हम सब भारतवासी (मगही)

अलग तरह के भाषा सब हे ,अलग तरह के भेष हे।
अलग तरह के रंग -रूप हे ,अलग अलग परिवेश हे।।

रहन सहन भी अलगे अलगे ,खान पान भी अलग अलग।
कद काठी भी अलगे अलगे, रस्म रिवाजो सभे अलग ।।

कहीं गरमी से धीकल धरती , रेत रेत ही भरल हेवे ।
बड़का बड़का मरुभूमि हे , बबुल काँटा से भरल हेवे।।

कहींपे गरमी कहीं पे जाड़ा, कहीं बरफ से जमीं ढ़कल हे।
कहीं समुन्दर के हे हल्फा ,कहीं असमान पहाड़ चुमल हे।।

कहीं आधुनिक शहर बसल हे,भौतिकता में डूब रहल हे।
जादेतर सब लोग गाँव के, सुख सुबिधा से दूर परल हे।।

कहीं जंगल घनघोर हेवे , हिंसक जीव से भरल परल ।
जन जाति ओकरे में रह के, जीवन अप्पन बिता रहल ।।

बहुत ढेर बतवन में भी , मिल जाहे अनकों भिन्नता ।
पर ई भिन्नता के बादो भी, मजबूत हम्मर हे एकता ।।

फरक न तनिको रहे बिहारी, या होवे बंगाली ।
रहे मराठी उडिया भाषी , चाहे होवे गुजराती ।।

चाहे कश्मीरी कोई होवे, या होवे केरलवासी ।
फरक तनिको न एकर , हम सब ही तो भारत वासी ।।

अलग धरम के लोग हिला , पर ही भारत के लाल ।
मजहब चाहे कुछ भी होवे , तनिको न हेवे मलाल।।

हम भारत के लाल हिला , भारत माता हथ हम्मर ।
इनकर सेवा में लगल रह ही , सदा रह ही तत्पर।।

राज हमर चाहे जो होवे , हम ही ई देश के वासी ।
हम सब के पहिले ही केवल , केवल भारतवासी ।।