बीर भगत सिंह

हो नहीं सिर्फ तुम एक सेनानी, स्वतंत्रता के तूँ बीर सपूत।

गर्व देश करता है तुमपर. थे हृदय तेरे कितने मजबूत ।।

ऐ बीर भगत सिंह नतमस्तक हो, नमन तुझे करता हूँ ।

श्रद्धा का सुमन मैं नित्य तेरे ही, चरणों पर धरता हूँ।।

तुझे प्रत्यक्ष नहीं देखा ,तस्वीर देख ही पाया हूँ ।

ऐ बीर माँ भारत का ,मैं दिल में तुझे बसाया हूँ।।

जब देशभक्ति की हो चर्चा, तुझे खड़ा सामनें पाता हूँ।

तेरे सागर सा गम्भीर हृदय में, बडवानल एक पाता हूँ।।

धधक उठा करती दिखती ,उन बडवानल की लपटों का।

कम तेज नहीं मुखडे का दिखता ,निकल रहे उन लपटों का।।

मूछें तेरी ललकार रही , जग जा ऐ बीर जवानों ।

कर दो छलनी सीना अरि का ,कोई रोके रुको ,न मानों।।

दुश्मन तुझे चढ़ा दी फाँसी ,तुम चढ़ गये हँसते-हँसते।

पर कर गये पैदा बीर अनेंकों, जो तुम सा ही दम रखते।।

तेरी कुर्वानी ब्यर्थ नहीं गयी , नया जोश भर डाला।

जो असमंजस में पड़े हुए थे,जगा उन्हें भी डाला ।।

तुमने भय पैदा कर डाला, अंग्रेजों के दिल में ।

भारतवासी जाग उठा तब,जगा जोश हर दिल में।।

असर तुम्हारी कुर्बानी का, ऐसा बैठा ऐसा अंग्रेजों में।

मन बना लिया अब छोड़ चलें ,सोंचा उन अंग्रेजों ने ।।

बापू को इसका लाभ मिला ,गोरों भी मौका पाया।

बापू को भारत देश सौंप , वतन लौट खुद आया ।।

मुक्त गुलामी से होना , तेरी कुर्बानी का फल है ।

था बृक्ष लगाया आपनें , मिल रहा मधुर हमें फल है।।

सिवा तुझे मै धन्यवाद के , दे ही क्या सकता हूँ।

तूँने उपकार किया हमपर , उसे भूल नहीं सकता हूँ।।

मधुर सपने

ऐ सपने ,मधुर सपने , क्यों नित्य यहाँ आते हो ।

मेरी निद्रा कर भंग मुझे , जगा जबरन देते हो ।।

निद्रा आती मुझे सुलाती, भर कर आगोश में अपनी।

सो जाता हूँ बडे़ प्रेम से , थकन मिटाता हूँ अपनी ।।

देती बहुत सुकून मुझे , स्पर्श तुम्हारी ऐ निद्रा ।

देती हो आकर चैन मुझे , एहसान तेरा हमपर निद्रा ।।

गम सारे मिट जाते मेरे , बस तेरे आ जाने से ।

फिर नयी चेतना जग जाती , तेरे ही बहलाने से।।

सहन नहीं कर पाता सपना , सहन न उसको होता।

मेरी खुशियों देख जलन , उसको भरदम होता ।।

निद्रा करती प्यार मुझे ,आँखों में खुमारी आ जाती।

मेरी खुशियाँ नही स्वप्न को, कभी सहन है हो पाती ।।

पता न जाने क्यों है करता , बन मत्सर सा सपना ।

सहन नहीं होता क्यों उसको , प्यारी निद्रा अपना।।

कभी स्वप्न आकर मेरी तो , निद्रा को भंग कर जाती है।

कभी हंसाती ,कभी रुलाती , इसे तंग कर जाती है ।।

हल्की निद्रा जब आती है , सपना आ तभी धमकता है।

थकन मिटाने वालों को, जी चाहे वहीं नचाता है ।।

चीजें नयी दिखाती सपनें ,हल्की निद्रा में आते ।

कभी विभिन्न चीजें ऐसी , जो समझ न मेरे आते ।।

कभी न सम्भव होता जगमें ,सपने वहभी दिखलाते ।. जहाँ न कल्पना जाती मेरी , पर पहूँचा तुम देते ।।

