मानव जिन्दगी.

मानव जिन्दगी भी सोंचिये, क्या चीज होती है।
गमों की दर्द से लबलब भरा ,महसूस होती है।।

अनेकोंनेक बाधायें , कदम पर मारती ठोकर ।
डुबोने का किसी को ,सर्वदा प्रयास करती है।।

कैसे लोग कहते क्यों ,मनुज सब जीव से उत्तम?
जरा पर सोंचिये , निकृष्टतम ये जीव होती है ।।

रचा करते ये साजिश रात दिन ,फाँसे किसे कैसे?
सारी जिंदगी यह सोंच कर, बर्बाद होती है ।।

सारे साजिशों का जनक , मानव जिन्दगी होती ।
सृजन हर दिन नयी साजिश ,यहाँ ईजाद होती है।।

संलिप्त रहा करती , सारी जिन्दगियां इसमेंं ।
फिर क्यों लोग की नजरों मेंं ,अच्छी चीज होती है।।

मानव डूब कर मरता बनाई ,खाई में खुद की ।
दुनियाँ दूसरों पर सर्वदा , इल्जाम मढ़ती है ।।

बनाया जो इसे चाहे ,प्रचुर कुछ डाल कर मेधा ।
मेधा का गलत दुनियाँ , इस्तेमाल करती है ।।

यह भी ठीक है बेशक , सभी ऐसे नहीं होते ।
पर कोई शक्ति आ कर ही ,दुनियाँ को चलाती है।।

नमन के योग्य होते वे ,फरिश्ता हैं कहे जाते ।
उनके चरण पर आज दुनियाँ, सर झुकाती है ।।

उलझन में पड़े होते सदा ,दुनियाँ के हर वासी ।
नकलची को पकड़ पाना ,नहीं आसान होती है ।।

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3 विचार “मानव जिन्दगी.&rdquo पर;

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