मानवता की जीत

मानवता की जीत सदा,दानवता पर होती आयी ।

भले लगे कुछ लमहें, जैसे मानवता ने मुंह की खायी॥

गर्मी के दिन तप्त हो, कैसे जन-जन को तड़पाती है।

दानवता जैसे मुंह बाए, सूरज पर छा जाती है॥

प्रचंड धूप अवनी के ऊपर, आसमान बरसाता है ।

ताल तलैया धरती पर, सब जलविहीन हो जाता है ।।

जीव-जन्तु ,पेड़ो-पौधों का, हाल बुरा हो जाता है ।

बेचैनी का आलम जमकर, जन-जन पर छा जाता है ।।

बेहाल सभी रहते गर्मी से, लुक-छिप कर घर रहते हैं।

मध्याह्न काल में  बाहर घर से, शायद ही कभी निकलते हैं।

लोग डरे रहते, सहमे, भयभीत हुए से रहते हैं ।

किस्मत बिगडी़, तो लू,  उनके जीवन भी हर लेते हैं ।।

पर समय चक्र का देख असर, कैसा सब पर पड़ जाता है।

जलकण बादल रुप लिये,सूरज को भी ढक पाता है ।।

कहाँ गया वो रौद्र तपिश, वो कहाँ गई  ज्वाला प्रचंड।

कहाँ गया वह रुष्ट रुप, वो कहाँ गई आभा ज्वलंत ॥

कहाँ गया वो किरण तेज़, जिससे हरियाली सूखी थी।

सघन वन पत्रविहीन हुये थे, सूखे पत्तों की ढ़ेरी थी।।

दानवता का असर खत्म,मानवता का अब असर देख ।

पत्रविहीन जो हुये दरख्त, उनमें फिर नया बहार देख ।।

तेरी शक्ति खत्म हुई , विध्वंस न अब कर पाओगे।

मानवता की शक्ति पुंज से, दानवता तुम ढल जाओगे॥

सृजन कार्य दुश्वार बहुत, है कठिन, देर लगता है ।

विध्वंस उसे कर देने में, पल क्षणिक मात्र लगता है ।।

निर्माण नहीं जो कर सकते, वे दंभ अधिक भरते हैं।

सद्कर्म नहीं आता करना, कुकर्म वही करते हैं ।।

विध्वंसक से हाथ सदा, है लम्बा होता रक्षक का ।

जीत उसी की अंतिम होती, मानवता के रक्षक का।

काम किसी के आ पाओ, कुछ ऐसा कर जाओ।

मानवता के चेहरे पर, मुस्कान अदद एक लाओ॥