मानव- जीवन

मानव जीवन का कालचक्र, बिन रुके चला जाता है।
क्षण-प्रतिक्षण अपनें पथ पर,बढा़ चला जाता है ।।

शैशव बन धरती पर आते, बढ़जाते मानव बन जाते ।
बढ़ते जाना ही जीवन है ,रुक जाते जो मर जाते ।।

आयु बढ़ता है या घटता ,कहनें का ढंग अलग होता ।
कहता कोई घटता जाता ,कोई कहता बढ़ता जाता ।।

जो रौनक थाअब रहा कहाँ,गरिमा थी अब बची कहाँ?
हुई भग्न महल की दीवारें,गुम्बज थे उग गये पेड़ वहाँ।।

जब बृद्धावस्था आ जाता,बदल सभी कुछ है जाता।
जो था रौनक अब रहा नहीं,लाचार बनासा दिख जाता।

बचा एक संबल होता, याद जवाँ की रह जाती ।
उन मीठी मीठी यादों में ,पीड़ा ही मनकी मिट जाती।।

उन बातों में खो जाना है, अपनें दिल को बहलाना है।
नयी पीढ़ी का कौन भरोसा,हरगिज ना चोंच लगाना है।।

है कौन ठिकाना मित्र मिले,जिससे मन की बातें कहलें।
उससे तो यह उत्तम होगा,खुद कहलें,खुद ही सुन लें।।

गर साथ रहे जीवनसाथी, जीना तब होता आसान।
धन्य भाग्य कहलाओगे , समझे जाओगे भाग्यवान।।

अगली पीढी सम्मान करे,उनसे गर थोडा़ प्यार मिले।
तबतो किस्मतका क्या कहना ,क्योंना उसपर नाज करें।।

तब धन्यपुरुष कहलाओगे,खुद किस्मत पर इठलाओगे।
सम्मान करेगें लोग सभी, सुख का जीवन जी पाओगे।।

कैसा जमाना आ गया.

कैसा जमाना आ गया, गयी लुप्त हो कृतज्ञता ।
भर गयी  सब लोग में ,   पूरी तरह कृतघ्नता ।।

दुर्भिक्ष मानों हो गया , कृतज्ञता का आज है ।
धोखाधड़ी ,चमचागिरी का ,हो गया अब राज है।।

कृतज्ञता को भूल सब , कृतघ्नता को मान देते ।
साध लेते स्वार्थ अपना , फिर नही सम्मान देते।।

सम्मान को तो छोडिये ,पहचान से इन्कार करते।
नजरों में आ जाते कहीं,नजरें उधर से फेर लेते।।

अति ब्यस्तता का ढोंग रच,’देखें नहीं’का पोज देते।
फिर भी अगर कुछ पूछडाला,अच्छा बहाना ठोक देते।।

सारा जमाना आज का, कृतघ्न है और हो रहे ।
मूढ का पर्याय अब, कृतज्ञता को कह रहे ।।

कृतज्ञता तो अब बेचारा ,बन यहाँ पर रह गया ।
कृतघ्नता का राज है अब ,श्रेष्ठ वही अब बन गया।।

कृतघ्न करते चापलूसी ,मक्खन लगाना जानते ।
मधुर बातें खूब करते ,लोग सब को फांसते ।।

फाँस कर उनलोग को ,मतलबों को निकाल लेते।
बाकी बचे कचरों को वे ,डस्टबीन में जा डाल देते।।

कृतज्ञता कृतघ्नता का ,दौड़ तो चलता रहा है ।
दुनियाँ बनी दोनों मिलाकर,साथ ही चलता रहा है।।

कृतज्ञता सदगुण भरा ,मानवता फलता यहाँ है ।
कृतघ्नता बिपरीत होती ,मानवता मरता यहाँ है ।।

ये जिंदगी है क्या?

होता कुछ कदम का फासला,बस जिन्दगी और मौतका।
पहला कदम तो जिन्दगी, अगला कदम तो मौत का।।

कोई अछूता तो नहीं, इस जिन्दगी का खेल से ।
सत्य बस केवल यही, अवगत सभी इस खेल से ।।

है जिन्दगी क्या मौत क्या ,देखते सब लोग हैं ।
रहस्य क्या है खेल का , जानता ना लोग है ।।

अज्ञानता का तम भरा ,डूबा हुआ संसार है ।
ढ़ूँढ़ा न कोई आजतक , कैसे बना संसार है ।।

प्रयास तो करते रहे , रहस्य से अनभिज्ञ रहे ।
गूढ क्या उसमें निहित , ज्ञात हम करते रहे ।।

पर बात सारी जानना भी,क्या बहुत आसान है?
गर्भ में उसके न जानें ,कितने पड़े विज्ञान है ।।

पर खोजनें में जो भिड़े ,खोज ही लेते उसे ।
आवरण को तोड कर ,अनावरण करते उसे ।।

दुनियाँँ बहुत ही है बडी ,हमलोग जितना जानते।
उसके भी आगे और क्या है ,कुछ लोग शायद जानते ।।

सृष्टि बनाई चीज सारी , पर हम जानते ही क्या?
कैसे बनाई है उसे , हम सोंचते भी क्या ??

इस जिन्दगी और मौत का ,रहस्य क्या हम जानते?
जो अटकलें है लोग का ,सिर्फ वही हम जानते ।।

विज्ञान का उतना पहुंच ,अबतक न हो पाया यहाँ।
पहुँचेंगे जानें कब तक , मालूम भी हमको कहाँ ।।

जरूर पहुँचेगें वहाँ तक, अटल ये बिश्वास है ।
रहस्य भी मिल जायेगा, दिल में भरा ये आश है।।