न चढ़ती काठ की हाँडी दोबारा.

कहते काठ की हाँडी ,दोबारा फिर नहीं चढ़ती ।

फलती एक बार कदली ,बारम्बार न फलती ।।

चपला मे चमक होती , पर पल दो पलों की ही ।

चमक में तीब्रता होती, पलों में कुछ नही दिखती।।

धोखा दे ठगी कर लोग ,   दौलत तो बना सकते ।

चमक चलती नहीं ज्यादा, पकड़ में आ ही है जाते।।

समझ लब लोग हैं जाते, फिर क्या हाल हैं करते ।

कचरे सा उठा डस्टबीन में ही,        डाल है देते ।।

जो होते आँख का तारा , घृणा का पात्र बन जाते ।

दिखते कभी आते ,   तो अपना पथ बदल लेते ।।

श्रद्धा जो बनी थी , परिणती, घृणा में हो जाती ।

कभी थे पुष्प बरसाते,  बदले  रोड़े है बरसाती ।।

भांडा फूटता है जब ,    सब श्रद्धा बदल जाते ।

बदल कर ही वही उतनी , घृणा का रूप ले लेते।।

धोखा जो दिया करते , धोखा खुद ही खा जाते ।

समाज की नजरों से तो,  बिलकुल ही गिर जाते।।

आदर तो अनादर में ,     फिर ऐसा बदल जाता ।

कैसे हुआ सब कुछ ,समझ उनको नहीं आता ।।

जयकार थे करते वही ,         अब गालियाँ देते ।

कुछ बोलकर उनको ,     बजा वे तालियां देते ।।

जो गिरते डाल से बन्दर, समाज से छाँटना पड़ता ।

गिरे जो दूध में मक्खी ,निकाल कर फेंकना पडता।।

धोखा लोग को दे कर, जो खुद को तेज हैं कहतें।

समय देता उन्हें धोखा , कहीं के फिर नहीं रहते ।।

क्यों कि काठ की हाँडी , दोबारा चढ़ नही  पाती ।

गलत जो काम हैं करते ,नतीजा गलत ही मिलती ।।

2 विचार “न चढ़ती काठ की हाँडी दोबारा.&rdquo पर;

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