वहम.

जो दिखता वही रहता नहीं , सुनता वही होता नहीं।

इन्द्रियाँ खाती जो धोखा , दिल को हजम होता नहीं।।

हाल दिल का है अजूबा , जो समझ से परे होता ।

इच्छाओं का होता जनक यह ,पैदा अनेंको नित्य करता।।

आँखें कभी जो देखती , दिल सोंच लेता और कुछ ।

सच्चाई तो कुछ और होती ,लगता उसे पर और कुछ।।

वहम उसको लोग कहते , पर यह शिकारी है बडा ।

इन्सान की इन्सानियत , पर घात करता है बड़ा ।।

वर्बाद कितनों को दिया कर , नित्य करते जा रहा ।

फँसना न कोई चाहता पर ,बच न कोई पा रहा ।।

मीठी जहर भी असर करती , पर प्रभाव होती देर से।

बदनाम करवाता तुरत , करता वहम नहीं देर से ।।

शिकार जो हो गये वहम का ,जिन्दगी बर्वाद हो गयी।

हर कदम आगे बढ़ाना , भी नहीं आसान रह गयी ।।

होती दोस्ती बर्वाद कितनी , इस वहम के फेर में ।

कितनी गयी है जिन्दगी, इस काल के कराल मे ।।

मजबूत कर ले दिल को अपने, वहम नहीं आ पायेगा।

घुँस चुके हों जो अगर , वह भी निकल कर जायेगा ।।

मजबूत दिल में यह कभी , प्रवेश कर पाता नहीं ।

प्रयास भी उसनें किया तो , रह वहाँ पाता नहीं ।।

संयम जो रखते आप पर , भटक वे पाते नहीं ।

जिन्दगी की राह से , वह उतर पाते नहीं ।।

आगे वही इन्सान बढता , कुछ कर दिखाता है वही ।

संयम जो अपना खो दिये , कुछ भी कर पाते नहीं ।।

अपनी आँखों से देख ले.

ऐ जादूगर कुछ खेल अपना ,आज तुम हमको दिखा दो।

अपनी सफाई हाथ की , करके हमें थोडा दिखा दो ।।

डुगडुगी अपनी बजा दो , दौड़े सभी आ जायेंगेंं ।

बृद्ध ,बालक , नारी -नरों की , भीड़ सी लग जायेंगे।।

करके सफाई हाथ की , करिश्मा जरा अपना दिखा।

किंकर्तव्यविमूढ़ कर दो ,चीज कुछ ऐसी दिखा।।

भर दो नया कुछ जोश उनमे , नाचनें लग जायें सब ।

परेशानियाँँ कुछ मन में हो तो , दूर ही हो जाये सब ।।

उर्जा नया पैदा करा दो , क्लान्ति मन का दूर हो ।

जो भी दुखी होकर पड़े हों , हँसनें को मजबूर हों।।

ऐ सृजनकर्ता जादूगर , एहसान इतना तो करो ।

अपने सृजन का कुछ करिश्मा, भी तो दिखलाया करो।।

आवाज सुन तेरी डुगडुगी की ,लोग दौड़े आ गये ।

तमाशा शुरू होने से पहले , भागे हुए सब आ गये।।

यूँ खेल तो रूकता न तेरा , हरदम चला करता है ये।

पर कौन है ऐसा मदारी , जो खेल दिखलाता है ये ।।

खेल जो छिपकर खेलाता, आता नजर वह है नहीं ।

करिश्मायें उनकी हर जगह , पर स्वयं दिखता है नहीं।।

अद्भुत मदारी ,इस तरह का , देखा न कोई आजतक।

करीब रहकर दूर लगता , सुनते रहे हैं आजतक ।।

आही गये तो कुछ दिखा दो ,कुछ तो अजूबा देख लें ।

सुनते सुनाते लोग से पर , अपनी ही आँखों देख लें ।।

तुम कुशलतम है मदारी , अद्भुत तेरा संसार है ।

सारे कणों में तुम बसे हो , सारे कणों से प्यार है।।

रहस्य खुलते जा रहे.

दिल मे भरी है लाख बातें, पर बयाँ किसको करूँ ?

सम्हाल रखा हूँ जतन से , अब और आगे क्या करूँ??

