दीवानगी

दीवानगी की हद तो, बढ़ती ही चली जाती ।
होती अंत क्या इसकी ,या यूँ ही बढ़ी जाती ।।

दीवानगी की कुछ , दिशायें बदल सकती ।
सोंचने का ढंग अपनी, अलग हो सकती ।।

अनन्त चाहें ,लोग का , इच्छायें अनन्त होती ।
अनन्त पथ का राही ,गणतब्य अलग भी होती।।

राहें ,लम्बी हो किसी का ,दिशायें अलग होती ।
गणतब्य भी हरलोग का ,बिलकुल अलग होती ।।

जायें जहां मर्जी तेरी,अपनें मन का खुद स्वामी।
पर बात सबमें एक होती,होते पथ का अनुगामी।।

जो होते राही ,बस राही, चाहे जो हो पथ उनका।
गणतब्य अलग हो सकता, अपना अपना सबका ।।

कौन जाने ढूँढ़ कब ले,स्वयं ही गणतब्य अपना ।
ले कामयाबी पाये कब ,जिन्दगी में कौन अपना ।।

या भटकता राह में , भर जिन्दगी रह जायेगा ।
या खोज कर उनको वे अपनें, गले से लगायेगा।।

दीवानगी उससे बडा़ भी , और क्या कहलायेगा ।
हो कर अलग सब लोग से,पागल बना रह जायेगा।।

डूब चुका है आदमी , आकण्ठ भव के जाल में ।
निकलना नहीं आसान लगता,ऐसा फँसा है जाल में।।

ब्यकुल सभी खुद हो रहे , डूब जानें के लिये ।
डूब कर भौतिकता में , स्वयं मरनें के लियै ।।

दीवानगी इससें अधिक , और क्या कहलायेगी ?
आत्महत्या के बराबर, बात यह रह जायेगी ।।

मुक्तक

जले जो दूध से होते ,छाछ भी फूँक कर पीते।

कदम जो देख कर रखते ,कभी औंधे नहीं गिरते।।

सफल जो चाहते होना, बरतते सावधानी वे।

सलूक पर अपने अडिग , हरदम रहा करते ।।

(02)
मुकद्दर जो लिखा करते ,उनसे सब डरा करते ।।

न शायद जो डरा करते ,उन्हें डरवा दिये जाते ।

खुदा गर चाहते अपनें , बनायों को डरा रखना।

सर्वोत्तम जीव मानव को.,फिर क्यों कहा करते??

(03)

मानव तो बनाया है ,बुद्धि डाल कर तुमनें ।

विवेक का संचार भी, उसमें किया तुमनें ।।

तेरी ईच्छा बिना कोई नहीं,पत्ता खड़क सकता।

तो निरीह को कैसे डूबोया , पाप में तुमनें ।।

(04)

जरूरत से अधिक भी सादगी,अच्छी नहीं होती।

खलों से दोस्ती करनी ,कभी अच्छी ऩहीं होती ।।

सब तो देखते सब को , अपनी नजरिये से ।

हीरे को को परखनें की नजर,सब को नहीं होती।।

(05)

बहुत कम लोग होते हैं, शराफत जो समझ पाते।

अधिकतर सादगी का अर्थ ,मुर्खो से लगा लेते ।।

तरजीह भी सब लोग से , होता कहाँ हजम ?

उन्हे तरजीह जो देते, उसे मूरख समझ लेते ।।

(06)

समझना और समझाना ,ये दोनों काम मानव का ।

यही एक फर्क है पडता,अन्य जीवों से मानव का।।

इनके ज्ञान से उपर नहीं ,कोई चीज दूनियाँ की ।

समझ सकता अगर सबकुछ,तो वो है ज्ञान मानव का।।

सत्पथ पर चलता जा.

जो जलता,जलता ही रहता,दुनियाँ बढती है जाती ।
नहीं फिक्र करती है किसीका,निज पथपर चलती जाती।

भरा हौसला होता जिनमें, बढ़ता अविरल है जाता।
बाधायें तो आती रहती,बेखौफ चला है ही जाता।।

बाधायें अवरोधक बन कर,जीवन में हर का ही आता।
शौर्य देख बढऩे वाले का,पथछोड अलग है हो. जाता।।

कर पाता नहीं विरोध उसे,जयकार उसी का है करता।
जानेवाला बडे शान से, ताने सीना बढ़ जाता ।।

लोग डराते ही उनको , जो उनसे है डर जाता।
भयभीत न हो जो डटजाते,तोखुद ही भागखडा होता।।

सत्पथ पर जो चलना सीखा,नहीं किसी से है डरता।
निर्भीकता से बढता जाता,नहीं किसी का भय खाता ।।

सच्चा बीर वही है होता,जो चले राह सच्चाई का ।
अंतिम जीत उसी की होती,जो करता कार्य भलाई का।।

