गौतम-बुद्ध (मगही)

कपिलवस्तु के राजघराने , में गौतम-बुद्ध जनम लेलन।
उनकर नाम सिद्धार्थ परल, कामों ढेर बड़ा कयलन ।।

न ठाट राजसी हल उनकर , कैलन सब काम महान ।
लगल रहल हर दम उनकर , सदाचार में ध्यान ।।

जीवन में घटना कुछ देखलन, देख देख गंभीर भेलन ।
गंभीरता से सोंचलन ओकरा , ओही सोंच महान होलन ।।

घटना कोई अजूबा न हल , घटते हरदम ही रहे हे ।
मर गेला पर सजा जनाजा , मरघट तक ले जाहे ।।

कंधा दे के चार आदमी , उनका के पहुँचावे हे।
मरघट पर ले जा कर के उनकर,अंतिम संस्कार करावे हे।।

नजर परल सिद्धार्थ के ऊपर,जा के एकर कारण पूछलन।
चार आदमी के ढ़ोवे के , उनका से सब कुछ जनलन ।

जान गेलन सब बात और, सुन के काफी गंभीर भेलन ।
काहे मर जा हथ लोगन , यही बात सोंचे लगलन ।।

देखलन आगे एक भिखारिन, दीन-हीन हालत देखलन।
जा के ओकरा पास पहुँच ,ओकर बारे में सब जनलन ।।

सब बतवा के जान बूझ के , ओकरे पर सोंचे लगलन ।
काहे अदमी मर जा हेवे ,दिन रात येही सोंचते रहलन।।

भिड़ गेलन एकरे जाने मे , आखिर ई जीवन का हे ।
मानव जीवन भर दुखी रहे हे ,आखिर ऐकर कारण काहे।।

राज- पाट सब छोड़ छाड़ ,दिन रात एही सोचे लगलन ।
एकर अलावे और न कुछ हू , मनवाँ में राखे लगलन ।।

त्याग देलन सुख राजपाट के, त्यगलन सभी रजोगुण के।
मयिया तो पहिले मरगेलथिन त्यगलन मौसी माँ गौतमीके।

यशोधरा पत्नी के त्यगलन ,त्याग देलन सुत राहुल के ।
भौतिकता के सुखो त्याग के ,जोड़लन खुद के रचयिता से.

त्याग के सब कुछ चल देलन, फल्गू तट गया के पास ।
बैठ वहीं पीपल के नीचे, ले के ध्यान पिपास ।।

ध्यान लगयलन मन मस्तक से ,आत्म समर्पण कर के ।
ज्ञान मिलल, बुद्धत्व मिलल, बन गयलन बुद्ध बुद्धि पा के।।

माँ गौतमी के गोद मे पललन ,ओही से गौतम नाम परल।
आगे चल के एही  कारण से ,गौतम-बुद्ध हल नाम परल ।।

मार्ग देखवलन गौतमबुद्ध जो , बुद्ध धर्म कहलावे हे ।
भारत मे परचार तो कम भेल, बाहरे धूम मचावे हे ।।

घर के मुर्गी दाल बराबर , लोग बनौले रखले हे ।
कारण का हे पीछे एकर, बिषय गुप्त ही रखले हे ।।

कुछ देशन भारत के बाहर , दिल से एकरा अपनैले हे ।
परम -पावन अति मान के एकरा,दिल से गले लगैले हे।।

महान अशोक सम्राट धर्म में ,अइसन नेह लगयलन हल।
चीन ,जापान, लंका ,बर्मा मे, एकरा के फैलैलन हल ।।

बहन संघमित्रा के देलन हल, भार एकरा फैलावे ला ।
जा के सबमें बुद्ध-धर्म के, गूढ़ तत्व समझावे ला ।।

मठ बनवयलन ढेरों सारे , दे के नाम बिहार ।
ऐही से अप्पन प्रदेश के, पड़ गेल नाम बिहार ।।

पर ई बिहार के न हे खाली , आदमीयत के ज्योति ।
सदा सर्वदा रहत चमकते, जैइसन हीरा -मोती ।।