जिन्दगी आगे पड़ी है , अभी बात कितनी आयेगी ।

यह भी हो सकता जरूरत , ही न उसकी आयेगी ।।

दफन भी हो गये हैं कितने , और बाकी हैं पड़े ।

क्या पता किसकी जरूरत , कब किसी को आ पड़े।।

दफन हो कर लुप्त हो गये , राज कितने दब गए ।

जिस बात की थी शख्त जरुरत, साथ कितने गये चले।।

जनश्रुतियों से काम चलता , लिपियाँ न हम थे जानते।

गूढ़ कितने दफन हो गये ,ये बात सब हैं मानते ।।

विज्ञान में हम बढ़ रहे , कुछ खोज हमनें कर लिया ।

खोज कर हम इस समस्या ,पर विजय तो कर लिया।।

मुट्ठी में हो गयी आज दुनियाँ ,चन्द दिनों की खोज में ।

लाभान्वित हम हो रहे , संचार की इस दौड़ में ।।

आसान कितना कर दिया , नजदीक हम कितने हुए।

संसार की घटनाओं से ,दिन -रात वाकिफ हम हुए।।

संसार की घटनाएं सारी , घर में ही बैठे जानते ।

जानते केवल नहीं, नजरों से अपनी देखते ।।

अब छिपी कुछ भी नहीं , रहस्य से वाकिफ हुए ।

रहस्य का पर्दा पडा था , जो दूर काफी हो गये ।।

विज्ञान बढ़ता जा रहा नित , खोज नये होते गये ।

हम जिन्दगी की खुशियाँ , आसान करते गये चले ।।

खोजना तो शेष है , अब तक न जो खोजे गये ।.

अभियान है जारी निरंतर , जो भी बाकी रह गये ।।

वक्त चाहे जो कराये .

दिल में जो कोई गम कभी , आकर बहुत सताये ।

बेरहम ,बेदर्द सा , बनकर बहुत रुलाये ।।

गमों को टालता तो सब ,इसे कोई क्यों गले लगाये।

टाले नहीं टलता पर कभी , बचता नहीं उपाये ।।

बेबसी कुछ भी कराता , क्या बेरहम है हाये ।

आता समझ में कुछ नहीं , सलटा भी कैसे जाये ।।

वक्त के आगे सभी , रहते बिवस ही लोग आये ।

देती है गुम कर हैंकडी , ठिकाने अक्ल आ जाये।।

वक्त चाहे जो करा दे , समझ तक इन्साँ न पाये ।

नृप बना दे रंक को , सर पर नजर तब ताज आये।।

हरिश्चंद्र सा नृप सत्यवादी , क्या नहीं वह कष्ट पाये ।

उतनें भले इन्सान से , काम मरघट का कराये ।।

अडिग निज पथ पर रहे , संकट तनिक ना डिगा पाये ।

कीर्ति है उनकी आज तक , धूमिल तनिक भी हो न पाये।।

दारुण-दुखों की दाह में , खुद भी अपनों को तपाये ।

दहकता -कुन्दन सी आभा , पा जगत में रंग लाये।।

चमक दुनियाँ में रहेगी , कीर्ति उन्होंने जो बनायी ।

धूमिल नहीं हो पायेगा , जैसी करिश्मा कर दिखायी ।।

ये महापुरुष जो दे गये , उन्होंने जीवन पथ दिखाये।

मानव चले इस राह पर , जीवन सफल अपना बनाये।।

मैं आसमान मेंं एक पतंग

मैं आसमान में एक पतंगा, ब्योम की बातें क्या जानूँ ?

मै तो अदना सा एक खिलौना ,कोई नचाता मैं नाचूँ।।

कोई डोर पकड़ कर मुझे नचाता,मैं नाचा करता हूँ।

जिधर चाहता ले जाना , मैं चला उधर जाता हूँ ।।

उपर -नींचे ,बायें-दायें , जिधर चाहता ले जाता ।

महत्व नहीं मेरी इच्छा की,मैं आज्ञा का पालन करता ।।

अलग स्तित्व नहीं मेरा , चाहो जिससे मुझे लड़ा दो ।

जीतूँ ,हारूँ फर्क न मुझको , मर्जी तेरी वही करा दो ।।

बन्धन से मैं बँधा हूँ जबतक , आसमान मे लहराता

बन्धन-मुक्त हो जाता जब , धरती पर नींचे गिर जाता।।

बन्धन भी बहुत जरूरी होता, नियमों का पालन करना।

हुआ मुक्त बन्धन से जो भी, तय है उसका मिट जाना ।।

हो बँधा पतंग जो भी बन्धन से , आसमान मे रह पाता।

जैसे ही बन्धन टछट गया , आसमान से गिर जाता ।।

आजादी का अर्थ नहीं , सारे बन्धन से मुक्त रहूँ ।

बन्धन तो रहना ही रहना , भले उसको कुछ और कहूँ।।

सूरज ,तारे , ग्रह नक्षत्र भी ,बन्धन मुक्त नहीं रहता।

टूट जाये बन्धन पलभर भी , विध्वंस समझ लें तय रहता।।

खेल रहा कोई मुझे उड़ा कर, आनन्द उन्हें है मिलता ।

मुझे उड़ा ले जाये जहाँ भी , चिन्ता मुझे न रहता ।।

उड़ा रहा जो डोर पकड़ कर , हर तरह वही सक्षम है।

कोई दुराचारी रोके उनको , किसमें इतना दम है ।।

मैं अलना हूँ ,असक बड़ा हूँ , है शक्तिमान जो मुझे उडाता।

सर्वज्ञ वही जो उड़ा रहा , सारे खेलों को वही खेलाता ।।

प्रकृति कर्म सदा करती.

