कौन सुनेगा आप को.

कहना चाह रहे क्या किसको , कौन सुनेगा आप को ।

जिन्हें चाहते आप सुनाना, वह नहीं चाहता आप को ।।

बदल रहा अब रोज जमाना, संस्कृति अपनी भूल रहे।

पश्चिम के भद्दे रंगों में , हम अपनों को डुबो रहे ।।

अहम भरा है आज लोग में, समझता खुद को सर्वोत्तम।

श्रोता बनना अपमान समझते, वक्ता ही रहूँ ये करता मन।।

अंत नहोता कभी ज्ञान का , होता ज्ञान अनंत ।

जिसे न देखा कोई आज तक, कैसे हो सकता अंत??

सुनिये सब का,सुनकर गुनिये, मंथन मन में करिये।

निर्मल भाव से कहता जो दिल ,लगभग सत्य समझिये।।

काम,क्रोध ,मद,लोभ न कर दे ,दूषित जबतक निर्मल मनको।

शत प्रतिशत पावन कह सकते,दुनियाँ के हर मन को ।।

इस दूषित रज से इसे बचाना , बहुत कठिन है होता।

कर कठिन साधना इसे बचा ले,वह महापुरुष हो जाता।।

अपना कर्म किये जाना है , चाहे सुने न कोई ।

नहीं चाहता जो भी सुनना,सुना न सकता कोई।।

सारे सोंच बदल हैं जाते , समय बदल देता है ।

कालचक्र अपने बाहों में , जकड़ सब को लेता है ।।

नहीं कोई ऐसा है जग में., जो वंचित रह जाता ।

कालचक्र का असर कभी भी, जिसपर पर नहीं पाता।।

जितना चाहो अकड़ दिखा लो, सभी खत्म हो जाता।

जो कभी गरजता शेरों.सा,वह बिल्ली बन जाता ।।

लोग नजारा देख रहे, ये बातें नयी नही है ।

जो स्वयं देख अनदेखी करते,पड़ता फर्क नहीं है ।।