बढ़ते जीवन में लोग वही , जिनके सपने ऊँचे होते।

जो भी करते निर्माण बडे़ , पहले नक्शा बन जाते ।।

पथ चयन ठीक जो कर लेते ,नहीं भटक वे पाते ।

गणतब्य उन्हीं को मिल पाता ,अथक जो चलते जाते।।

थोडा़ सोंच ले इन्सान

थोडा़ सोंच ले इन्सान , शान्ति से होश में आकर ।

हासिल क्या तुझे हो जायेगा , दुनियाँ को मिटाकर ।।

रचयिता तो तुझे मानव बनाया, जान बूझ कर ।

हर जीव से ज्यादा तुम्ही में , बुद्धि डालकर ।।

शिला आकर दिया क्या तूँ ,जगत में क्या किया आकर?

लगे बिध्वंस करनें में , खुद मानव को ही आकर ।।

तम तो आदमी के रूप में ही , भेड़िया बन कर ।

लेनें लगे चपेट में , आदमखोर खुद बन कर ।।

बता तूँने किया ही क्या , जगत में आदमी बनकर ?

नराधम कर्म सारे तुम किये , सारे ज्ञान को पा कर ।।

बिधाता सोंचता होगा न जानें ,क्या दिया ये कर ।

भेजा था इसे उसे जिस काम से,पर क्या किया आकर??

सुकर्म करनें को यहाँ , तुमको बनाया था ।

भला जा कर करोगे लोग का ,मकसद से बनाया था।

नहीं कुछ कर सके ऐसा , डूबे स्वार्थ में आ कर।

लिया जो ज्ञान था उसको लगाया ,पापमें आ कर।।

बिध्वंस करनें में लगा , निज ज्ञान को डाला ।

भलाई में लगाना था , बुराई में लगा डाला ।।

जगत बर्बाद करनें का , सदा तुम ध्यान में लग गये ।

कैसे हो तबाही और ज्यादा , अनुसंधान में लग गये।।

जो जीवन दे नहीं सकते , लेने में भिड़े हो क्यो ?

न कूबत है बनानें की , मिटाने में लगे हो क्यों ??

अच्छा कर्म करनें का , नहीं क्यों बात तुम करते ?

प्रवृत्ति छीन लेनें की , अधम क्यों ध्यान तुम धरते??

घृणा का भाव भर अपनें ,हृदय कलुषित कराते क्यों?

भटकों को अधिक भटका ,पाप मे डुबते हो क्यो ??

भटकों को दिखाया है , सदा से रास्ता हमने ।

सत्य ,अहिंसा पाठ , सब को भी दिया हमनें ।।

जो आवेश में होते , नहीं कुछ समझ वे पाते ।

दिखायें लाख सुन्दर रास्ता , पर चल नहीं पाते ।।

विवेक गुस्से से उनका , खत्म हो जाता ।

अच्छी बात भी कहिये ,नहीं सुनना है चाहता

किसे सुनाऊँ मन की बातें

किसे सुनाऊँ मन की बातें ,कौन सुनेगा मेरा ।

जिसे सुनाऊँ ब्यथा हृदय का,माखौल करे सब मेरा।।

घुटन तेज होता रहता ,पीड़ा भी मन की बढती जाती।

मन ब्याकुल हो खोज रहा,बेचैनी भी कम नहीं पाती ।।

बची एक मनमीत मेरी, वह मेरा जीवन साथी ।

सुनती और सुनाती नित दिन , कभी भी नहीं अघाती ।।

सिर्फ उसी से कह पाता हूँ ,अपनी मन की बातें ।

बहुत भरोशा उसका मुझपर , कट जाती है दिन रातें।।

सदा नसीहत देती रहती, सदा नसीहत सुनती ।

सुनने और सुनाने में ही , जीवन नैया चलती ।।

युग नित्य बदलता ही जाता ,मतभेद बढा अब जाता ।

तलाक नित्य बढ़कर ऐसा , संकेत नहीं क्या देता ??

