तुलसी

जो स्वयं हो प्रकाश-पुँज , उसे दीपक दिखाने मैं चला हूँ।

दुस्साहस नहीं तो और क्या , जो आजमाने मैं चला हूँ ।।

‘सूर ‘ तो सूरज कहाये , तुलसी कहाये चाँद सा ।

अन्य कविगण हैं कहाँ , हो जो सूरज -चाँद सा ।।

भर दिया है रंग कैसा , रामायण को रंग से ।

भूल गये सब बाल्मीकि ,तुझको लगाया अंग से।।

सींचा जिसे था बाल्मीकि , प्रारूप अपने ध्यान से ।

भविष्य -वाणी सत्य निकली , क्या कर दिखाया ज्ञान से।।

रंग तुलसी ने भरा ,अपनी कलम का रंग दे कर।

भब्य-भवन इसने बनाया ,’रामायण’ सा नाम देकर।।

अपने ही मन मंदिर में तुलसी , राम का आयन बनाया।

सपरिवार, श्रद्धा औ जतन से ,,राम को उसमें बिठाया।।

गाथाएं सारी गाई उनकी, दोहे तथा चौपाई में ।

सोरठा व अन्य विधायें , छोड़ा न कुछ भी लिखाई में।।

यह ग्रंथ तेरा , धर्मग्रंथ , बनकर सबों में छा गया ।

जन-जन के मानस में बसा , अमरत्व उसमें आ गया ।।

जब तलक संसार होगा, तुलसी तेरा भी नाम होगा।

प्रेम ,श्रद्धा से सबों में , तेरे लिखे का ज्ञान होगा ।।