मुक्तक.

(क)
हरगिज न बेवसी का, तमाशा बनाईये ।
लाचार को न भूलकर, खिल्ली उडा़ईऐ।।
देखा कहाँ है कौन कल ,मत भूल जाइए।
बन जायेंं न खुद ही तमाशा,नजरें उठाइए।।

(ख)
कल को कहाँ देखा किसी ने,क्या हो कल क्या पता?
अपना भविष्य क्या है,कुछ भी किसी को है पता ₹??
बीते हुए कल से सबक लें,क्या पाये औरोंको सता ?
थोडा गौर तो कर सोंचिये, हो जायेगा खुद ही पता।।

(ग)
तंज कसते और पर, खुद पर नजर नहीं फेरते।
बुराइयाँँ सदैव उनकी , ढ़ूंढ़ कर निकालते ।।
अपनी कमी जो ढ़ूंढ़ लेते,महान वो इंसान होते।
इन्सान के ही रूप मेंं ,सचमुच वही भगवान होते।।