सहन करना ही पड़ता है

जहां में कौन नहीं, कांटों का चुभन सहता है।

कोमल गुलाब को , कांटों का दंश मिलता है ।।

बिरले हैं दुनियां में जिन्हें,सदा फूलों का सेज मिलता है

अक्सर कहां खुशनसीब ऐसा,सब किसीको मिलता है

जो जितना होते बड़े ,सहन उतनाही करता पड़ता है ।

जरूरत पर हलाहल पान भी,उन्हें ही करना पड़ता है।।

सहन करना उन्हें पड़ता , लोगों की भला की खातिर।

ईशू सा जान देकर भी भला , करना ही पड़ता है।।

बापू क्या लिया इस देश से,देकर ही गये केवल ।

पर बेवजह कुछ सिर फिरों का,सुनना ही पड़ता है।।

अच्छे काम की अच्छाई, सब के मन न भाता है।

बिच्छू को बचाने में, डंक सहना ही पड़ता है ।।

जमाना हो गया बेदर्द, हृदय पाषाण का लगता।

बेरहमी का सबों का खामियाजा,भुगतना ही पड़ता है।

दवा कोई तो दर्देदिल का , देता नहीं कभी भी ।

दर्द घुट-घुट सहें चाहे , सहन करना ही पड़ता है।।

आज आदत सी हो गयी है,शिकायत करने कराने की।

चाहे कोई कुछ कर दे,शिकायत आती ही आती है।।

भला करदे,बुरा करदे, मतलब यह नहीं रखता ।

आदत है शिकायत की,वही बस करनी पड़ती है।।

अधिकतर लोग ऐसे जो ,शिकायत ही जिन्हें आती।

पर सबों को साथ में लेकर, बढ़ना ही पड़ता है ।।

दूरदर्शन पटना में कविगोष्ठी

दिनांक 25 नवंबर, 2019 को दूरदर्शन पटना में एक कविगोष्ठी के कार्यक्रम की रिकार्डिंग सम्पन्न हुई, जिसमें भाग लेने का एवं कवितापाठ करने का अवसर मिला। इस कार्यक्रम का प्रसारण आगामी 2 दिसंबर, 2019 को अपराह्न 1:30 बजे निर्धारित है। आप सब से अनुरोध है कि कृपया इस कार्यक्रम को देखने-सुनने हेतु थोड़ा समय निकालें!

धन्यवाद!

दिनांक 25/11/2019 को पटना दूरदर्शन के स्टूडियो में आयोजित कविगोष्ठी में हिस्सा लेते हुए

जिस डाल पर बैठा उसे ही काटते.

जिसने भी हो दुनिया बनाई, जानें नहीं वह कौन होगा?