सचमुच बीर जो है होता,दंभ नहीं वह है भरता ।
अहित न करता औरों का,ना गलतमार्ग पर है चलता।।

अनुशासित पथगामी होता,कभी न इससे है डिगता ।
चलता और चलाता इसपर,कभीनहीं यह राह भटकता।।

भटक गया जो राहों से,गणतब्य नहीं वह पा सकता।
जाना उन्हें कहाँ रहता ,पर जानें कहीं पहुँच जाता।।

गणतब्य नहीं पाता अपना ,इरादा जो पक्का रखता।
धुन एक सिर्फ उनका रहता,कुछऔर नहीं सोंचा करता।।

कौन देख क्या बोल रहा,नहीं फिक्र वह है करता ।
सुन लेता उनकी बातों को,अमल नहीं पर है करता ।।

जलनेवाले जला करेंगे, वह अपना काम किया करता ।
ध्यान नहीं जो देता उनपर,अपना गणतब्य वही पाता ।।

मानव.

प्रकृति, गर खुदा बोलूँ तुझे, क्या फर्क पडता है?
तुझे ईश्वर कहेँ,भगवन,ईसा, क्या फर्क पडता है??

प्रकृति की देन है दुनियाँ,उन्हीं के सचर अचर सारे।
निर्जीव, सजीव, या यों कहें, ब्रह्मांड भी सारे ।।

कुदरत की करिश्मा लोग सब, तो देखते आँखों ।
जरूरत ही उन्हें क्या पूछने की,जो दिख रहा आँखों।।

बड़े ही धूर्तता से लोग कुछ, साजिश रचा करते।
मानव जाति को तोडा, अनेकों खण्ड कर डाला।।

प्रकृति देखती सब को, सिर्फ मानव स्वरूप मे ।
समझती ज्ञान से परिपूर्ण ही , प्रत्येक रूप मेंं ।।

प्रकृति ही रची दुनियाँ ,यही सब कुछ बनाई है ।
हर चीज दुनियाँ की, बडे ढ़ब से बनाई है ।।

जगत मे पेड़ पौधे ,जीव जन्तु सब बनाई है ।
विविध प्रकार के सब जानवर,उसने बनाई है ।।

उसी सब जानवर में एक ,मानव भी बना डाली।
पर हर जीव से ज्यादा ,इसी में ज्ञान दे डाली ।।

इसी सब ज्ञान के कारण , मानव श्रेष्ठ कहलाता।
अपनें से बहुत बलवान को भी,बस में कर लेता।।

पर कुछ विकृति उनके,मस्तिष्क मे समाहृत हो गये।
मानव ही मानव जीव का ,शोषक प्रवल फिर हो गये।।

फलस्वरूप मानव टूट कर ,विभक्त टुकड़ों में हुए।
बासट सौ लगभग जातियाँँ,उसी से निर्मित हो गये।।

मिलनें न पायें फिर कभी,साजिश भी कुछ ऐसा रचा।
उससे प्रभावित सब हुए, कोई अछूता न बचा ।।

रोग जबतक लोग से , निकल नहीं यह पाएगा।
विकास में बाधक बना यह , सर्वदा रह जायेगा ।।

रे मानव सोंच तो इतना, तूँनें क्या ये कर डाला ।
प्रकृति से ज्ञान पा इतना,कितनी भूल कर डाला ।।

कोई कैसे बता सकता?

प्रकृति क्या गढ़ी कितनी ,कोई कैसे बता सकता ।
उसको छोड़ कर कोई दूसरा,कह भी नहीं सकता।।

सीमा है बडी कितनी, कोई भी कह नहीं सकता।
कितने जीव-जन्तु हैं भरे,नहीं कोई बता सकता ।।

अनंन्त कह कर लोग , अपना पिंड छुडा लेते ।
वे जानते खुद ही नहीं , पर कुछ बता देते ।।

असंख्य जीवों का कहें , भरमार है दुनियाँ ।
असंख्य पौधों के लियै , बहार है दुनियाँ ।।

झरने झर रहे झर-झर ,,घनें जंगल पहाड़ों सै।
कल-कल बह रही नदियाँ, गुजर अपने दरारों से।।

मधुर संगीत सी ध्वनि आ रही,है इन बहारों से।
हवायें भर रही मस्ती कभी, जल की फुहारों से।।

विचरन कर रहे सब वन्यप्राणी,मस्ती के आलम से।
पक्षीगण कर रहे कलरव,किसी झुड़मुट की ओटों से।।

दिखता ही गजब है नजारा,प्रकृति की विधाओं से।
सभी हैं मस्त अपनें धुन मे विस्मृत हो आपदाओं से।।

प्रकृति जो बनाई तूँ, नहीं क्या क्या गढ़ी तुमने ।
परस्पर एक दूजे का , पूरक किया तुमने ।।

तूँने जो किया हमलोग को,अभी समझा नहीं हमने।
तुमनें क्या दिया हमलोग को , देखा नहीं हमने ।

क्या मर्म है उसका , हम क्या भला जानें ?
जितना तुम सिखाया है ,बस केवल वही जानें ।।

तुम्हें हम दाद देते हैं, जितना है दिया तुमनें ।
भले के ही लिए जो कुछ, कर दिया तुमनें ।।

निरंतर जा रहे करते, मेरे ही लिये तुमनें ।
चुकेगा क्या तेरा ये ऋण,जो कुछ लिया तुमने।।

हर चीजें बदल जाती.