अगला मुद्दा विश्वयुद्ध का , पानी ही है हो सकता ।

ये बातें व्यक्त किया जिसने,कथन सत्य उसका लगता।।

बनकर वाष्प मही से जल , जब आसमान में जाता।

बादल बनकर आसमान में ,सघन रूप से छा जाता ।।

फिर पानी ककी बूँदें बनकर , धरती पर गिर जाता ।

यही क्रिया पानी गिरने का ,बारिश है कहलाता ।।

प्रकृति का यह काम मही पर ,निरंतर ही चलता रहता ।

सारी ऋतुएं भी अपने ढंग से ,आता और चला जाता ।।

यह चक्र सदा चलता रहता , प्रकृति ने इसे बना रखी ।

बडे़ ढंग से नियमित अपने ,कर्मों को करती रहती ।।

बहुत ध्यान दे कर प्रकृति ने ,यह संसार बनाई है ।

शुद्ध हवा औ शुद्ध जलों का , उद्गम वही बनाई है ।।

मानव नामक जीव धरा पर ,बुद्धि ज्यादा दे रच डाला ।

सारे जीवो से अधिक बहुत , ज्ञानी इसे बना डाला ।।

प्रकृति के हर कामों में , लगा ब्यवधान यही करनें ।

अपूर्ण ज्ञान ही पाया था , पर लगा उधम वही करनें।।

प्रकृति का दोहन करनें में ,किया न तनिक रहम हमनें।

फैलाया प्रदूषण जमकर, अरि सा ब्यवहार किया हमनें।।

करनी जो हमनें कर डाली , परिणाम भुगतना ही होगा।

‘गलत काम का गलत नतीजा, हमें झेलना ही होगा।।

बहुत बिगाड़ा ,मत और बिगाड़ो ,आगे जरा सम्हल जा।

गलत करना भी आगे छोड़ो ,बिगड़ों को राह बता जा ।।

उपयोग करो पानी का हरदम, अमृत इसे समझ कर।

नहीं ब्यर्थ में इसे बहाना , या प्रदूषित ही कर कर ।।

कवि-दिल.

प्रेम भरा होता दिल कवि का , घृणा तनिक न होता।

कोमल भाव भरे हैं होते , अतिसय निर्मल होता ।।

कहते समाज का दर्पण होता , प्रतिविम्ब इसी में दिखता।

दर्पण केवल नहीं, भविष्य कैसा होगा वह दिखता।।

दर्पण तो दिखलाता केवल , बाहर से जो दिख पाता ।

अन्दर क्या क्या भरा पड़ा , उनको कहाँ नजर आता।।

शूक्ष्म दृष्टि होती उनकी , अति दूरदृष्टि भी होती ।

सामान्य जनों को नजर न आता,पर उन्हें दिखायी देती।।

पहुँच वहाँ भी हैं जाते , ज हाँ नजरें नहीं पहुँच पाती।

कल्पना दृष्टि से उनको , चीजें सभी झलक जाती ।।

कवि कल्पना की नजरों से ,सबकुछ देख लिया करता।

उन्हे पेड़ की छावों में भी ,नल दमयन्ती दिख जाता ।।

कभी उड़ाने भर लेता है ,सूर्य ,चन्द्र ,ग्रह-उपग्रह का ।

अंतरीक्ष में रहनेवाले , छोटे-बड़े नक्षत्रों का ।।

दिशानिर्देश कराते आये , बडे़-बडे़ क्षत्रप का ।

गंभीर समय में पथ-निर्देशन , किया है बडे़ बड़ों का ।।

काम कवि का सदा रहा है , उत्तम राह दिखाना ।

शक्ति निहित हो जिनमें उनको ,नीतिगत राह बताना ।।

सदा सदा से तब के कवि गण ,अपना धर्म निभाया ।

पड़ी जरूरत तो उन्होंने, अच्छा सा मार्ग दिखाया ।।

धर्म सदा से रखा इसनें , कुछ समाज को देना ।

कभी प्रयास नहीं करता वह,कुछ समाज से लेना।।