भरदम पुकारे जोर दे, होगा वहीं पर मौन होगा ।।

कहता नहीं वह सिर्फ सुनता,पर बात कहते लोग ऐसा।

अटकलें सब हैं लगाने ,देखा किसी ने तो न ऐसा ।।

कुछ लोग कहकर प्रकृति,तुमको तुम्हारा नाम देते।

सर्व श्रेष्ठ रचनाकार तुम,हर चीज का ये लोग कहते।।

नाम दे कुछ भी पुकारे , पर रचनाकार उनको मानते।

दुनिया बनाई है उसी ने ,यह बात सब ही जानते ।।

सबलोग सुनते आ रहे, देखा उन्हें तो है नहीं ।

ढंग कथन का लोग का , कभी एक तो होता नहीं।।

सिर्फ सुनी गयी बात पर ,सब को भरोसा तो नहीं।

विज्ञान कहता शोधकर ,शोधे बिना तो कुछ नहीं।।

हम प्रकृति के काम में , बाधायें कम नहीं डालते ।

निर्विघ्न कुछ देते न करने, पग पग आरंगा डालते ।।

करती है जो भी प्रकृति , सब की भलाई के लिये ।

उसने किये निर्माण जिताने ,जीवों की रक्षा के लिये ।।

पर जीव समझता है नंही , बर्बाद करता खुद उसे।

जिस डाल पर बैठा अकड़ कर,काटता वह खुद उसे।।

भोगना पड़ता उसै ही, अपने किये कूकर्म का फल।

फिरभी नहीं वहहै सम्हलता ,लेता सबक उससेन बिल्कुल।

साधन दिया जो प्रकृति,हम नष्ट खुद करते उसे।

पड़ता भुगतना फल कियेका,पर गालियों देते उसे।।

स्वयं करते भूल हम , तोहमत लगाते और को।

दिन-रात करते गलतियां ,गाली सुनाते और को ।।

      हाल यह कश्मीर का

कश्मीर-जम्मु रह गया,बनकर खिलौना लोग का।

वरिष्ठ नेता दैश का, या समकक्ष वैसे लोग का ।।

भूल नेतागण किया ,सोंचा न ज्यादा दूर तक ।

खुद बात को हल्का लिया ,सोंचा नहीं गहराई तक।।

जिनको समझ थी बात की , बिरोध उन्होंने जताया।

दूर दिखती हुई समस्या ,प्रतिपक्ष भी उनको दिखाया।।

जो आकण्ठ जिद में लिप्त होते,सुनते कहा है औरका।

लाख दे कोई मशविरा ,सुनते न कुछ भी और का।।

जिद भी गजबकी चीज होती,घातक बड़ा हरलोग का।

ले डुवोता है उसे , नुकसान करता लोग का ।।

मस्तिष्क में जबभी जा घुंसे,यह रोग जिस इन्सान को।

नुकसान ही नुकसान करया,यह शत्रु उस नादान को ।।

आजादतो भारत हुआ था,फिर क्यो विभाजन देशका?

समस्त भारत एक था, टुकड़ा किया क्यों देश का ??

यह विभाजन चन्द नेता ,की नहीं क्या देन है ?

पाकिस्तानका बनना नहींक्या,उस साजिशीका अंग है?

तोड़ डाला देश को,हम बंट गये दो खण्ड में ।

तोड़ भी ऐसा दिया ,कि फिर मिले नहीं संग में ।।

विभेद कुछ ऐसा कराया,पैदा करा दी शत्रुता ।

लड़ता रहे यह सर्वदा , हो ही नहीं कभी मित्रता ।।

संसारके नक्शेमें फिर से ,भारत का अपना नाम होगा।

विश्वगुरु के रूप में ,फिर से पुनः विख्यात होगा ।।

आज भी इस देश का, कर्मठ कोई नेता बने ।

जिनमे भरा ईमान हो, ले देश को आगे बढे ।।

सत्पथ से जो खुद ही चले ,औरों को भी लेकर बढ़े।

जनता करेगी अनुशरण,फिर देश सोने का बनें ।।

यह कश्मीर अब फिर से बनेगा ,स्वर्ग भारत दैश का।

होगी जहां अनुभूतियां, धरती पे पूरे स्वर्ग का ।।

किसे बिसारूं.

किसे पुकारू, किसे बिसारू,समझ नहीं मन पाता है।

कैसै भवसागर पार करूंगा,थाह नहीं मन पाता है।।

जिधर फेरता नजर, सामने भवसागर ही दिखता है।

कहीं किनारा नजर न आता, मन मेरा घबराता है ।।

कोई सहारा देने वाला, ना ईर्द -गीर्द मे दिखता है।

बार-बार मै तुझे पुकारुं , उचित नहीं यह लगता है।।

सबकुछ तुमने दे कर भेजा,फिर भी दिल क्योडरता है।

नासमझी की हद करदी,यह भूलभी मुझको खलताहै।।

जब हाथ तेरा है मेरे सरपर,ब्यर्थ कहीं पर डरना है।

निर्भिकता सै सत्पथ पर ,अविरल बढ़ते रहना है।।

अपना काम मुझे है करना,क्यों फिक्र आगेका करनाहै।

स्वयं सोच कर हमें कहेगा,क्या आगे अब करना है ।।

क्या करना ये मुझे बता,उसकै आगे क्या करना है।

निर्देशन करता है करदे,अब कैसा रोल निभाना है।।

तुम निर्देशक मैं कलाकार,मुझे कला सिर्फ दिखलानाहै

तुम्ही जानते आगे मुझसे,कैसा रोल कराना है।।

कलाकार भी तुम्ही बनाया ,रचना भी सारी तेरी है।

जिसका रोल मिलेगा मुझको,सकुशल मुझे निभाना है।

पात्र अनेकों तुम्ही बनाये,सब को कुछ तो करना है।

क्या करना है तुम्हें पता है,समझो बस कुछ करना है।।

ख्याति दो या कुख्याति,पर तुझको ही देना है।

तेरी मर्जी जो भी दे दो, शिरोधार्य मुझे करना है।।

क्या करना है, मुझे पता है, ब्यर्थ मेरा कुछ कहना है।

मैं अज्ञानी फिर भी कहता ,बिन कहे शांत न रहना है।।

मुक्तक

१८/११/२०१९

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(क)