शक होना भी स्वाभाविक है ,बन्धन का ढीला होना ।

गर और यही बढ़ता जाये , तब तय है ऐसा होना ।।

फिर नहीं जानवर का सा जीवन,मानव का हो जायेगा ?

जब सबकुछ बंधनमुक्त रहेगा , तो फर्क कहाँ रह जायेगा।।

फिर सुनना क्या ,सुनाना भी क्या, कुछ बचा नहीं रह जायेगा।

शिकवे और शिकायत करना , सभी खत्म हो जायेगा ।।

मानव फिर स्वयं अकेला होगा, नर और नारी दोनों ।

चौपायों सा कहीं बिचरने ,लग जायेगा दोनों ।।

सब जीवों में श्रेष्ठ नहीं, मानव फिर कहलायेगा ।

ऐसी हालात हो जहाँ कहीं, मानवता क्या बच पायेगा??

हम पुनः घिसक पीछे आदिम ,बनने की ओर न जा रहे?

बढ़ना क्या आगे कह सकते ,नहीं क्या पीछे जा रहे ??

स्वयं सोंचना होगा सब को , मस्तिष्क पर जोड़ लगाये।

मंथन कर ले पहले मन में , फिर आगे कदम बढ़ायें ।।

लौहपुरुष, सपना तेरा साकार हुआ.

सरदार पटेल बल्लभ भाई, सपना तेरा साकार हुआ।

ऐ लौहपुरुष तेरा शेष कर्म,लगभग वहभीपूर्ण हुआ।।

सुकून मिला होगा तुमको , तीन सौ सत्तर हट जानें से ।

माँ भारत की आँचल से,उस धब्बे को मिट जाने से ।।

यो समय बहुत ज्यादा लग गये, इन बातों को सल्टाने मे ।

थी सिर्फ कमी इच्छाशक्ति की,इस धरा को स्वर्ग बनाने में।।

करना माँफ मुझे माँ भारत ,बहुत बिलम्ब हुआ मुझसे।

क्षमायाचना करता हूँ ,करबद्ध हो कर मैं तुमसे ।।

एक भूल बहुत भाड़ी हमसबने ,नासमझी में कर डाली।

विलंब तेरी ईच्छा पूर्ति में , काफी हमने कर डाली।।

विलंब हुआ,हमें माफ करें, करबद्ध प्रार्थना करता हूँ।

क्षमा करें मेरी गुस्ताखी को,नम्र निवेदन करता हूँ ।।

तब समय नहीं लगना था ज्यादा,दो चार दिन ही था कफी।

पर समझ न पाये पंडित नेहरू, हालांकि थी गैर ईन्साफी ।।

थे पाँचसौबासट टुकड़े तब, सबको साथ मिलाया ।

इन टुकड़े को बाँध साथ एक, भारत देश बनाया ।।

अडचन कितने आये मग में , सबसे स्वयं निपटकर।

लौहपुरुष ने दम मारा था, भारत एक बनाकर ।।

उपर वाले को पडी जरूरत ,कुछ अड़चन था सुलझाना।

गये पटेल जी हमें छोड़कर, आया जब उन्हें बुलावा ।।

हमें छोडकर स्वर्ग गये पर ,कृपा न करना भूलें ।

समय विषम जब आन पड़े ,निर्देश न देना भूलें।।

मुक्तक

(अ)

चाहे तराशें लाख शीशा , हीरा तो बन पाता नहीं ।

खर को रगड़ रगड़ कर धोवे ,घोड़ा बन जाता नहीं ।।

प्रकृति कुछ को बना ,संस्कार भर कर भेजती ।

स्तर विना दीवार पर भी ,रंग चढ़ पाता नहीं ।।

(ब)

सखा जिसे हो कर्ण सरीखे ,काका संग बिदुर सा ।

भीष्म पितामह रक्षक जिनको, मिले गुरु द्रोणा सा ।।

आँखों दैखा हाल बताते ृृ रहे संग संजय सा ।

संग नही थी नीति केवल , खाया दुर्योधन मुख का ।।

(स)

