पेड़

प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से ,जग को जो जीवन देता । प्रकृति – प्रदत्त उपहार इसे , पेड़ नाम सब है देता ।।

हरा भरा, सब का मनभावन , शीतल छाया ,फल देता । जीवन को अहम प्राण-वायु ,सारे जग को निर्मल देता ।।

आसमान में छाये बादल, आकर्षित तुम से होता । आ कर बरसाता है रिमझिम ,टिपटिप  बूंदें जल देता।।

ऐ पेड़ तुम्हारी अहम भूमिका ,  हर एक जीवन में होता । गर रहे नहीं तुम, नहीं कल्पना जीवन का धरती पर होता॥

फरामोश एहसान है मानव, ये भी नहीं समझ पाता। निर्ममता से इसे काट , स्वार्थ सिद्धि है करता॥

परोपकार में कमी नहीं कभी,फिर भी पेड़ है करता। जो जीवन हरता इसका , उस पर भी सदा दया करता।।

परोपकार का कद्र कभी पर, मानव-मूढ़ नहीं करता । तुच्छ स्वार्थ में पड़ मानव ,  पेड़ों पर जुल्म  सदा  करता ॥

देर बहुत हो गयी , अगर हम अब भी नहीं जगेंगे। जल्द ही ऐसा होगा , जब ये पेड़ साथ नहीं होंगे॥

पेड़ हमारे मित्र अनोखे ,  हरे-भरे जब इसे रखेंगे। हरा-भरा ये जग होंगा , जीवन तब फलेंगे-फूलेंगे॥

बेटियाँ

बेटों को कहते सब , दीपक अपने कुल का।
पर दो कुलों का दीपक , होती है बेटियाँ ।।

मायके में जन्म ले कर, संस्कार लेती ,पलती ।
उस घर को सँवार  कर , रखती है बेटियाँ ।।

बेटों को प्यार ज्यादा , माँ – बाप से है मिलता ।
चुपचाप देख कर भी , सहती है बेटियाँ ।।

शिज्ञा में सुविधा ज्यादा , लेते सदा हैं बेटे ।
परिणाम फिर भी अव्वल , लाती है बेटियाँ ।।

सदा से इनके पर को , रखा है बाँध हमने ।
मौका मिला तो चाँद से, हो आई बेटियाँ ।।

हिमालय की चोटियों पर , चढ़ना बडा़ था दुष्कर ।
चढ़े थे पहले बेटे , अब चढ़ती भी बेटियाँ ।।

माँ- बाप बृद्ध होते , लाचार हर तरह से ।
बनकर छड़ी, सहारा , देती है बेटियाँ ।।

तुमने जना दोनो को, दोनों में गुण बराबर ।
मौका दो और देख लो , क्या कम है बेटियाँ ।।

विभेद मन मे जो है, बेटे और बेटियों का ।
बस भेद को मिटा दो , फिर देख बेटियाँ ।।

समाज के नियम को, जिसने भी हो बनाया ।
ऐ बेरहम बता क्या , दुश्मन थी बेटियाँ ??

बहू रहे या बेटी , दोनों में क्या है अंतर ?
बहुऐं भी उस  घर की , होती है बेटियाँ ।।

कहते हैं घर की लज्ञ्मी, सब लोग मानते हैं ।
निभाती धर्म अपना , हर दम ही बेटियाँ ।।

अस्मिता भी जग में , बची है आज तक जो।
सम्हाले संस्कृति को , रखी है बेटियाँ ।।

अंतरिक्ष का भ्रमण कर के ,लौट आई चावला ।
सोंचिये बचा क्या , जो कर न सके बेटियाँ ।।

दिल के दर्पण में

दिल के  दर्पण में , न कोई और नजर आयेगी ।
आओ खुद देख लो ,बस तूँ ही नजर आओगी ।।

तुम जो हो साथ, ये जगत, लगे अपना.सा है।
रहो न तू जो, जग व्यर्थ  नजर आयेगी ।।

बना के भेजी गयी तू , बस मेरे ही लिये ।
खुदा का लाख शुकर , साथ अब निभाओगी।।

मैं एक चिराग हूँ, खाली सा, मिट्टी का बना  ।
नेह और बाती तुम, दूर तम भगाओगी ।।

जिन्दगी ताल सी भरी मेरी, कोरे  जल से ।
कमल का फूल बन तू , रंग तुम जमाओगी ।।

तेरे बगैर, इस जीने में, कोई सुवास नहीं ।

तुम जो पास हो, जीवन मेरा महकाओगी ॥ दिल के  दर्पण में…..

उलझन में मैं पड़ा हूँ

उलझन में मैं पडा़ हूँ , तेरी क्या मिसाल दूँ ।

ढूंढे न मिल रहा है , कुछ कहूँ  तो क्या कहूँ  ॥

सुबह का आफताब बोलूँ , राकेश या कहूँ ।
मैं सोच ही न पा रहा , कहूँ तो क्या कहूँ ॥

आफताब की दमक तो , तुझ  सा लगे सही ।
कैसे पंखूड़ी गुलाब को , तपिश भला कहूँ ॥

तुझे चाँद बोलने में , होता मुझे झिझक ।
दमकते हुए आनन को , दागदार क्यो कहूँ ॥

तुम बेमिसाल हो , है तुझ सा जग में न कोई ।
ढूढ़े न ढूढ़ पा रहा , तुझ  सा किसे कहूँ ।।

 

तो क्या कीजिये

गैरों ने की अदावत , कुछ बात समझ आती ।
अपनों ने की बगावत , फिर क्या कीजिए !?

गैरों जो सितम ढाते , सब लोग सम्हल जाते ।
अपनों की बदसलूकी , को क्या कीजिये !?

दुश्मनों ने युद्ध छेड़ी , बज गये हों रणभेड़ी ।
गृहयुद्ध भी संग छेड़े , तो क्या कीजिये !?

दिल में छिपा के रखा , दुनियाँ की बदनजर से।
वो दिल को तोड़ डाले , तो क्या कीजिये !?

स्तन का पय पिला कर , जीवन तुझे  दिया जो ।
उस माँ को भी दे पीड़ा , तो क्या कीजिये !?

जो गुलबदन कहाती , फूलों से ज्यादा नाजुक ।
दिल तोड़ दे वही गर, तो क्या कीजिये !?

अनमोल हीरे होते , जो जान से भी प्यारे ।
वह जान ही जो ले ले , तो क्या कीजिए !?

भरोसा जो सबसे ज्यादा, हमें आज हो किसी पर।
भरोसा वही जो तोड़े , तो क्या कीजिए !?

दस्तूर भी दुनिय़ाँ का , है अजब अनोखा ।
आया, उसे है जाना , तो क्या कीजिये !?

इन्सान नासमझ है , सब छोड़ ही है जाना ।
फिर मोह में है डूबा , तो क्या कीजिये !?