यह जिन्दगी क्या चीज है.

यह जिन्दगी क्या चीज है,मिलती है कुछ पल के लिये।
खुद केलिये सबलोग जीते,पर कुछ तो औरों के लिये।।

जानवर और आदमी मे, बस यही तो फर्क हुए ।
एक जीता खुद के खातिर, पर एक औरों के लिये।।

ये जिंदगी भी अजीब है, अपना तो बस चलता नहीं।
सबलोग अपनी मानते , होता तोपर ऐसा नहीं ।।

हम मोह,माया,लोभ में ,फँसकर इसे बर्बाद करते ।
कैसे फँसेगें लोग मुझसे, तरीका नया ईजाद करते।।

फाँसकर बातों में अपनी, मकसदों को साध लेते ।
संतोश इतनें पर नहीं, छिपकर बहुत अपराध करते।।

बात इतनी ही नहीं, दिनरात गंदा काम करते ।
जघन्य इतना नाम लेने,मे ,में मनुज को शर्म होते।।

चार दिन की जिन्दगी है, लोग सब ये जानते ।
फिर भी कभी कूकर्म करने,से तनिक नहीं मानते।।

दौलत न कुछ भी जायेगी संग,यहीं धरे रह जायेगे।
सुकर्म जो कुछ भी किया ,गुण लोग थोड़ा गायेगें।।

कीजिए गर कर सकें , दें प्रेरणा सद्कर्म का ।
भूलकर भी मत दिखायें, जो राह हो कूकर्म का।।

जब चारदिन की जिन्दगी, धन क्या करोगै ढेर सारे।
ले कर नहीं जा पाओगे तो, किस काम आयेंगे तुम्हारे।।

ब्यय करो,कर काम ऐसा ,निर्माण कुछ ऐसा करा दो।
कुछ काम आये युग -युगोंं,चीज कुछ ऐसा बना दो।।

करना इकट्ठा ढेर धन,मकसद न हीती जिन्दगी की।
मानवता का ही सुरक्षा,मकसद हो शायद जिन्दगी की।।

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