बिना नीति के ऱाज न चलता , बुनियादें हिलने लगती ।

विना रीति कुछ काम न होता, हालात बिगड़ने लगती ।।

दुनियाँ भी चलती नीति से ,नियमों का पालन करती ।

गर गयी टूट नीति का बंधन,दुनियाँ कब की मिट जाती।।

(द)

मुकद्दर जो बनाते हैं , न जाने क्या बनाते हैं ।

किसी को सेज फूलों की , कुछ विन बिस्तर ही सोते हैं।।

कोई देन किस्मत की बताते ,करते कर्म की बातें कोई।

जिनको जो समझ आता , वही अटकल लगाते हैं।।

^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^

मुक्तक.

(क)

चादनी अपनी दिखा तूँ, चाँद सब को फाँसते ।

अपना दिखा कर रूप नकली,भ्रम में सबको फाँसते।।

सच्चाई तो सबको पता,इसमें तेरा अपना नहीं कुछ ।

क्योँ मोहिनी का शस्त्र ले , डाका सबों पर डालते ।।

(ख)

दिल लगाना या चुराना ,हर आदमी की बात है।

निश्चित किये का फल मिलेगा, यह भी नहीं अज्ञात है।।

कर्तव्य जो अपना निभाते , निष्ठापूर्वक ईमान से ।

फल नहीं उनको मिले , यह असम्भव बात है ।।

(ग)

होता कठिन सच्चाई का पथ,.दुर्गम अति यह रास्ता ।

इस राह पर चलते उन्हें , भ्रष्टाचार से न वास्ता ।।

हर कदम जूझना , पड़ता उन्हें कठिनाइयों से ।

कलियुगी अभिशाप होता , आज है ये रास्ता ।।

क्यों असाध्य को साध रहे.

कर पुष्प चयन तेरी बगिया का, मैं लेने आया हूँ ।

मत मान बुरा ऐ बनमाली, मैं क्षमायाचना कर आया हूँ।।

बगिया तो सारी तेरी , सभी पुष्प भी तो तेरे हैं ।

तेरी ही तुझे समर्पित कर दूँ , बोलो क्या उसमें मेरे हैं??

तेरी चीजें तुझे समर्पित, करता करके खुश हो जाता।

नादानी यह समझ न पाता , क्या इससे हासिल होता??

इस नादानी का बुरा न मानों , क्या करूँ समझ में न आता।

ऐ प्रकृति यह सब कुछ तेरा ,पर वहम मुझे क्यों हो जाता ।।

मानव मन जिसको ढ़ूंढ़ रहा ,पर कहाँ उसे मिल पायेगा ?

वह तो सब में घुला -मिला है , अलग नजर नहीं आयेगा।।

क्यों खोज रहे मेदिर के बुत में ,या मस्जिद की दीवारों में।

जो सर्वब्यप्त है कण-कण में , उन्हें क्यों जाना गुरुद्वारों मेंं।।

क्यों मंदिर ,मस्जिद,गुरूद्वारा जा ,समय को अपना गँवा रहे।

ब्रह्मांड किये है लय जो खुद में ,उसको दरबा में कैद किये ।।

क्यों असाध्य को साध रहे,जिस प्रकृतिको कोई खोज न पाया।

आये चले गये कितनें ज्ञानी, कहाँ आजतक बता ये पाया ।।

यह विषय गहन है, कठिन बहुत है इसका थाह लगाना ।

विज्ञान अभीतक पहुँचा कितना , अभी बहुत ज्ञान है पाना।।

नहीं असंभव होता जग में ,संभव ही सबकुछ होता ।

असंभव बलबुद्धि के आगे ,अपनें घुटने टेक देता ।।

करोगे कर्म अतिउत्तम, तो वह दौरा आयेगा ।

जहाँ कहीं भी तुम जाओगे , वह तो स्वयं पहुँच जायेगा।।

रुला कर लुत्फ क्यों लेते.

दिये हो तुम सभीको दिल , लगानें क्यों नहीं देते?

