प्रकृति चलती अपने नियमों से।

प्रकृति मानव को भेजी है,धरती पर सब कुछ दे कर।

अति जरूरत की सब चीजें, उनके खातिर निर्मित कर।।

खाने को फल-फूल दिये, विभिन्न पेड़ पौधे दे कर ।

खट्टे मीठे स्वादिष्ठ फलों को , उनमें फलां फुला कर ।।

मीठा जल प्रवाहित करती,सरिता लाती कल कल कर।

झरनें करती नाद बनों में ,झर-झर कर झर कर कर।।

वन्य-प्राणियां आती जाती , अपनी प्रयास बुझा कर ।

निसक प्राणियां लुक-छिप आती ,पर शक्तिवान अकड़कर।।

जंगलराज इसी को कहते ,रहते एक दूजै से डरकर ।

नहीं सुरक्षित कोई रहता , उस जंगल में रहकर ।।

इन्हे मौका ज्यों ही मिल जाते ,लेते दबोच झटक कर ।

प्रवल शत्रु एक दूजे का ये ,एक साथ में रह कर ।।

आदिमानव अलग हुए कुछ , अपना ज्ञान लगा कर ।

लाया परिवर्तन रहन सहन में , अपनी ही बुद्धिबल पर।।

हम धीरे-धीर सभ्य हुए , कुछ अपना ढ़ंग बदल कर ।

कभी कभी कुछ राह बदल तो , बंदिश कहीं लगा कर ।।

बिना नियम कुछ काम न होता ,रहना पड़ता सब को बंधकर।

ब्रह्माण्ड फेल हो जायेगा , अपनें नियमों से हट कर ।।

प्रकृति सदा चला करती है , अपने नियमों में बंध कर।

उनको पालन करना ही पड़ता ,प्रतिक्षण सम्हल सम्हल कर।।

प्रकृति के राहों पर जब कोई ,आता अवरोध बनकर।

परिणाम बुरा कर देती है तब ,उनको तहस नहस कर ।।