें तो सारी कह दिया,रहा ही क्या छिपानेके लिये।।

जो चलतेचाल रहते रात दि‌न,किसीको फंसानेके लियै।

पांसा खुद पलट जातीतो भागते,गर्दन बचाने के लिए।।

रिश्तेदार को कभी ढ़ूढ लाते,घर बचाने के लिये ।

आकर छिड़क पेट्रोल देते,वे धधक जाने के लिए।।

रिश्तेदार तो मिलते अनेकों,पर धमाल करने के लियै।

मामला कहीं गयी अंटक, झट कर कटाने के लिए ।।

जमघट सदा चमचों की रहती, जरुरत क्या बुलाने केलिये।

जरूरत हो अगर ख़ोजेन मिलता,जनाजा उठाने के लिए।।

दीपक जलाते लोग ,घर रौशन कराने के लिये ।

क्या कोई सोचता दीपक जला है,घर जलाने के लिये।।

करते भरोसा दोस्त पर,दुर्दिन में साथ के लिये ।

लगाये घात क्या बैठे रहेगें,लाभ उठाने के लियै??

आता समझ में कुछ नहीं, अपना कहें हम किस लिये।

दुश्मन से भी बदतर निकलते,अस्मत डुबाने केलिये।।

संसार अब ना रह गया,सज्जन के रहने के लियै।

परिवेश केवल है बचा ,शैतान दुर्जन के लिए।।

दोस्त , रिश्तेदार पर, भरोसा न ज्यादा न कीजिए।

सब दांत हाथी का ये होतै ,सिर्फ दिखाने के लिए।।

अपनी बात पर कहता है सिनहा,ध्यान देनेके लिये।

स्वावलम्बी बनने का सदा,प्रयास करने के लियै ।।