प्यार की कसक

कितना प्यार तुझे करता था,कह कर नहीं बता पाता।
तड़पा करता कितना दिल मेरा,कैसे उसे दिखा पाता।।

दिल में थी पर दूर बसी थी,लगा समाज का था पहरा।
बेताबी तो थी मिलने की,पर बिवस बेचारा जो ठहरा ।।

चक्रब्यूह को भेद न पाता, शर्मो लेहाज का पहरा था ।
बड़े अनाड़ी थे दोनों, मुश्किल ब्यूहभेदन करना था ।।

रोता तो दिल आज याद जब ,आ जाती है मन में ।
बहते आँसू अन्दर ही अंदर, रह जाता दब मन में ।।

उसे दबाना भी मुश्किल था,मुश्किल था यह काम बडा़।
भनक निकल न जाये कहीं,रोके रहनाथा कठिन बडा़।।

कैसे बीते थे जीवन पल, याद आज जब आती है ।
कभी हँसी आती थी मुझको,अंदर ही कभी रुलाती है।।

राह खुला मिलने को मिलगये, दूरी का पर्दा दूर हुआ।
ब्याकुल थे दोनों दिलकितने,मिलनका मार्ग प्रशस्त हुआ।।

खुशियों का अम्बार मिले गर, वह भी मिले अचानक।
उर्जा पैदा कर देता कितना, कह सकते उसे भयानक।।

बहुत ही मुश्किल उसे दबाना, बिस्फोटक होता यह ।
जो संयम इस पर कर ले , धीर पुरूष होता वह ।।

खुशियाँ गम का ही संगम,जीवन को सफल बना देता।
मानव को सारे जीवों से, उत्तम यही बना देता ।।

सीख सीखते लोग इसी से, हर अनुभव यही कराता ।
मानव जीवन को सफल और,सर्वोत्तम भी इसे बनाता।।

जिस दिल में उगता रहे प्यार,जीवन वही सफल होता।
जहाँ घृणा का लेश नहीं,वह कभी नहीं निष्फल होता।।

मिलन विरह का चक्र यही,जिस जीवन में चलता रहता।
फलता फुलता अपने जीवनमेंं,मधुमय यह कितना रहता।।