दीवानगी

दीवानगी की हद तो, बढ़ती ही चली जाती ।
होती अंत क्या इसकी ,या यूँ ही बढ़ी जाती ।।

दीवानगी की कुछ , दिशायें बदल सकती ।
सोंचने का ढंग अपनी, अलग हो सकती ।।

अनन्त चाहें ,लोग का , इच्छायें अनन्त होती ।
अनन्त पथ का राही ,गणतब्य अलग भी होती।।

राहें ,लम्बी हो किसी का ,दिशायें अलग होती ।
गणतब्य भी हरलोग का ,बिलकुल अलग होती ।।

जायें जहां मर्जी तेरी,अपनें मन का खुद स्वामी।
पर बात सबमें एक होती,होते पथ का अनुगामी।।

जो होते राही ,बस राही, चाहे जो हो पथ उनका।
गणतब्य अलग हो सकता, अपना अपना सबका ।।

कौन जाने ढूँढ़ कब ले,स्वयं ही गणतब्य अपना ।
ले कामयाबी पाये कब ,जिन्दगी में कौन अपना ।।

या भटकता राह में , भर जिन्दगी रह जायेगा ।
या खोज कर उनको वे अपनें, गले से लगायेगा।।

दीवानगी उससे बडा़ भी , और क्या कहलायेगा ।
हो कर अलग सब लोग से,पागल बना रह जायेगा।।

डूब चुका है आदमी , आकण्ठ भव के जाल में ।
निकलना नहीं आसान लगता,ऐसा फँसा है जाल में।।

ब्यकुल सभी खुद हो रहे , डूब जानें के लिये ।
डूब कर भौतिकता में , स्वयं मरनें के लियै ।।

दीवानगी इससें अधिक , और क्या कहलायेगी ?
आत्महत्या के बराबर, बात यह रह जायेगी ।।