मानव ,मानव रहा कहां?

अब तीब्र तो चलना सीख लिया, द्रुतगति अपनी पकड लिया।

जिन राहों से है हमें गुजरना,ऊबर-खाबर अवरोध भरा।।

है बहुत कठिन चलना इसपर,ले जाये गणतव्य जिधर।

कहीं भटका भी सकता है यह,ले जा सकता जिधर तिधर।।

कोई कहां बताने वाला है, जितना है सब मतवाला है।

पथ पता नहीं उनको खुद ही,पथ कहां येजानेवाला है।।

कुछ पूछो कुछ बतला देगा, उल्टा पुल्टा समझा देगा।

स्वय उसे है ज्ञात नहीं,उन बातों को यहां छिपा लेगा ।।

परिणाम भला फिर क्या होगा,पथभ्रष्ट सभी हो जायेगा।

भटकेलोगो ही भटकों को,सोंचो क्या राह बतायेगा।।

सब केवल चलते जायेगें,गणतब्य पहुंच न पायेंगे।

रहा तो तीब्र गति से चलते ,पर इर्द-गिर्द रह जायेंगे।।

कोई नहीं जाननेवाला है ,जो राह सही बतला सकता।

जिस पथपर चल कर पहुंच गये,उन राहों को दिखला सकता।।

बातें ही लोग बनाते गये , कोई नहीं जो चलकर पहुंच गये।

जो पहुंच गये वह भी शायद, नहीं अगले को बतलाते गये।।

उनकी सब बातें गुप्त रही, कुछ साथ दफन उनके हो गयी।

शनै-शनै सच्ची बातेंं भी ,आडंबर बनकर रह गयी।।

कुछ धूर्त लूटने में लग गये,राहें वे गलत बताते गये ।

भोले-भाले इन्सानों को,सत्-पथ से दूर कराते गये ।।

मानव मानव का शत्रु बना ,मानव मानव को लूट लिया।

काम,क्रोध,मद, लोभ मनुज पर,अपना कब्जा जमा लिया।।

मानव अब मानव रहा कहां,चौपायों से बेहतर रहा कहां?

चौपाया ही इनसे निकल गया ,गरिमा इनकी बची कहां??

फिर भी वे गर्व से फूले है,मद की मस्ती में डूबे हैं।

चौपायो से भी श्रेष्ठ नहीं,मस्ती में अपने फूले है।।