जिन्दगी

जिन्दगी रफ्तार मेंं , अविरल ही बढती जा रही।
बाधाओं से बेखौफ हो,अपने ही पथ से जा रही।।

क्या जरूरत है भला, होगा मुझे क्या सोंच कर ।
नुकसान क्या है लाभ क्या, बात सारी जान कर।।

मैं मरुँ,मरने से पहले , रोज मर कर क्यों जिऊँ ?
जो बात बस में है नहीं, क्यो फिक्र उनका मैं करूँ??

है कर्म मुझको सिर्फ करना, हम किये ही जायेगे।
फल नहीं है मेरे बस में, चाह भी क्या पायेगे??

ग्रन्थ गीता ने सबों को, ये दिया संदेश है ।
कर्मवादी ही बनाने , का दिया उपदेश है ।

भाग्य रेखा बदल जाते, कर्म के प्रभाव से । बीर होते कर्मवादी, स्वयं ही स्वभाव से ।।

डरते नहीं हैं ये कभी ,रखते भरोसा कर्म का ।
स्वयं पर करना भरोसा ,विसय उनके गर्व का ।।

जिन्दगी रूकती नहीं है ,यह तो बढ़ती जायेगी ।
रुक गयी गर जिन्दगी ,तत्क्षण वहीं मर जायेगी ।।

जिन्दगी का नाम चलना , रुक गये गर मौत है।
मौत को भी क्या कहें ,तन का बदलता रूप है।।

आत्मा जब आमर है ,तन तो बस परिधान है ।
जर्जर हुए परिधान का ,बदलाव ही निदान है ।।

चिन्ता नकर बदलाव का यह तो नियति का खेल है।
खेल तो चलता सदा ,यह खेल भी क्या खेल है ।।

इस बेरहम दुनियाँ मेंं .

इस बेरहम दुनियाँ में , आसान नही हे जीना ।
अपनाही भरोसा करना, औरों का कौन ठिकाना।।

ये दुनियाँ मतलब पर चलती,ऐसों का कौन ठिकाना।
कब रंग बदल देगी अपना,यह भी मुश्किल है कहना।।

जबतक मतलब सधता उनका,बनकर मित्र रहेगें ।
मतलब सध जाता बात खत्म,मुँह फेर के वे चल देगें।।

लेहाज नहीं होगा उनको,हमदोनों मित्र कभी थे ।
छाया सा चलते साथ सदा,होते न कभी अलग थे।।

फेरेगें वे मुख ऐसा, पहचान न पहले था ऐसा ।
आज करेगें बात आप से,अपरिचित मिलते हो जैसा।।

नीयत किसकी कब क्या होगी ,ये नहीं जानता कोई।
हिंसक सा ब्यवहार करेगा,मानव हिंसक बन कोई।।

अर्धज्ञान पा कर मानव, पूरा इन्सान बना है क्या?
मानव रूप रहा पर, मानव पूर्ण बना है क्या ??

सदाचार झचकता जाता अब, दुराचार के आगे ।
सज्जन को ही झुकना पड़ता,अब दुर्जन के आगे।।

आज सिखाता विद्वानों को, अनपढ़ और गंवार।
प्रजातंत्र में बन जाती जब, उनकी ही सरकार ।।

अनपढ को मिलता राज सिंहासन,बिद्वजन चँवर डुलाते
करना पड़ता काम उन्हें सब, जो गंवार फरमाते ।।

प्रजातंत्र का यही तकाजा, संविधान यह कहता ।
मुँड गिनाने के युग में ,तिकडम से सब कुछ चलता ।।

इन्सान बनाकर भेजा है ,इन्सान सा जीवन जीना ।
कल्याण करो कर सको अगर ,कर सकते तूँ जीतना।।