शांति, प्रेम, अहिंसा से, जीवन के राह देखवलन ।

अद्भुत जीवन दर्शन देलन, बतवा सब समझवलन।।

काश बतावल राह पर उनकर, दुनियाँ आज चलत हल।
अमन चैन के बंशी बजत हल, घर घर घीउ के दीप जलत हल।।

तनिक विश्राम कीजिए

आइए रूक कर तनिक, विश्राम कीजिए ।
पग थक चुके होंगे बहुत, आराम कीजिए ।।

जिसने भी दी ये जिन्दगी , पग दो -दो दे दिये ।
जाना है क्यूंकि दूर तक , ये ध्यान दीजिये ।।

थक जायेंगे ज्यादा अगर , आगे नहीं बढ़ पायेगे।
विश्राम कर, तन-मन तनिक, रिचार्ज कीजिए ।।

करना अभी तय आप को, है लम्बा बड़ा सफर ।
दम बीच में टूटे नहीं, ख्याल कीजिए ।।

चलना है जिन्दगी अगर, रुकना ही मौत है ।
विश्राम कुछ पलों का, बस कर ही लीजिए ।।

जाईये चलते चले, जीवन के इस सफर में ।
विश्राम-चिर, अंतिम घड़ी को, मान लीजिए ।।

दुनियाँ में सारे लोग हैं , बस आप की तरह ।
मुसाफिर उन्हें चलता हुआ, ही मान लीजिए ।।

आईए रुक कर तनिक, विश्राम कीजिए ।
पग थक चुके होगेंं बहुत, आराम कीजिए ।।

माँ गंगा

धरती पर आयी माँ गंगा, लाया भागीरथ तुमको।
तप कठिन किया ,खुश कर तुमको,तैयार किया आने को।।

आने को तैयार हुई पर , एक लगाई शर्त बडी़ ।
कौन करेगा भार वहन ,धरती पर होगी गर्त बड़ी।।

किया भगीरथ पुनः तपस्या,हो गये गंगाधर खुश झट से
चली धरा पर उतरी गंगा, रह गई फंस उनके लट से।।

टूटा माँ का दर्प ,हुआ आभाष, लोग हैं और बडे़ ।
प्रकृति की करतब असीमित है ,मत करना अभिमान बडे़।।

आ कर धरती पर तार दिया , राजा सगर के पुत्र तरे ।
भागीरथ के तप बल से , पूर्वज उनके सब लोग तरे ।।

बढी गंगा आगे धरती पर , गंगोत्री, हरिद्वार तरे ।
ऋषिकेश, एलाहाबाद तरे , तरी काशी, बिश्वनाथ तरे ।।

यूपी, बिहार की धरती तरी ,तर गये बंगाल के लोग सभी।
मिल गयी गंगा सागर में जा, ले डुबकी तर गये लोग सभी।

तर गये जो गंगा नाम लिये ,मत पूछो जो जलपान किये ।
अमृत तेरा जल, माँ गंगे,औषध गुण  विविध महान लिये।

सिंचित करती धरती अपनी , उर्वरा बढा़ देती उनमें ।
वेगवती, ऊर्जा  देती, रोशनी फैलाती घर-घर में ।।

 

माता कह सम्मान है करते, हम जन-जन, भारत के वासी ।
बसे है तेरी आँचल में, माँ फिर क्यूँ छाई घोर उदासी॥

गुमसुम, शायद इसी लिये , कि माता तो सब हैं कहते ।
पर गंदा करने मे तुझको , तनिक हया नहीं करते ।।

अमृतजल न बनें गरल, क्या किंचित ध्यान भी देते हम ।
अपनी लालच, तृष्णा में, क्यूँ तुझे डुबाये देते  हम  ॥

सारे गन्दे कचडे ,नाले , सीधे तुझमे डाल दिये ।
दूषित कितनी तू होती , हम तनिक न  कभी ख्याल किये ।।

जब तक समझ न पाएंगे हम , माँ गंगा बदहाल रहेगी।

हम सब मिल-जुल करें यतन, तब ही माँ फिर खुशहाल बनेगी॥

माँ गंगा के खुश होने से, सुख-समृद्धि आएगी।

जीवन मंगलमय होगा, माँ भारती जश्न मनाएगी॥