मैं आसमान मेंं एक पतंग

मैं आसमान में एक पतंगा, ब्योम की बातें क्या जानूँ ?

मै तो अदना सा एक खिलौना ,कोई नचाता मैं नाचूँ।।

कोई डोर पकड़ कर मुझे नचाता,मैं नाचा करता हूँ।

जिधर चाहता ले जाना , मैं चला उधर जाता हूँ ।।

उपर -नींचे ,बायें-दायें , जिधर चाहता ले जाता ।

महत्व नहीं मेरी इच्छा की,मैं आज्ञा का पालन करता ।।

अलग स्तित्व नहीं मेरा , चाहो जिससे मुझे लड़ा दो ।

जीतूँ ,हारूँ फर्क न मुझको , मर्जी तेरी वही करा दो ।।

बन्धन से मैं बँधा हूँ जबतक , आसमान मे लहराता

बन्धन-मुक्त हो जाता जब , धरती पर नींचे गिर जाता।।

बन्धन भी बहुत जरूरी होता, नियमों का पालन करना।

हुआ मुक्त बन्धन से जो भी, तय है उसका मिट जाना ।।

हो बँधा पतंग जो भी बन्धन से , आसमान मे रह पाता।

जैसे ही बन्धन टछट गया , आसमान से गिर जाता ।।

आजादी का अर्थ नहीं , सारे बन्धन से मुक्त रहूँ ।

बन्धन तो रहना ही रहना , भले उसको कुछ और कहूँ।।

सूरज ,तारे , ग्रह नक्षत्र भी ,बन्धन मुक्त नहीं रहता।

टूट जाये बन्धन पलभर भी , विध्वंस समझ लें तय रहता।।

खेल रहा कोई मुझे उड़ा कर, आनन्द उन्हें है मिलता ।

मुझे उड़ा ले जाये जहाँ भी , चिन्ता मुझे न रहता ।।

उड़ा रहा जो डोर पकड़ कर , हर तरह वही सक्षम है।

कोई दुराचारी रोके उनको , किसमें इतना दम है ।।

मैं अलना हूँ ,असक बड़ा हूँ , है शक्तिमान जो मुझे उडाता।

सर्वज्ञ वही जो उड़ा रहा , सारे खेलों को वही खेलाता ।।