समय के साथ दुनियाँ की,हर चीजें बदल जाती ।
अछूता कुछ नहीं बचता, सब कुछ बदल जाती।।

कभी थे नयन का तारा, कभी काँटा वही बन गये।
अघाती थी न आँखें देखजिनको,अब किरकिरी बनगये।।

मिलनबिन चैन न मिलता जिन्हें था,अब नजरें चुराते हैं।
सदा जो संग थे चलते कभी, नजर से दूर रहते हैं ।।

सुकून मिलता था जिन्हें, गलबाहियों मे भर सदा ।
वही मुँह फेर कर बैठे , बने अनजान लगते हैं ।।

जिनको गुलबदन कहना भी ,लगता था कभी ओछा।
वही सूखे हुए पत्तों का , छोटा ढ़ेर लगते हैं ।।

नजर भर देख लेने को,तरशती थी कभी आँखे अनेकों।
वही आती कभी जब सामने,सब आँखें मूँद लेते हैं ।।

यह तो समय का है फेर,अन्यथा कुछ नहीं ज्यादा।
अकड तो आज भी सब में,नही क्यों समझ पाते हैं।।

बदल गयी सोंच लोगों की,भौतिकता हो गयी भारी ।
दौलत के पड़े पीछे , अकल सब की गई मारी ।।

नैतिकता रो रही होगी, कहीं बैठी अकेली ही ।
नहीं कोई,सान्तवना जो दे,न संग में कोई सहेली भी।।

कभी कोई युग-पुरुष होगा ,नैतिकता ला वही सकता।
ह्रास हुई मानसिकता को, फिर से उठा सकता ।।

हद से जब गुजर जाता, तो ऐसे लोग आते हैं ।
ब्यभिचार ,अत्याचार को , भिड़ कर भगाते हैं ।।

समय अब आ चुका नजदीक, फरिश्ता आयेगा कोई।
ब्यभिचार रूपी तम से लड़,, भगायेगा कोई ।।

रहो तैयार स्वागत के लिए , आ ही चुका है अब ।
उभर कर निकल आयेगा यहीं,वह पहुँच चुका है कब।।

पल जिन्दगी का,क्यों लुटा देते

अनमोल पल हम जिन्दगी का, क्यों लुटा देते?
समय बहुमूल्य है कितना,सबक हम क्यों नहीं लेते??

कभी इस रत्न को ,क्यों ब्यर्थ में बर्बाद कर देते।
हम बेवजह और बेतुकी, कुछ काम कर देते ।।

पथ से उतर बे-पथ ,बहक , हम चाल चल देते ।
क्यों बेवजह गरिमा को अपनी, स्वयं खो देते ।।

स्वयं की बर्बादियों को,तमाशायी बन क्यों देखते ?
रोकना तो दूर उसमें , आनन्द ही हम लूटते ।।

समय का मूल्य का पहचान ,जानें क्यों नहीं करते?
निकल कर दूर हो जाता तो,बैठे हाथ क्यो मलते ??

समय जो बीत जाता है, लौट वापस नहीं आता ।
जहाँ जो है ,वहीं पर छोड कर,आगे निकल जाता।

कर ले लाख कोशिश कोई,न इसको रोक है पाता।
कोई बाँधना चाहे अगर , पर बाँध न पाता ।।

समय जो ब्यर्थ खो देते, नहीं उपभोग हैं करते ।
बाद मे हाथ मलने के सिवा ,उनसे कुछ नहीं होते ।।

महान लोगों का जरा , इतिहास तो पढ़ लें ।
समय का मूल्य को समझा उन्होंने, गौर तो कर लें।।

नहीं जो ब्यर्थ खोते है समय,कुछ कर दिखाते हैं ।
मानव जिन्दगी पाने का मकसद, वे समझते हैं ।।

बचा जो है समय अब भी , उसे सत्कर्म में डालें।
मनुज होने का अपना फर्ज ,दुनियाँ को चुका डालें।।

जगत से जो लिया कुछ कर्ज,तो उसको चुका डालें।
अगर कुछ दे के जा सकते ,तो निश्चित ही दे डालें।।