मानव जिन्दगी.

मानव जिन्दगी भी सोंचिये, क्या चीज होती है।
गमों की दर्द से लबलब भरा ,महसूस होती है।।

अनेकोंनेक बाधायें , कदम पर मारती ठोकर ।
डुबोने का किसी को ,सर्वदा प्रयास करती है।।

कैसे लोग कहते क्यों ,मनुज सब जीव से उत्तम?
जरा पर सोंचिये , निकृष्टतम ये जीव होती है ।।

रचा करते ये साजिश रात दिन ,फाँसे किसे कैसे?
सारी जिंदगी यह सोंच कर, बर्बाद होती है ।।

सारे साजिशों का जनक , मानव जिन्दगी होती ।
सृजन हर दिन नयी साजिश ,यहाँ ईजाद होती है।।

संलिप्त रहा करती , सारी जिन्दगियां इसमेंं ।
फिर क्यों लोग की नजरों मेंं ,अच्छी चीज होती है।।

मानव डूब कर मरता बनाई ,खाई में खुद की ।
दुनियाँ दूसरों पर सर्वदा , इल्जाम मढ़ती है ।।

बनाया जो इसे चाहे ,प्रचुर कुछ डाल कर मेधा ।
मेधा का गलत दुनियाँ , इस्तेमाल करती है ।।

यह भी ठीक है बेशक , सभी ऐसे नहीं होते ।
पर कोई शक्ति आ कर ही ,दुनियाँ को चलाती है।।

नमन के योग्य होते वे ,फरिश्ता हैं कहे जाते ।
उनके चरण पर आज दुनियाँ, सर झुकाती है ।।

उलझन में पड़े होते सदा ,दुनियाँ के हर वासी ।
नकलची को पकड़ पाना ,नहीं आसान होती है ।।

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ऐ जिन्दगी, क्यों नजारायें दिखाती हो.

ऐ जिन्दगी क्या क्या , नजारायें दिखाती हो।।
रुलाती हो कभी कितनी, कमी कितनी हंसाती हो।।

होती जिन्दगी सचमुच , गमों की ही भरी दरिया।
दिखाती तैरते उसमे, कभी डूबती दिखाती हो ।।

बेशक बना देती तमाशा, खुद बन तमाशाई ।
हँसाते लोग को मुझ पर , समाँ ऐसी बनाती हो ।।

कभी हमदम नजर आती, कभी दुश्मन नजर आती ।
मर्जी जो तेरी होती , वही मुझको दिखाती हो ।।

लगता हाथ का बन कर , खिलौना बन गया तेरा।
भरता जी, मुझे तब तोड़ कर ,कचरे बनाती हो ।।

रहा ऐतबार अब नहीं , तुम पर ऐ जिन्दगी ।
समझता था तुझे जैसा ,नजर वैसी न आती हो।।

नहीं मैं हारना सीखा , कभी भी आपदाओं से ।
सितम ढ़ाती रहो ढाओ ,भभकियाँ क्यो दिखाती हो।।

लड़ूँगा तब तलक ,मुझमे रहेगी साँस अंतिम तक।
तरेरे आँख अपनी ब्यर्थ,मुझको क्यों डराती हो ।।

जानें के लिये ही आई है ,ऐ जिन्दगी तुम तो ।
फिर लौटनें की ब्यर्थ धमकी, क्यों सुनाती हो ।।

समझा जो किया करते ,सदा ये मान कर कहते।
अनित्य खुद हो जिन्दगी ,भरोसा क्यों दिलाती हो।।

चलो एक चाल सादा सा ,निभे जो जिन्दगी पूरी।
जो होती चाँदनी दो चार दिन की,क्यों लुभाती हो।

करे कोई भरोसा क्यों , तुम्हारी ऐ जिन्दगी ।
बेगानों की तरह जब चाहती, मुँह मोड़ लेती हो।।

तेरा जो भी हो इरादा.

तुझे देखता हूँ जब कभी, मैं खो कहीं हूँ जाता।
कहनी है बात ढ़ेरों, पर भूल सब हूँ जाता ।।

तेरा इन्तजार में ही, सारा वक्त गुजर जाता ।
कितने गुजर गये हैं , मुझे होश भी न आता ।।

जब भी मिलोगी मुझसे, क्या क्या करूगा बातें ।
शिकवा भी क्या है करना बस सोंचता ही जाता।।

लम्बे समय से तुमसे , दीदार जब है होता ।
कुछ कह नहीं हूँ पाता ,सब कुछ ही भूल जाता ।।

सकोगी पढ तूँ पढ़ लो , आँखों की मेरी भाषा ।
उसमें तो सब लिखा है ,जुबां जो कह न पाता ।।

ये जिन्दगी भी मेरी, तेरे लिये बनी है ।
रखो या यूँ मिटा दो , तेरा जो भी हो इरादा ।।

जो कर दिया हवाले , अब सोंचना भी क्या है ।
मर्जी तेरी चलेगी , मेरा क्या बचा जो जाता ।।

तुझे देखता हूँ जब कभी मैं खो कहीं हूँ जाता।
करनी ही है बात ढेरों ,पर भूल सब हूँ जाता।।

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क्या लिखूँ और क्या नहीं?

सोंचता हूँ क्या लिखूँ, आती समझ मे कुछ नहीं ।
मौला मेरे तूँ ही बता, क्या लिखूँ और क्या नहीं??

