कुछ काम किये तो, मोदी जी!

चले चाल को पस्त किया,रोक स्वयं के ढाल से ।
वार गये खाली दुश्मन के ,मोदी जी तेरे चाल से ।।
अर्थ व्यवस्था को बिगाड़ने ,पडा़ था पीछे कमर कसे ।
सोच रहा था भारत मानो , जैसे अब कुछ फंसे-फंसे ।।
मुक्त कराया देश को अपने ,इस शतरंजी खेल से ।
फेल हुए सब साजिश उनके ,तेरी गहरी चाल से ।।
पड़ा देश में काला धन था , उसे निकाला बाहर लाया ।
चोरो के जो माल गड़े थे , कुछ निकले, कुछ वहीं सडाया।।
था रोग बडा ही संक्रामक ,पर भागा दवा के जोड़ से।
कष्ट तो होता सहना पड़ता ,उस दवा की कड़वी घूँट से ।।
सहर्ष सहेगा देश इसे ,उफ तक भी नहीं करेगा ।
पी कर करवा घूँट ,देश को संकट मुक्त करेगा ।।
पर मोदी जी अपना वादा ,को भी जरा निभाना ।
स्वीस बैंक का भी पैसा ,जरा ला कर हमें दिखाना।।
हर देशवासी तेरा करेगा स्वागत, वादा नहीं भुलाना ।
बिश्वास किया और तुम्हे जिताया , तुम जो कहे, निभाना।।
बात बना कर बहुत बताया , दिखला अब अपने काम से ।
जनता तेरी कद्र करे , जयकार करे सम्मान से ।।

प्रकृति की बगिया

आया था जब चमन में,अनगिनत चीज थी भरी हुई।
कुछ यहाँ तो कुछ वहाँ, बेतरतीब, बिखरी हुई।।
उबर-खाबर क्यारियाँ, लहराते पौधे हरे-भरे।
भिन्न-भिन्न से कुसुम थे, कुछ सोये, कुछ खड़े-खड़े।।
रंग अनेकों, किस्म अनेकों, कुछ छोटे, कुछ बड़े-बड़े।
गंध-सुगंध भी भिन्न-भिन्न, कछ पौधे, कुछ पेड़ बड़े।।
भ्रमर गुँजन की मथुर ध्वनि, गूँज रही थी उपवन मे ।
उड़ती-फिरती तितली मन मोहक, भरी हुई थी उपवन मे।।
छटा गजब की थी छायी, आकर्षक और मतवाली।
नयनाभिराम था दृश्य वहाँ, दिल मे भरता खुशहाली।।
रस के प्रेमी भ्रमर वहाँ, मदमस्त हुये फिरते थे।
पुष्पों से आलिंगन कर, प्रेम लुटाते रहते थे।
लगता जैसे कामदेव का, वाण जमीं पर आया हो । 
पुष्पों व भ्रमरों के  मन  में, प्रेम का अगन जगाया हो।।
प्रकृति की यह छटा निराली, कौन जिसे नही भाएगा। 
जो देखेगा, खुद खिचता-सा, उसमे ही रम जायेगा।।
अद्भुत यह उपहार जगत को, जाने कौन है भिजवाया।
सौंध और सौंदर्य भरा, यह अप्रतिम प्रकृति रचाया।।  
जिसने यह सौगात दिया, आदर उसका करता हूँ । 
आभारी है सदा उसी के, नमन उसे करता हूँ ।।