ऐ पथिक

ऐ पथिक यह तो बता दे , है तुझे जाना कहाँँ ?

कोई है तेरा जो पथ निहारे ,दे बता वो है कहाँ ??

दिन रात चलते जा रहे ,अविरल बिना विश्राम के ।

क्या पग तेरे थकते नहीं , जरूरत नहीं विश्राम के ??

शजरों की ठंढी छाँव में , रुकते न पल भर के लिए।

लेते नहीं क्यों झपकियाँ ,.अपनी ही सेहत के लिये ।।

भागते ही जा रहे , लेते नहीं विश्राम क्यों हो ?

हो मुसाफिर तुम कहाँ के , यह भी बताते क्यों नहीं हो??

गये भटक जो पथ कहीँ , पहुंच कहाँ पर जाआगे?

अपनी जरूरत की जगह पर , क्या पहुँच भी पाओगे??

हम सब मुसाफिर पर अजूबा, अनजान पथ पर चल रहे ।

चौरास्ता आता कहीं , भटके तो भटके जा रहे ।।

कोई बताता राह पर , अनभिज्ञ खुद रहता वही ।

अटकलों से सोंच कर खुद , पथ बताते हैं वही ।।

देखा किसी ने है नहीं , बस अटकलों की दोड़ है ।

ढोंगियों की बाढ़ हो गयी , बनता वही शिरमौर है।।

ढोंग रच कर नित नया , फाँँसते है जाल में ।

दिखला उन्हें कुछ सब्जबाग, लेते फँसा ही जाल मे।।

पथ बताता है न कोई ,सब लगे हैं फाँसने में ।

पथ तो पता खचद ही नहीं ,आता मजा है फांसने में।।

चींटियों की पंक्तियों सा , बस चले हम जा रहे ।

अनभिज्ञ राहोंं पर बढे , अनभिज्ञ जगह पर जा रहे।।

संसार के सारे पथिक का , आज ऐसा हाल है ।

गण्तब्य तक मालुम नहीं , क्या नहीं ये कमाल है।।

मानव ही रच कर ढोंग नित , मानवों को ठग रहे ।

चमत्कार का रच ढोंग नव , अपनों को अपने ठग रहे ।।

कृष्ण फिर आना पड़ेगा.

कृष्ण तुम आये न होते , क्या हाल होता लोग का ।

आतंक था सर्वत्र छाया , रहता बना भय कंस का।।

एक नाग काला कालिया भी ,आतंक यमुना का बना।

जो जीव जाता था नदी मेंं ,आहार सब उसका बना ।।

कालिया को नाथ कर , भयमुक्त यमुना को किया।

तरणी तनूजा के तटों पर , बहार नव फिर से किया।।

उठा गोवर्धन को , बचाया डूबते सब लोग को ।

इस्तेमाल छतरी कर दिखाया, नासमझ सा ईन्द्र को।।

द्रौपदी का चीर हरण , था जब सभा में हो रहा ।

बचाई उनकी आवरू , कर महसूस उनके दर्द को।।

गोपियाँ बेचैन सी , रहती इन्हीं की याद मे ।

बेचैन दिल को चैन दे , करते शमन उस दर्द को।।

कृष्ण के ही रंग में , हैं रंगे सब आज तक।

भूलना नहीं चाहते ,उनके दिये गये दर्द को ।।

नाग काला कालिया , बदला है अपनें रूप को ।

रूप को अपना बदल , अपना लिया विद्रूप को ।।

पहचान लेना भी उन्हें, मुश्किल अति अब हो गये।

कब कौन सा वह रुप लेगा, कहना कठिन है बात को ।।

कान्हा तुझे ही स्वयं आ ,समझाना पड़ेगा बात को।

मर्ज अब संगीन हो गये, निपटाना पड़ेगा आप को ।।

जल्द कर ,कर देर मत , मर्ज बढता जा रहा ।

बढ़ गये गर और ज्यादा , मुश्किल बढ़ेगा आप को।।