दर्द अनेंकों ही दफन है, दिल के इस मजार मे।
बाहर करूँ,निकाल फेकूँ ,या छोड़ूँ इसी मजार में?

बन कर मनुज हम आये शायद,दर्द सहने के लिये।
सह कर जहाँ की वेदना , चुपचाप रहने के लिये ।।

करता नहीं प्रतिरोध हूँ, चुपचाप सहता जा रहा ।
पर भावना प्रतिरोध का, अविरल ही बढ़ता जा रहा।।

सीमा चरम को छू न ले, रोकना पहले पड़ेगा ।
हद से गुजरनें के ही पहले,कुछ कर गुजरना तो पडेगा।

देखियेगा हर जगह, आतताइयों का राज है ।
बर्चस्व चलता है उसी का ,हर जगह पर आज है।।

सामान्य जन को न्याय पाना ,ही बहुत दुस्वार है ।
अपार धन और बाहुबल , सतत करता वार है ।।

हर आदमी जब तक नहीं, कर्तब्यनिष्ठ हो जायेगा ।
इन्सान का शोषण न तब तक,रूक कहीं भी पायेगा।

स्वार्थ का जब बोलबाला ,हर जगह हो जायेगा ।
अन्याय नामक जानवर फिर,खत्म नहीं हो पायेगा ।।

गर रोकना अन्याय है तो, स्वयं पर संयम करो ।
स्वयं को पहले सुधारो , और को पीछे धरो ।।

अन्याय से लड़ना मनुज का,ही तो पावन कर्म है।
झुकते नहीं जो जूझ जाते , यही तो मानव धर्म है।।

क्या करूँ बता मेरे दिल.

अब क्या करूँ बता मेरे दिल, तूँ है कि बतलाता नही।
पूछ तो कब से रहा हूँ,फिर भी तो समझाता नहीं .।।

उलझे सदा उलझन मेंं ही, रहते हैं कुछ कहते नहीं।
दिखता न कोई राह मुझको आता समझ मे कुछ नहीं।।

मंजिल बहुत ही दूर है, हर ओर कुछ दिखता नहीं ।
किस ओर है मंजिल मेरी, यह भी हमें पता नहीं ।।

अज्ञानता का ‘बीच सिन्धू’ मेंं पडा़ हुआ यहीं ।
सोंचता तोजा रहा , समझ में पर आता नहीं ।।

दिखलाओ मेरा रास्ता , जल्दी क्यूँ दिखलाता नहीँ?
भवजाल में उतार मुझको , दीदार तक देते नहीं ।।

देर कर मत और ज्यादा, अब वक्त ज्यादा है नहीं।
अवसर गया जब हाथ से ,लौट फिर आता नहीं ।।

घवराओ मत ,लो फैसला , डरनें से कुछ होता नहीं।
निर्भीकता से सोंच लो, हरबर से कुछ होता नहीं ।।

अब क्या करूँ बता मेरे दिल,क्यों तूँ बतलाता नहीं।
पूछ तो कब से रहा हूँ ,फिर भी समझाता नहीं ।।

गरीबी जीवन का अभिषाप.

गरीबी ही तो जीवन का,बहुत बडा़ अभिषाप।
इससे बडा़ न होता दूजा,जग में कोई संताप।।

इस भौतिकवादी जग में,कद्र न होता ज्ञानी को।
आज लोग देते सम्मान, दौलतमंद अज्ञानी को ।।

लेतेहै लोग खरीद आज,दौलतसे कुछ विद्वानों को।
गरीबी की ठोकरसे आहत,होते से नौजवानों को।।

कूट कूट कर जोश भरा,रहता है मन मे जिनको।
जीवन में कर दिखलाने का,जज्बा भरा हो जिनको।।

पुलकित रग रग होते जिनका,कुछ करके दिखलाने को।
आवरण पुराना तोड़ निकल कर,बाहर आ जाने को।।

मग में आये बाधाओं से, बेधड़क जूझ जाने को ।
चाहे जैसे भी हो जाये, गणतब्य पहुँच जाने को ।।

झझा की बेगों से चल कर ये,अपना राह बना सकते।
अवरोधक बनकर जो आये, जाने कहाँ उड़ा सकते।।

सही दिशा मिल जाये तो,गणतब्य भी मिलना तय है।
दिकभ्रमित अगर हो जायें तो,भटकने का भी भय है।।

उतरती पर्वत से नदियों में,कोई अवरोधक आ जाता है।
कभी बडा़ कोई शिलाखण्ड,पथ रोक खडा़ हो जाता है।

कभीकभी भिड़ जाती नदियाँ,कभी अपना मार्ग बदललेती
स्वयं खोज कर राह सुगम, अपनी दिशा बदल लेती ।।

देख गरीबी आज खड़ी है, अवरोधक सा जीवन में ।
बुद्धिमानी से इसे निपट,बढ़ जाओ अपने जीवन में।।

निटपट न जाये जबतकमानव,गरीबी’नाम इस दानव से।
उद्धार नहीँ हो सकता तब तक,मानव का इस दानवसे।।

अति जरूरत की सब चीजें,मानव को मिलती जाये।
आयें हमसब संकल्प करें ,ऐसा ही एक देश बनायें।।