जिस डाल पर बैठा उसे ही काटते.

जिसने भी हो दुनिया बनाई, जानें नहीं वह कौन होगा?

भरदम पुकारे जोर दे, होगा वहीं पर मौन होगा ।।

कहता नहीं वह सिर्फ सुनता,पर बात कहते लोग ऐसा।

अटकलें सब हैं लगाने ,देखा किसी ने तो न ऐसा ।।

कुछ लोग कहकर प्रकृति,तुमको तुम्हारा नाम देते।

सर्व श्रेष्ठ रचनाकार तुम,हर चीज का ये लोग कहते।।

नाम दे कुछ भी पुकारे , पर रचनाकार उनको मानते।

दुनिया बनाई है उसी ने ,यह बात सब ही जानते ।।

सबलोग सुनते आ रहे, देखा उन्हें तो है नहीं ।

ढंग कथन का लोग का , कभी एक तो होता नहीं।।

सिर्फ सुनी गयी बात पर ,सब को भरोसा तो नहीं।

विज्ञान कहता शोधकर ,शोधे बिना तो कुछ नहीं।।

हम प्रकृति के काम में , बाधायें कम नहीं डालते ।

निर्विघ्न कुछ देते न करने, पग पग आरंगा डालते ।।

करती है जो भी प्रकृति , सब की भलाई के लिये ।

उसने किये निर्माण जिताने ,जीवों की रक्षा के लिये ।।

पर जीव समझता है नंही , बर्बाद करता खुद उसे।

जिस डाल पर बैठा अकड़ कर,काटता वह खुद उसे।।

भोगना पड़ता उसै ही, अपने किये कूकर्म का फल।

फिरभी नहीं वहहै सम्हलता ,लेता सबक उससेन बिल्कुल।

साधन दिया जो प्रकृति,हम नष्ट खुद करते उसे।

पड़ता भुगतना फल कियेका,पर गालियों देते उसे।।

स्वयं करते भूल हम , तोहमत लगाते और को।

दिन-रात करते गलतियां ,गाली सुनाते और को ।।

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