तन की शोभा लोग देखते, मन की देख नहीं पाते‌ ।

मन की आंखें खोल देख तो , स्पष्ट दिखाई देते ।।

भला बुरा मन को ही लगता,मस्तिष्क सोंच बताते।

आंख,देख सम्बाद पठाते, बाकी सब कुछ मन करते।।

(ख)

कौन किसे सुन्दर लगता है, किसे असुन्दर लगता।

पसंद अलगहै सबकी अपनी,कब कौन किसे मनभाता

निर्माता तो एक सबों का ,सब को यही बनाता ।

कलाकार तो ठीक बनाता,दर्शक समझ न पाता।।

(ग)

नहीं प्रेम की खेती होती ,न वन में कहीं उपजता ।

नहीं प्रेम में दौलत लगता, मुफ्त सबों को मिलता ।।

फिर भी स्नेह को बांट न पाते,कैसा पत्थर दिल तेरा।

साथ नहीं कुछ भी जाता , यही पड़ा सब रह जाता ।।

घर हो किराये का .

किराये का घर का ,मजा ही कुछ और है।

न रंग पुताई की चिन्ता ,न टूटने का भय है ।।

मस्ती से रहिए , सिर्फ दे कर किराया ।

घर वहीं लीजिए , जो मन को भाया ।।

सारे घरों पर तो , अपना ही राज ।

घर वहीं रखिये , जहां रहता हो काज ।।

अधिक दूर जानें का , रहता न चक्कर ।

कार्यालय पहुंच लें , पैदल ही चल कर ।।

खाना न पड़ता , सवारी का धक्का ।

ले सिर्फ पहुंचने में , पांच मिनट पक्का।।

बचेंगे जो भाड़ा , चुकायें घर का किराया ।

दोनों ही बचेंगे , समय और किराया ।।

किराये का घर में ही , मस्ती से रहिये ।

सारे घर है तुम्हारे , जहां जी चाहे रहिये।।

कभी मत देखिए , कि पडोसी है कैसा ।

मतलब ही क्या है , रहे चाहे जैसा ।।

बढायें न ज्यादा कभी , दोस्ती का हाथ ।

मत सोंचो पडोसी भी , रहता है साथ ।।

सदा के लिये कोई तो , आया नहीं है ?

दुनिया में कुछ भी , स्थाई नहीं है ।।

रजिस्टरी करवा ली , पर सारे हैं ब्यर्थ ।

स्थाई जिसे कहते हो , वह भी तो है ब्यर्थ।।

हम से तो अच्छा ढ़ेरों , होता है परिंदा ।

कभी कोई किसी का न , करता है निंदा ।।

खाता कहां है तो , रहता कहीं है ।

महल या ईमारत की , चिन्ता नहीं है।।

बंध कर कहीं वह तो , रहता नहीं है ।

बृक्ष सारे है उनके , आशियाना यही है।।

आजादी का जीवन तो, जीता यही है।

मुफ्त राशन भी कोटा का ,खाता नहीं है ।।

शिकवा शिकायत ,न करता किसी का ।

दोस्ती दुश्मनी भी न , करता किसी का ।।

दिल का है भोला , सदा मस्त रहता ।

खा-पी मजे से , मस्ती से रहता । ।

फिर भी किसी से , न रहता जलन है ।

मानव की तरह उनमें , रहता न छल है।।

सुकून से भरा उनका , जीवन है होता ।

कभी दुख न कहता , बैठ कर भी न रोता ।।

मस्त खुद में ही रहता ,द्वेष रखता नहीं है ।

जीव तो है ये छोटा , पर रोता नहीं है ।।

मानव से परिंदा , कहीं ज्यादा सुखी है ।

भेद अपना पराया का ,रखता नहीं है ।।

सुख से जीना जो चाहो ,तो किराये का घर लो ।

भूल से भी न सोंचो ,कि अपना ही घर हो ।।

कभी