लगा लेता कभी कोई , जुदाई क्यों दिला देते ??

प्रकृति यह देन तेरी है , तुम्हीं सब को बनाई है ।

जगत की चीज है जितनी , सब तेरी खुदाई है ।।

जहाँ जो कुछ बनाई है , उपज तेरे ही है दिल का ।

भला बोलें , बुरा बोलें , सभी कुछ तेरे ही मन का ।।

दिल में भावना उठता किसी का,क्या वह नहीं तेरा?

खड़कता है अगर पत्ता, बिन ईच्छा ही क्या तेरा ??

जगाते प्रेम क्यों दिल मे , मिटाते क्यों उसे खुद ही ।

मिटाना ही अगर था आप को,बनाया था ही क्यों खुद ही।।

हँसाते आप ही सबको, रुला खुद आप ही देते ।

हँसा करके, रुला करके, आप ही लुत्फ हैं लेते।।

बालक ही समझ कर आप तो, सबको रुला देते ।

रुलाकर आप ही उससे , कभी कुछ लुत्फ ले लेते।।

बुरा गर मानता बालक ,ये उसकी नासमझ कहिये ।

बात ये बालपन की है , अन्यथा कुछ नहीं कहिये ।।

बच्चे भूल भी जाते , नहीं दिल में लिया करते ।

जिद करते कभी थोडा, कभी फिर मान भी जाते।।

जगा कर प्रीत दिल में आप , ही उसको मिटा देते ।

खिलौना से रिझा बच्चे से , उससे छीन भी लेते ।

रोना अब तो बच्चे को , बडा़ ही लिजिमी होता ।

उसे तो खेलते ही खेलते , रोना तभी पड़ता ।।

यह खेल दुनियाँ का , बडा़ रोचक हुआ करता ।

दुनियाँ के सारे लोग को ही , खेलना पड़ता ।।

रूलाते प्यार में ही ,प्यार से , रोना तो उसे पडता ।

झेलता कष्ट वह थोड़ा ,मजा पर आपको मिलता ।।

चाँद हमसे दूर न अब

चाँद को थोड़ा उछल कर, हम मजे से छू चुके अब।

अपना ही साधन को लगा कर,हम वहाँ पर जा चुके अब।।

होड़ में जितने खडे़ हैं ,हम वहाँ से बढ़ गये अब ।

मार्ग की बाधाओं को , अच्छी तरह से गये समझ अब।।

हम खुद बना सकते सभी कुछ ,सिद्ध मैने कर दिखाया।

क्षमता बहुत कुछ है मेरी, संसार को कर के दिखाया।।

अग्रणी हम ज्ञान में थे ,अग्रणी फिर आज भी हम ।

गये पिछड़ थे हम कभी , पर फिर से आगे हो गये।।

विश्वगुरू थे हम कभी , प्रयास फिर हम कर रहे ।

रफ्तार तो हमनें पकड़ ली , बढ़ते उधर ही जा रहे।।

हासिल किये बिन रुक न सकता,मीशन मेरा चलता रहे।

रफ्तार भी कमने न पाये , ध्यान यह हरदम रहे ।।

विश्व पूरा एक दिन , परिवार एक बन कर रहे।

अर्जित किये गये ज्ञान से , सत्कर्म तब होता रहे।।

लोभ ,ईर्ष्या ,डाह ,अवगुण, फिर नहीं आये कभी ।

आपसी सद्भावना में ,ह्रास न आये कभी ।।

राह गौतम ने दिखाया ,हमलोग सब उस पर चलें।

सब का भरा दिल प्रेम से हो , बन्धुत्व कायम हम करें।।

श्रेष्ठ मानव जीव में था , श्रेष्ठ ही बन कर रहे ।

करुणा , दया का भाव अपना , वह लुटाया ही करे।।

प्रेम की दरिया बहे , लगाते रहे गोते सभी ।

दिल में भरा हो अमन -चैन , घृणा नहीं छूवे कभी।।

तब जिन्दगी क्या जिन्दगी, होगी जरा सोचें इसे।

क्यों प्रकृति मानव बनाई, शायद समझ पाओ इसे ।।